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भारत और नेपाल विवाद की हकीकत:मोदी की तरह हैं नेपाल के ओली, नेशनलिस्ट एजेंडा चाहते हैं ताकि हिमालयी देश की सियासत में बने रहें

3 महीने पहलेलेखक: उद्धब प्याकुरेल, काठमांडू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर
फोटो पिछले साल का है। तब नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत यात्रा पर आए थे। दोनों देशों के बीच हालिया वक्त में विवाद तेज हुए। (फाइल)
  • नरेंद्र मोदी और केपी शर्मा ओली दोनों ही कट्टर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव जीते
  • मोदी और ओली दोनों ही विस्तारवाद के खिलाफ बोलते हैं, इस मामले में नाम अलग हैं

भारत और चीन के बीच जारी तनाव के बीच नेपाल फैक्टर भी सामने आया। माना जा रहा है कि नेपाल में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री ओली की सरकार चीन को ज्यादा तवज्जो दे रही है। 8 मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 80 किलोमीटर लंबी लिपुलेख-धाराचूला सड़क का उद्धाटन किया तो नेपाल ने आपत्ति जताई।

इससे पहले उसे कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधूरा को भारत के नक्शे में दिखाए जाने पर ऐतराज था। भारतीय सीमा से लगी पोस्ट्स पर नेपाली सेना भी तैनात की गई। यह पहली बार हुआ। ताजा तनाव के मद्देनजर दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बात सबसे जरूरी है। क्योंकि, नीति और निर्णय दोनों उन्हीं के हाथ में हैं।

मोदी और ओली में फर्क नहीं: तीन बातों से समझें

1. दोनों राष्ट्रवाद या कहें कट्टर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर सत्ता में आए। हालांकि, दोनों का पॉलिटिकल बैकग्राउंड अलग है। मोदी ने नेपाल के खिलाफ कुछ आर्थिक दिक्कतें खड़ीं कीं। ओली ने इस मुद्दे को चुनाव जीतने के लिए भुनाया। अगर ये नहीं होता तो ओली सत्ता में भी नहीं होते।
2. दोनों नेता नए तरह या कहें 21वीं सदी के पूंजीवाद में यकीन रखते हैं। हालांकि, मोदी जहां हिंदुत्व की बात करते हैं वहीं ओली कम्युनिस्ट विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। 
3. तीसरा बिंदू रोचक है। दरअसल, दोनों विस्तारवाद के खिलाफ हैं। मोदी जहां चीन के विस्तारवाद का विरोध करते हैं वहीं, ओली भारत पर विस्तारवाद का आरोप लगाते हैं। हालिया घटनाएं इसकी मिसाल हैं।  

भारत-नेपाल के बीच विवाद की वजह चीन नहीं
एक या दो मौकों पर ऐसा हुआ जब नेपाल के मामले में कोई फैसला लेने से पहले भारत और चीन ने एक-दूसरे को भरोसे में लिया। कालापानी और लिपुलेख का मामला ऐसा ही है। नेपाल 29 अप्रैल 1954 को तिब्बत पर हुए भारत-चीन समझौते से अच्छी तरह से वाकिफ है। जहां पहली बार लिपुलेख को भारतीय तीर्थयात्रियों को इजाजत देने वाली 8 बॉर्डर में शामिल किया गया था।

8 मई को राजनाथ ने जिस सड़क का उद्घाटन किया, वह 2015 में मोदी की चीन यात्रा के दौरान लिपुलेख के जरिए ट्रेड रूट बढ़ाने के लिए भारत और चीन के बीच हुए समझौते का ही हिस्सा है। इस मामले की जानकारी जब नेपाल के उस वक्त पीएम रहे सुशील कोइराला को मिली थी तो उन्होंने भारत और चीन दोनों को डिप्लोमेटिक नोट भेजकर इसका विरोध किया था। 

चीन का सतर्क रवैया
कालापानी मामले पर जब भारत और नेपाल का विवाद हुआ तो चीन ने दोनों देशों को दोस्ताना बातचीत के जरिए मामला सुलझाने की सलाह दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा- दोनों देशों को एकतरफा कार्रवाई से बचना चाहिए। इससे मामला ज्यादा उलझ सकता है। चीन के बयान से यह साफ नहीं होता कि वो किसकी कार्रवाई को एकतरफा कार्रवाई बता रहा है। 

भ्रम इसलिए भी पैदा हुआ क्योंकि यह मामला तो पांच साल पहले ही मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत उठ चुका था। तो क्या चीन के बयान के मायने ये हैं कि वो सिर्फ नेपाल को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वो अपनी तरफ से नया नक्शा जारी न करे। 

दस्तावेज क्या कहते हैं?
दस्तावेज बताते हैं कि अंग्रेजों ने नक्शा बदलकर जो इलाका नेपाल से छीना था, उस पर भारत में तब की ब्रिटिश हुकूमत का अधिकार नहीं था। नेपाल में 1959 में चुनाव हुआ। तब लिम्पियाधुरा के लोगों ने इसमें हिस्सा लिया। 1961 में नेपाल में जो जनगणना हुई उसमें भी यह नेपाल का ही हिस्सा था। लेकिन, उसके बाद यह हिस्सा नेपाल से अलग होता चला गया। 

(प्रोफेसर उद्धब प्याकुरेल जेएनयू से पीएचडी हैं और फिलहाल काठमांडू यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल सोश्योलॉजी पढ़ाते हैं)

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