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भास्कर ओपिनियनकांग्रेस के झगड़े:माकन ने गहलोत-पायलट विवाद के जिन्न को फिर बोतल से निकाला

23 दिन पहले
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कांग्रेस पार्टी महान है। इसका कोई न कोई सदस्य, नेता, पार्टी की राह में गड्ढे खोद ही लेता है। कांग्रेस नेता अजय माकन ने राजस्थान प्रभारी की अपनी ज़िम्मेदारी छोड़ दी है। नए अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर कह दिया है कि कोई दूसरा प्रभारी देख लीजिए।

पार्टी अध्यक्ष पद पर बैठने के बाद मल्लिकार्जुन खडगे के सामने यह पहली बड़ी परेशानी आई है। दरअसल, खडगे और माकन पिछले महीने जब पायलट और गहलोत का झगड़ा सुलझाने राजस्थान गए थे, तब गहलोत समर्थक विधायकों ने इन पर्यवेक्षकों द्वारा बुलाई गई बैठक में जाने की बजाय मंत्री शांति धारीवाल के घर एक समानांतर बैठक की थी और कुछ बयानबाज़ी भी की थी।

बाद में विवाद जब बढ़ा और माकन कार्रवाई पर अड़ गए तो धारीवाल सहित तीन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए नोटिस दिए गए थे। नोटिस दिए भी गए, लेकिन कुछ दिनों में ही बात आई-गई हो गई और नेता, कार्यकर्ता, यहां तक कि लोग भी इस वाकये या विवाद को लगभग भूल गए थे। पार्टी वापस पटरी पर आ रही थी।

गहलोत भी पिछले चुनावों की तरह अपनी ज़िम्मेदारी निभाने गुजरात दौड़ रहे थे। स्वयं राहुल गांधी भी उत्साह के साथ अपनी भारत जोड़ो यात्रा के साथ राजस्थान प्रवेश करने वाले हैं। ऐसे नाज़ुक वक्त में माकन साहब को ग़ुस्सा आ गया। उन्होंने राजस्थान के तीन नेताओं पर कार्रवाई नहीं होने के कारण प्रभारी पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

हालाँकि अध्यक्ष को यह चिट्ठी उन्होंने आठ नवम्बर को ही लिख दी थी, खुलासा अब हुआ है। अब सवाल उठता है कि होगा क्या? गहलोत गुजरात में वैसी रुचि नहीं रख पाएँगे जैसी ज़रूरत थी। दूसरे, गहलोत और पायलट गुट की खेमेबाज़ी और बढ़ जाएगी। बयानबाज़ी तो शुरू भी हो चुकी है। राहुल गांधी की यात्रा के राजस्थान प्रवेश पर भी यही विवाद छाया रह सकता है। भाजपा तो ऐसे मुद्दों को भुनाने में माहिर है ही। उसके बयान भी शुरू हो जाएँगे। कुल मिलाकर धीरे से पटरी पर आ रहा एक विवाद फिर से ज़ोर पकड़ लेगा और कार्यकर्ताओं का मनोबल फिर से एक नकारात्मकता की ओर जाना तय है।

पायलट समर्थक कुछ नेताओं ने तो बयान शुरू कर ही दिए हैं। देखना यह है कि माकन के इस कदम को गहलोत ख़ेमा किस तरह लेता है। … और सबसे बड़ी बात यह कि नए अध्यक्ष खडगे इसे किस तरह निबटाते हैं। मामला पेचीदा है क्योंकि जिस विवाद को लेकर यह सब हो रहा है उस के गवाह माकन के अलावा खुद खडगे भी रहे हैं। किसी निर्णय पर पहुँचना इसलिए भी खडगे के लिए कठिन होगा। लगता है फ़िलहाल इस विवाद को टाला जाएगा क्योंकि पार्टी गुजरात चुनाव के वक्त इस तरह के पेचीदा मुद्दे में पड़कर नया विवाद खड़ा होने का रास्ता नहीं खोलना चाहेगी।

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