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पूर्व PM लाल बहादूर शास्त्री की मौत आज भी पहेली:बेटे अनिल की मांग नेताजी की तरह शास्त्रीजी की मौत से जुड़ीं फाइलें सार्वजनिक हों

वाशिंगटन/वाराणसीएक महीने पहले
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ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर के बाद 11 जनवरी 1966 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत आज भी पहेली बनी हुई है। उनके बेटे अनिल शास्त्री ने 21 साल पहले आई अमेरिकी पत्रकार ग्रेगरी डगलस की किताब ‘कन्वर्सेशन विथ क्रो’ के दावों के आधार पर उनकी मौत की जांच करने की मांग की है। इस किताब में ग्रेगरी ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के तत्कालीन संचालक रॉबर्ट टर्नबुल क्रॉली से बातचीत के आधार पर दावा किया है कि शास्त्री जी और परमाणु वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा की हत्या में सीआईए का हाथ था।

शास्त्री जी की मौत के 15 दिन बाद ही विमान हादसे में भाभा की मौत हुई थी। इस किताब के मुताबिक सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) ने शास्त्री और भाभा की हत्या इसलिए की क्योंकि वे परमाणु ऊर्जा के मामले में भारत का नेतृत्व कर रहे थे और अमेरिका इसे रोकना चाहता था। किताब के दावों पर CIA के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडेल भास्कर को बताते हैं कि इस दावे में कोई दम नहीं है।

शास्त्रीजी की मौत से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक हों- अनिल शास्त्री

यह फोटो पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री की हैं। अनिल ने शास्त्री जी मौत के पीछे CIA का हाथ होने के दावों की जांच करने की मांग की है।
यह फोटो पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री की हैं। अनिल ने शास्त्री जी मौत के पीछे CIA का हाथ होने के दावों की जांच करने की मांग की है।

शास्त्री जी के बेटे अनिल बताते हैं कि देश के करोड़ों लोगों के मन में शास्त्री जी की मौत को लेकर संदेह है। ऐसे में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ही तरह शास्त्रीजी की मौत से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। वे कहते हैं कि आरटीआई के जरिए प्रधानमंत्री कार्यालय से शास्त्री जी की मौत के बारे में जानकारी मांगी गई थी। इस पर जो जवाब मिला, वो संदेह पैदा करता है। कहा गया कि उनकी मौत से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किए गए तो हमारा एक मित्र देश नाराज हो जाएगा। यह बात समझ से परे है।

ताशकंद में शास्त्रीजी के कमरे में फोन भी नहीं था
अनिल शास्त्री बताते हैं कि जनता पार्टी सरकार ने शास्त्रीजी की मौत की जांच कराई थी। बाद में यह रिपोर्ट गुम हो गई। वे कहते हैं कि उस समय के जो गवाह हैं, उनके अनुसार लापरवाही का आलम यह था की शास्त्री जी के कमरे में फोन नहीं था। जब तबीयत बिगड़ी तो पैदल चल कर अस्पताल जाना पड़ा। उनका दावा है कि उस समय पत्रकार कुलदीप नायर को भारत के राजदूत ने फोन करके कहा था कि शास्त्री जी की मौत के बारे में अगर कोई पूछे तो वह बताएं कि मौत साधारण थी। ये बातें संदेह पैदा करती हैं।

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