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मध्यप्रदेश के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट:सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर के 5 गांवों में जिंदगी 15 महीने पहले जैसी, 3 वजहों से यहां कोरोना नहीं पहुंच पाया

एक महीने पहले
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कोरोना से 15 महीने में 2.90 लाख से ज्यादा मौतों का दर्द सहने वाले देश में एक जगह ऐसी भी है, जहां 2 साल से कोई मौत नहीं हुई। तीन राज्य मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र की सीमाएं जहां मिलती हैं, उस थ्री स्टेट पॉइंट के टापुओं के 5 गांवों में जिंदगी 15 महीने पहले जैसी है। इन 5 गांवों में डॉक्टर, नर्स और अस्पताल के नाम पर कुछ भी नहीं है। गांव के लोग कहते हैं- आज तक इनकी जरूरत भी नहीं पड़ी। पढ़ें, मध्यप्रदेश के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट...

1. दो हजार की आबादी, सभी सेहतमंद
- थ्री स्टेट पॉइंट से राजेंद्र दुबे और शरद गुप्ता की रिपोर्ट

यहां मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के चिल्कादा, खोदअंबा, जल्सिंधी गांव और महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले के रोशामाल्ख, चितखेड़ी गांव सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर क्षेत्र में बसे हैं। इन गांवों में 415 मकान हैं, जिनमें 2000 लोग रहते हैं। ये सभी स्वस्थ्य हैं। यहां किसी को भी टीका नहीं लगा।

अलीराजपुर से 60 किमी दूर इस दुर्गम क्षेत्र तक पहुंचने में भास्कर टीम को 4 घंटे लगे। दो ऊंचे पहाड़ों को पार करने के बाद 5 किमी पैदल सफर किया, तब सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर के किनारे तक जा सके। यहां नाव से एक किमी का सफर तय कर उन टापुओं तक पहुंचे, जहां आदिवासी रहते हैं।

सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर में बने टापू।
सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर में बने टापू।

एक टापू पर बहादुर नाम का व्यक्ति अपनी झोपड़ी में परिवार के साथ मिला। बोला- देखो मैं तो एकदम ठीक हूं। ये चिल्कादा गांव है। यह 7 फलियों में बसा है। इस फलिए में 18 मकान है। सभी मकान दूर-दूर हैं, इसलिए संक्रमण की संभावना नहीं है।

उपसरपंच तरजू पिता नीमड़िया कहते हैं कि यहां दो साल में कोई बीमार नहीं हुआ। एक मौत भी नहीं हुई है। फलिए के पटेल केवसिंह पिता जादू ने बताया- पांचों गांव में किसी ने वैक्सीन नहीं लगवाई, हमें इसकी जरूरत भी नहीं है।

टीचर नाहरसिंह मंडलोई कहते हैं कि इन 5 गांव में न तो डॉक्टर हैं और न ही अस्पताल। कोई बीमार होता है तो इन गांवों से सटे गुजरात के छोटा उदयपुर जिले में जाते हैं, लेकिन अभी दो साल से जाने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

नौका विहार करने वालों की संख्या घटी
नाव चला रहे कांति कहते हैं कि कोरोना के कारण पिछले 15 महीने में हमारी जिंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। हालांकि, यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या कम हो गई है। पहले रोज 15-20 परिवार आते थे। अभी 3-4 ही आ रहे हैं। इससे कमाई कम हुई, लेकिन इसकी भरपाई मछलियां पकड़कर कर लेते हैं।

8-10 टापुओं पर झोपड़े बनाकर खेती कर रहे आदिवासी
सरदार सरोवर बांध का बैकवाटर इन दिनों कम हो गया है। इसलिए यहां के 8-10 टापुओं पर आदिवासी झोपड़े बनाकर रह रहे हैं। वहीं पर खेती भी कर रहे हैं।

बैकवाटर का पानी उतरने के बाद आदिवासियों ने यहां खेती के लिए झाेपड़े बना लिए हैं।
बैकवाटर का पानी उतरने के बाद आदिवासियों ने यहां खेती के लिए झाेपड़े बना लिए हैं।

नाहरसिंह ने बताया पास के टापू पर धर्मेंद्र परिवार के साथ रह रहा है। उसके आगे के टापू पर वीरेंद्र ने झोपड़ा बना लिया है। यहां सभी लोगों को जमीन के बदले मुआवजा मिल चुका है, लेकिन जब पानी उतरता है तो ये खेती करने टापुओं पर पहुंच जाते हैं।

यहां कोरोना नहीं पहुंचने के ये 3 कारण- मकान दूर-दूर बने हैं, जिससे सालों से सोशल डिस्टेंसिंग बनी हुई है।

  • रोज पहाड़ चढ़ते-उतरते हैं। तैरना इनकी दिनचर्चा में शामिल, इसलिए इम्युनिटी मजबूत है।
  • डेढ़ साल पहले जो मजदूर शहर से लौटे, वे वापस नहीं गए। इसलिए संक्रमण नहीं फैला।

2. कोरोना की तीसरी लहर का डर, फिर भी मुरैना के दो गांव में नहीं पहुंची वैक्सीन
- मुरैना जिले के गांवों से सुमित दुबे और श्रीकांत त्रिपाठी की रिपोर्ट

मुरैना जिले के पहाड़गढ़ इलाके के बघेवर और निरार गांव में अब तक एक भी व्यक्ति को टीका नहीं लगा। इस आदिवासी बहुल क्षेत्र के 500 से ज्यादा आबादी वाले कई गांव ऐसे हैं जहांं वैक्सीन तो पहुंची, लेकिन इक्का-दुक्का लोगों ने ही इसे लगवाया।

पहाड़गढ़ के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर डॉ. कुलेंद्र यादव का कहना है कि हमने तो गांव में टीम भेजी थी, लेकिन ग्रामीण ही वैक्सीन लगवाने तैयार नहीं तो हम क्या करें? सवाल इस बात का भी है कि वैक्सीनेशन के लिए जागरूक करने वाली टीम NGO, समाजसेवी और जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं?

मरा गांव के जगदीश आदिवासी बताते हैं कि गांव की आबादी 2200 है, लेकिन गांव में रहने वाले 60 साल से ज्यादा उम्र की डोकरा-डुकरियां (बुजुर्ग) ही वैक्सीन लगवाकर आए हैं। इनकी संख्या लगभग 30 है।

वहीं, गांव की 65 साल की बादामी आदिवासी से जब वैक्सीन के बारे में पूछा गया तो तपाक से बोलीं- हां, हमने वैक्सीन लगवाए लई। दोनों डोज लेने के बारे में उनका जवाब चौंकाने वाला था। बोलीं- मैंने तो 8 दिना में दोऊ वैक्सीन लगवाए लई।

अकेली बादामी देवी ही नहीं, मरा गांव की चौपाल पर बैठे सुख्खा आदिवासी, रमलू से जब वैक्सीनेशन के बारे में पूछा तो उनका एक ही जवाब था कि हां गांव में सबको वैक्सीन लग गई। हकीकत तो यह है कि 2200 की आबादी वाले मरा गांव में 60 साल से ज्यादा उम्र के 30 लोगों का ही वैक्सीनेशन हुआ है।

ऐसे ही 1200 की आबादी वाले ऊपरी बहराई गांव में 20,900 की आबादी वाले निचली बहराई में सिर्फ 10 लोगों को वैक्सीन लगी है। यह हालात तब हैं, जब गांव में स्वास्थ्य विभाग की टीम गुरुवार को वैक्सीनेशन के लिए दिनभर बैठी रही। आदिवासी क्षेत्रों में बुखार और सर्दी खांसी होने पर लोग जांच कराने में भी पीछे हट रहे हैं। लापरवाही का आलम यह है कि जब भास्कर टीम मरा गांव में पहुंची, तो यहां शादी की दावत चल रही थी।

श्यामपुर खुर्द में गांव में बाहरी एंट्री बंद, घर-घर ढूंढे सर्दी-जुकाम के मरीज
दिमनी इलाके की श्यामपुर खुर्द पंचायत। यहां 3500 से ज्यादा आबादी है, लेकिन अब तक एक भी व्यक्ति कोरोना संक्रमित नहीं है। वजह है स्व सहायता समूह की महिलाएं, जो गांव को कोरोना संक्रमण से बचाने में जुटी हैं।

महिलाओं की मुखिया रजनी बताती हैं कि हमारे साथ 10 सदस्य हैं, जो गांव में बने पंचायत भवन और स्कूल पर निगरानी करती हैं। हर वक्त दो महिलाएं गांव से बाहर आने वाले लोगों से पूछताछ करती हैं। कहां से आए हो, कहां जाना है और कौन आपका रिश्तेदार हैं। गांव का दामाद हो या रिश्तेदार, तापमान जांचने के बाद ही उसे इस शर्त पर एंट्री दी जाती है कि आप अपने रिश्तेदार के घर में क्वारैंटाइन ही रहेंगे। गांव में नहीं घूमेंगे।

स्व सहायता समूह की महिलाएं, जो लोगों की सेहत और आने-जाने वालों पर लगातार नजर रखती हैं।
स्व सहायता समूह की महिलाएं, जो लोगों की सेहत और आने-जाने वालों पर लगातार नजर रखती हैं।

रजनी कहती हैं कि इसका परिणाम यह है कि पहली लहर हो या दूसरी लहर, आज तक गांव का कोई भी व्यक्ति कोरोना संक्रमित नहीं हुआ। वहीं, वैक्सीनेशन के मामले भी 45 साल से ज्यादा 80 फीसदी लोगों को पहला टीका लग चुका है। गांव के स्व सहायता समूह शिवाय की दस महिलाएं न सिर्फ घर-घर जाकर लोगों के स्वास्थ्य का हाल जान रहीं हैं, बल्कि उन्हें निशुल्क दवाएं, मास्क और सेनेटाइजर भी बांट रही हैं।

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