यह मामला शीश का भी है और दिलों का भी - कुमार विश्वास की व्यंग्य शृंखला

4 वर्ष पहले
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‘कोई इलाज नहीं है महाकवि इन सब का?’, प्रत्येक देशवासी की तरह हाजी पंडित भी दुःख और गुस्से के मिले-जुले भाव में दिख रहे थे। मैंने कहा, ‘इलाज तो है। लेकिन कोई करने को तैयार तो हो!’ हाजी बिना आंखें उठाए जानने को उत्सुक हुए, ‘लेकिन शुरू कहां से करें?’ रोष मुझमें भी बहुत था, ‘मैंने तो ट्वीट भी कर दिया हाजी।

 

 

सवाल बड़ा है और उसको एड्रेस करने के लिए समय और इच्छाशक्ति दोनों की जरूरत है। लेकिन कम से कम शुरुआत करने के लिए देश में रहकर देश बांटने की मानसिकता रखने वाले इन अलगाववादियों और हमारे टैक्स के पैसों पर पल रहे कुछ दोमुंहे नेताओं के पृष्ठ भाग पर भीषण पद-प्रहार कर इनके वांछित नरक पाकिस्तान भेज दिया जाना चाहिए, जहां इन्हें लोकतंत्र का मतलब पता चल जाएगा।’

 

हाजी ने स्वीकार में सिर हिलाया लेकिन शायद एक-दूसरे से नजरें मिलाने की हिम्मत हम दोनों में ही न थी। हाजी बोले, ‘हां, शायद उन पर कुछ एक्शन लिया तो है सरकार ने। मैंने भी किसी से सुना भर है, महाकवि। अखबार पढ़ने की हिम्मत तो अब भी नहीं हो रही।’ 

 

हाजी अचानक चौंककर बोले, ‘तुमने अपने वी द नेशन वीडियो में इस बात का जिक्र भी किया था न? मुझे याद आ रहा है कुछ ऐसा कहा था तुमने।’ मुझे याद था, ‘हां हाजी! कहा तो मैंने तब ही था कि देश की एकता की खिलाफत करने वाले इन तमाम तथाकथित नेताओं को काहे को सुरक्षा? इन्हें देश में किस से खतरा है? बल्कि देश को ही इनसे खतरा है। इनकी सुरक्षा वापस लेने का काम तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। और वो मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा था। क्यों जरूरत है उसकी भई? ऐसा क्या है पाकिस्तान में जो इस पार नहीं आएगा तो हमारी जान को आफत हो जाएगी? 

 

सबसे बड़ी बात तो ये है हाजी, कि कब तक धूल को कालीन के नीचे सरकाकर हम आंख बंद किए बैठे रहेंगे। एक बार जी-जान लगाकर, सब लोगों को ध्यान में रखकर एक मजबूत कदम उठाया जाए और फिर देखते हैं कौन देश के बेटों की तरफ नजर उठाकर देखता है।’

 

हाजी ने पहली बार नजर उठाई, ‘ठीक कहते हो महाकवि! एक बार सोच-समझकर ऐसा कदम उठा ही लिया जाना चाहिए कि दुनिया भर को संदेश चला जाए कि हम इतने आसान नहीं हैं जैसा कुछ लोग समझने की गलती करते रहे हैं। बस यही है कि सबका ध्यान रखकर फैसला लेना होगा। मामला शीश का भी है और दिलों का भी। उदय प्रताप जी का शेर सुनाते हो न तुम

 

‘सब फैसले होते नहीं सिक्के उछाल के
ये दिल के मामले हैं, जरा देख भाल के’