पुणे / बेटी बोली- हमने पेड़ों को मरने क्यों छोड़ दिया, पिता ने 2 साल में पेड़ों से 80 हजार कीलें निकलवाईं



माधव पाटिल को जहां भी पेड़ों पर कील दिखती है, वे उसे निकलने पहुंच जाते हैं। माधव पाटिल को जहां भी पेड़ों पर कील दिखती है, वे उसे निकलने पहुंच जाते हैं।
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माधव पाटिल को जहां भी पेड़ों पर कील दिखती है, वे उसे निकलने पहुंच जाते हैं।माधव पाटिल को जहां भी पेड़ों पर कील दिखती है, वे उसे निकलने पहुंच जाते हैं।

  • पेशे से इंजीनियर पाटिल माधव इस मुहिम को चला रहे हैं, जब उनके दोस्तों को पता चला तो वे भी साथ आ गए
  • इससे पुणे, मुंबई, सातारा, भंडारा, नासिक जैसे शहरों में लोग जुड़े
  • ट्री एक्ट 1975 के अनुसार, पेड़ों को हानि पहुंचाना अपराध है, पेड़ सार्वजनिक संपत्ति हैं

Dainik Bhaskar

Sep 23, 2019, 10:32 AM IST

पुणे (मंगेश फल्ले).  2017 की बात है। पांच साल की हिरकणी अपने पिता माधव पाटिल के साथ कोलकाता में दीवाली की छुट्टियां बिताकर लौटी थी। सुबह जब पाटिल गमलों में लगे मुरझाए पौधों को पानी दे रहे थे, तब हिरकणी ने पूछा कि ‘पापा यह पौधे मुरझा क्यों गए’? पिता ने बताया कि हम कई दिनों तक इनमें पानी नहीं दे पाए हैं, इसलिए। हिरकणी ने सहज ही पूछ लिया ‘हमने पेड़ों को मरने के लिए क्यों छोड़ दिया था?’ बेटी के सवाल ने उन्हें विचलित कर दिया। उन्हें लगा यह बात मैंने क्याें नहीं सोची, जबकि मैं जानता हूं कि पेड़ों में संवेदनाएं होती हैं। दो-तीन महीने यूं ही बीत गए। होली के दिन सड़क पर पेड़ों में ठोक दी गईं कीलों पर ध्यान गया। बैनर, विज्ञापन, होर्डिंग लगाने के लिए इस तरह पेड़ों पर कीलें ठोक देना उन्हें अच्छा नहीं लगा। 

 

बेटी की बात याद आई कि हम क्यों पेड़ों को मरने छोड़ देते हैं। उन्होंने कीलें निकालने के औजार खरीदे और काम शुरू कर दिया। मुहिम की शुरुआत पुणे के वड़गांव धायरी के पेड़ों से की। अब अक्सर उनकी छुट्टियां पेड़ों से कीलें निकालते हुए ही बीतती हैं। शहर में जहां भी पेड़ पर कील लगी दिखती है, उसे निकाल देते हैं।

 

पेड़ों की वेदना मिटाने मुहिम शुरू की

पेशे से इंजीनियर पाटिल आंघोलीची गोली नामक संस्था के कार्यकर्ता हैं। ‘आंघोलीची गोली’ मराठी शब्द है। इसका अर्थ है- स्नान की गोली। माधव कहते हैं कि पेड़ों की वेदना कम होनी चाहिए, इसलिए यह मुहिम जरूरी है। जब उनके दोस्तों को पता चला तो वे भी साथ आ गए। दो साल में ही पुणे, मुंबई, सातारा, भंडारा, नासिक जैसे शहरों में पेड़ों से 80 हजार से ज्यादा कीलें निकालने का काम वे संस्था के साथ कर चुके हैं। अभी भंडारा, अहमदनगर, सोलापुर, पुणे, मुंबई, नवी मुंबई, पनवेल में भी पेड़ों को कील-मुक्त करने की मुहिम चल रही है।

 

कीलों से शिवाजी की प्रतिमा बने 

माधव कहते हैं कि ट्री एक्ट 1975 के अनुसार पेड़ों को हानि पहुंचाना अपराध है। रास्तों पर लगे पेड़ सार्वजनिक संपत्ति हैं और उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। पेड़ों से निकाली गईं कीलों से छत्रपति शिवाजी की प्रतिमा तैयार की जानी चाहिए, ताकि लोगों के बीच यह संदेश पहुंचे कि हम लोगों ने कितनी कीलें ठाेककर पेड़ाें को दर्द पहुंचाया है। 

 

पांच हजार रुपए का जुर्माना हो सकता है
पुणे में ही 60 हजार, मुंबई में 10 हजार कीलें निकाली गई हैं। राज्यभर में 500 से अधिक कार्यकर्ता मुहिम से जुड़े हैं। माधव के प्रयासों से पिंपरी-चिंचवड़ के आयुक्त ने सार्वजनिक पेड़ों पर कीलें ठोकने को अपराध घोषित कर दिया है। ऐसा करने पर पांच हजार रुपए दंड या तीन महीने की सजा हो सकती है।

 

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