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ब्रह्मोत्सव का आगाज:दक्षिण का काशी कालाहस्ती कस्बा मकड़ी, नाग और हाथी के संयुक्त नाम से प्रसिद्ध है; कालाहस्तीश्वर में एक हजार शिवलिंग, 100 खंभाें का मंडप भी

कालाहस्ती (चित्तूर)9 महीने पहलेलेखक: अनिरुद्ध शर्मा
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12 लाख श्रद्धालु पिछले साल जुटे थे ब्रह्मोत्सव में। - Dainik Bhaskar
12 लाख श्रद्धालु पिछले साल जुटे थे ब्रह्मोत्सव में।
  • आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में ध्वजारोहण के साथ शुरू हुआ ब्रह्मोत्सव, यहां 12 दिन शिवरात्रि चलेगी

आंध्र प्रदेश के चित्तूर स्थित कालाहस्तीश्वर स्वामी मंदिर में ध्वजारोहण के साथ ब्रह्मोत्सव शुरू हो गया है, जो 18 मार्च तक चलेगा। इसी के साथ यहां 12 दिन तक चलने वाली शिवरात्रि का भी आगाज हो गया है। ब्रह्मोत्सव दक्षिण भारत के सबसे प्रसिद्ध महोत्सवों में से एक है। इसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र के श्रद्धालु बड़ी संख्या में हिस्सा लेते हैं। जैसे-जैसे उत्सव आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे भक्तों की संख्या भी बढ़ने लगेगी।

पिछले साल शिवरात्रि कोरोना के कारण लगे लॉकडाउन से पहले थी। तब पूरे उत्सव में 12 लाख भक्त जुटे थे। उत्सव प्रबंधन का कहना है कि इस बार भले ही कोरोना हो, पर यहां भक्तों की कमी नहीं है। उम्मीद है कि शिवरात्रि आते-आते यहां डेढ़ लाख लोग हर दिन अपने आराध्य के दर्शन करने पहुंचेंगे। श्रीकालाहस्ती (मकड़ी, नाग और हाथी के संयुक्त नाम से प्रसिद्ध) को पंचभूत स्थलों में से एक गिना जाता है। यहां शिव की वायुलिंग के रूप में पूजा होती है। मान्यता है कि मंदिर परिसर में एक हजार शिवलिंग स्थापित हैं। इसे राहु-केतु क्षेत्र भी कहा जाता है। राहुकाल में पूजा के लिए यह मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है, यहां 100 खंभों का एक मंडप भी स्थित है।

इधर, महोत्सव के पहले दिन शनिवार को श्रद्धालु श्री कालाहस्तीश्वर स्वामी के उत्सव विग्रह को पालकी में बिठाकर मंदिर से करीब एक किमी ऊंची तिरुमलय पहाड़ी के शिखर पर स्थिति कन्नप्पा मंदिर ले गए। वहां पुजारी, सेवकों ने पारंपरिक तरीके से ध्वजारोहण किया। कन्नप्पा स्वामी भगवान शिव के अनन्य भक्त माने जाते हैं।

परंपरानुसार पहला ध्वजारोहण कन्नप्पा मंदिर में ही होता है। फिर अगले दिन वैसा ही ध्वजारोहण श्रीवारी मंदिर में होता है। इसके बाद हर रोज सुबह-शाम दो बार मंदिर परिसर में चारों ओर के परिक्रमा मार्ग पर विभिन्न वाहनों पर सवार होकर भगवान कालाहस्तीश्वर स्वामी की शोभायात्रा निकलती है।
शिव-पार्वती के दर्शन के बाद 7 फेरे लेंगे सैकड़ों जोड़े

ब्रह्मोत्सव का मुख्य उत्सव शिवरात्रि (11 मार्च) है। 12 मार्च को रथोत्सव होगा। 13 मार्च को शिव-पार्वती कल्याणोत्सव यानी शिव-पार्वती विवाह के दर्शन होंगे। इस दिन सैकड़ों जोड़े दांपत्य सूत्र में बंधेंगे। माना जाता है कि इस दिन विवाह करने से बंधन अटूट रहता है, क्योंकि इसी दिन के ग्रह-नक्षत्र योग में शिव-पार्वती ने विवाह किया था। 15 मार्च को गिरि प्रदक्षिणा और 17 की शाम को पालकी सेवा दर्शन होंगे।

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