--Advertisement--

महाभारत 2019 / सारी खुदाई जिधर, जोरू का भाई भी उधर- कुमार विश्वास की व्यंग्य श्रृंखला



Mahabharat election satire by kumar vishwas
X
Mahabharat election satire by kumar vishwas

  • कुमार विश्वास के 52 व्यंग्यों की सालभर चलने वाली शृंखला 

Dainik Bhaskar

Nov 05, 2018, 09:43 AM IST

हाजी पंडित चहकते हुए अंदर आए और पॉल्युशन मास्क के अंदर से ही झांककर बोले, 'देखा महाकवि! मुझे बहुत चिढ़ाते थे कि शादी नहीं हुई। अब सोचो, अगर मेरा साला दूसरी कंम्पनी का पैकेज लेकर गंगा-स्नान कर आता तो मेरा भी शिवराज हो जाता! जैसे मामू के बच्चों ने मामू को मामू बना दिया, वैसे ही मेरा भी हो जाता।'

 

मैंने हाजी के मज़े लिए, 'तुम्हारा साला किसी और की एजेंसी से तीर्थ कर आता तो तुम्हारी तो खुदाई भी जाती और जोरू का भाई जाता सो अलग।' पॉल्युशन मास्क को उतारकर एक तरफ रखकर हाजी ने ऐसे सांस ली जैसे पोलिंग के बाद ईवीएम जमा करके कोई रिटर्निंग ऑफिसर चैन की सांस लेता है। 

 

फिर बोले, 'ऐसा है महाकवि, इस बार तो मध्यप्रदेश में यह कहावत भी बदल गई। ऐसा लग रहा है कि इस नई हवा में सारी खुदाई जिधर जाती दिख रही है, जोरू का भाई भी उधर को ही निकल लिया। इनका बस चले तो रामलाल की बारात में जाएं और श्यामलाल के यहां अच्छा बैंड बज रहा हो तो उसके यहां नाचने लग जाएं!' 'मतलब हाजी, तुम मान रहे हो कि इस बार श्यामलाल का बैंड अच्छा बज रहा है?'

 

मैंने बात की नब्ज़ पकड़ी और फिर अपने अपडेटेड होने का संकेत दिया, 'हाजी, राजस्थान की डोली तो इस बार गई ही गई पराए आंगन में। मुझे तो अब मध्यप्रदेश का भी सेंटर ऑफ मास हिला हुआ दिख रहा है।' हाजी अब तक सांसों को लय में ला चुके थे, 'सेंटर तो पूरा ही हिला पड़ा है महाकवि! पेट्रोल का जला डॉलर को फूंक-फूंककर पी ही रहा था कि तोतों की चोंचें लड़ गईं। 


उधर, रफाल किसी मिसगाइडेड मिसाइल की तरह भाजपा के नवेले ऑफिस पर ऐसे मंडरा रहा है, जैसे अभी उसका इराक कर देगा। इधर, साधुओं का जत्था अलग राजधानी पहुंच गया है कि मंदिर कब बनाओगे। ऐसे में तो महाकवि, कुछ भी कह पाना मुश्किल है।' मैंने कहा, 'हां, हाजी, मुद्‌दे तो बहुत सारे हैं लेकिन, कांग्रेस भी तो हाथों में छन्नी लिए समंदर से पानी निकालने में लगी हुई है। तीसरा कोई है नहीं जो कुछ कर सके।' हाजी को फिर अपना मनपसंद मुद्‌दा मिल गया, 'बन तो रहा था तीसरा मोर्चा।

 

तुम्हारे यारों ने ही खीर का रायता कर दिया। किया सो किया, फैला और दिया। अब समेटे नहीं सिमट रहा। जन लोकपाल की टोपी का कटोरा बनाकर अब चुनाव लड़ने के लिए चंदा मांग रहे हैं। चलें महाकवि धन के लिए तरस-तरसकर धनतेरस मनाओ। हम तो छड़े ठहरे सो न जोरू का डर न साले का! रही सियासत में परिवार टूटने की बात, तो इस पर शेर की बजाए आज न्यूटन का पांचवा नियम सुनो 'एवरी परिवारीकरण ऑफ पॉलिटिक्स हैज़ इक़्वल एंड अपोजिट पोलिटिकलाइज़ेशन ऑफ परिवार'! 

Bhaskar Whatsapp
Click to listen..