इलेक्शन एनालिसिस / मर्यादाहीन नेता: कमेंट पर ताली ठोकने के बजाय बायकॉट करें



सुधीर चौधरी

सुधीर चौधरी

Jul 27, 2019, 11:37 PM IST

इस बार लोकसभा चुनाव का प्रचार आज़ाद भारत के सबसे निम्नतम स्तर पर है। विवादित बयान तो हमेशा आते रहे हैं लेकिन इस बार इन्होंने नैतिक मर्यादाओं को बुरी तरह तोड़ डाला हैं। रामपुर से सपा उम्मीदवार आजम खान की प्रतिद्वंद्वी भाजपा उम्मीदवार जयाप्रदा को लेकर की गई टिप्पणी बेहद मर्यादाहीन टिप्पणी है। इसमें भी हद यह है कि आजम खान को अपनी टिप्पणी पर कोई पछतावा तक नहीं है। माफी मांगना तो दूर उन्होंने खेद तक नहीं जताया।

 

एक और बयान में वह सरकारी अफसरों से जूते साफ करवाने की बात भी कह गए। हैरानी की बात यह है कि इन दोनों बयानों के समय जनता तालियां बजाकर आजम खान की हौसला अफजाई करती नजर आई। भारतीय राजनीति का यह सबसे दु:खद दौर है। लोग नेता की उस भाषा पर तालियां पीट रहे हैं जो उन्हें अपने परिवार के किसी सदस्य के लिए कभी भी मंजूर नहीं होगी। चुनाव आयोग ने भी आजम खान पर प्रतिबंध की रस्मअदायगी कार्रवाई की। वोट की खातिर धर्म का बंटवारा करने में मायावती भी पीछे नहीं रहीं।

 

उन्होंने बीजेपी का डर दिखाते हुए मुसलमानों से वोट मांग लिए। यही काम मेनका गांधी ने भी किया। नवजोत सिद्धू की भाषा भी गैर-जिम्मेदाराना रही। उन्होंने कटिहार में मुसलमानों को डराया कि वह एक साथ नहीं आए तो मोदी सरकार बन जाएगी। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को ‘तू’ और ‘चोर’ तक कहा। ये उदाहरण बताते हैं कि अमर्यादित भाषा के जहरीले बाण वोट बैंक भेदते हैं। स्त्रियों पर की जाने वाली फब्तियों पर तालियां बजती हैं। हालांकि, इन बयानों की निंदा हुई है लेकिन सवाल यह है कि क्या ये नेता सुधर जाएंगे?

 

यह नेता चुनाव आयोग और अदालत से डरते क्यों नहीं? बदजुबान नेताओं पर लगने वाले प्रतिबंध आधे-अधूरे और सांकेतिक हैं। मेरा सुझाव है कि इसे असरदार बनाने के लिए ऐसे नेताओं के प्रचार पर प्रतिबंध लगना चाहिए और मीडिया को इन नेताओं को पूरी तरह ब्लैक आउट करना चाहिए। अमर्यादित नेताओं के साथ उनकी पार्टियों पर भी ठोस कार्रवाई होनी चाहिए।

 

चुनाव आयोग अपनाए जीरो टॉलरेंस नीति 

अभी पार्टियां यह कहकर बचती हैं कि अमर्यादित टिप्पणी नेताओं की निजी राय थी। जब अमर्यादित टिप्पणियों की वजह से पार्टियों के प्रचार बंद होंगे तो पार्टियां भी नेताओं को काबू में रखेंगी और इनके एक-एक शब्द का ऑडिट करेंगी। चुनाव आयोग को ऐसे नेताओं के प्रति ‘जीरो टॉलसेंस’ की नीति अपनानी चाहिए। दो-चार नेताओं के चुनाव रद्द कर देने चाहिए। लेकिन चुनाव आयोग की समस्या यह है कि हमारी  सरकारों ने उसे कभी इतनी शक्तियां दी ही नहीं कि वो बदजुबान नेताओं का कुछ बिगाड़ पाए।

 

चुनाव आयोग ने अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वह सुधारों के लिए 1998 से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेज रहा है। 2004 में ही आयोग ने चुनाव प्रक्रिया में सुधार के 22 प्रस्ताव भेजे थे। यूपीए-2 में तो आयोग ने दो बार तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखी थी। लेकिन उस पर कोई काम नहीं हुआ। 2016 में 47 प्रस्ताव सरकार के पास गए लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। यानी चुनाव आयोग भी चिठ्ठियां लिख-लिखकर थक गया। अब आखिरी सवाल आप सब से। ऐसा क्यों होता है कि कोई नेता, जितनी ज्यादा बदज़ुबानी करता है, मर्यादा की जितनी सीमाएं तोड़ता है और भाषाई स्तर पर जितना ज्यादा गिरता है वह उतना ही बड़ा स्टार प्रचारक बनता है? 

 

नवजोत सिद्धू और आजम खान जैसे लोग स्टार प्रचारकों में गिने जाते हैं। सिद्धू तो यह दावा तक करते हैं कि इस बार कांग्रेस के चुनाव प्रचार में उनकी सबसे ज्यादा डिमांड है। स्टार प्रचारक वही बनते हैं जो सभाओं में ज्यादा भीड़ खींच पाएं और पार्टी को मीडिया में बड़ी-बड़ी हेडलाइन दिलवा पाएं। इससे वोट भले ही ना मिलें लेकिन भीड़ की गारंटी होती है। इसके लिए एक हद तक लोग भी जिम्मेदार हैं, वो भीड़ भी जिम्मेदार है, जो इनकी सभाओं में आती है, जो गाली पर ताली ठोंकती है। इसीलिए तो सिद्धू बोलते हैं कि ठोको ताली और जनता ताली ठोक देती है।

 

अपनी तालियों को बर्बाद मत कीजिए, इन्हें इतना सस्ता मत बनाइए। लोकतंत्र में तालियां बहुत कीमती हैं। संस्कारी समाज वाले देश में लोग इतनी अमर्यादित भाषा कैसे बोल सकते हैं? भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है.. तो क्या यह सबसे गंदा लोकतंत्र भी है? 70 साल से हर चुनाव के साथ प्रचार के स्तर में गिरावट आ रही है। आज स्थिति ऐसी है कि चुनाव प्रचार का स्तर गली-मोहल्लों के गुंडों जैसा है। जिसमें वो कहते हैं वोट दे दो नहीं तो....

 

मैंने सरकारों को देखा, चुनाव आयोगों को देखा, अदालतों को भी देखा, कोई इन नेताओं का कुछ नहीं बिगाड़ पाया। आखिरी उम्मीद देश की जनता है। अपने सोए संस्कारों को जगाइए। देश को अपना परिवार मानिए और अनैतिक और अमर्यादित नेताओं की भीड़ में शामिल होना बंद कीजिए, इनकी गाली पर ताली बजाना बंद कीजिए और अपने वोट के जरिए इन पर सर्जिकल स्ट्राइक कीजिए। जिस दिन ऐसे नेताओं को आपकी तरफ से कड़ा जवाब मिलने लगेगा, उसी दिन से इनकी भाषा भी संस्कारी हो जाएगी। इस चुनाव के अभी 5 चरण बाकी हैं। इस फॉर्मूले को अब से ही ट्राई कीजिए।

 

(लेखक जी न्यूज के एडिटर इन चीफ हैं। प्राइम टाइम शो- डीएनए के लिए मशहूर)

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