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भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट:पालकी पर ले जाने की प्रथा पर घमासान, द्रविड़ पार्टियां और भाजपा के लोग भिड़े

चेन्नई9 दिन पहले
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तमिलनाडु की स्टालिन सरकार के एक आदेश ने राज्य में नया विवाद खड़ा कर दिया है। मयिलादुथुराई जिला प्रशासन ने धर्मपुरम अधीनम मठ के स्वामी को पालकी पर ले जाने की प्रथा पर रोक लगा दी है। इसके लिए कानून व्यवस्था और मानवाधिकार उल्लंघन का हवाला दिया गया है।

इसी के साथ द्रविड़ पार्टियों बनाम भाजपा के बीच सियासी तूफान खड़ा हो गया है। धर्मपुरम अधीनम शैव मठवासी संस्था है। 27वें प्रमुख मासिलामणि देसिका ज्ञानसंबंध परमचार्य स्वामीगल को 22 मईको ‘पट्टिना प्रवेशम’ में शामिल होना था।

मठ के धर्मगुरु ने सरकार को चुनौती दी

मदुरै अधीनम मठ के 293वें धर्मगुरु श्री घनसमंथा देसिक परमाचार्य स्वामीगल ने सरकार को चुनौती दी कि ‘पट्टिना प्रवेशम’ हर सूरत में होकर रहेगी, भले हमें जान क्यों न देनी पड़े।’ जिले के आरडीओ बालाजी ने दैनिक भास्कर से कहा, ‘आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी। कुछ समूह विरोध कर रहे हैं।

कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है।’इससे पहले 20 अप्रैल को मठ पहुंचे राज्यपाल आरएन रवि का वीसीके, सीपीआई, सीपीएम, डीवीके, एसडीपीआई, द्रविड़ कड़गम जैसे विभिन्न दलों ने विरोध किया। उन्होंने अधीनम की ‘ज्ञान रथ यात्रा’ को राज्यपाल द्वारा हरी झंडी दिखाए जाने पर भी आपत्ति जताई।

द्रविड़ कड़गम के जिला सचिव थलपति राज ने कहा, इंसानों को पालकी में ले जाने की प्रथा अस्वीकार्य है। वहीं राज्य भाजपा प्रमुख अन्नामलाई ने कहा, ‘सरकार विरोध करती है, तो मैं निजी रूप से पालकी अपने कंधों पर ले जाऊंगा।’

मदुरै अधीनम मठ के 293वें धर्मगुरु श्री घनसमंथा देसिक परमाचार्य स्वामीगल ने सरकार को चुनौती दी
मदुरै अधीनम मठ के 293वें धर्मगुरु श्री घनसमंथा देसिक परमाचार्य स्वामीगल ने सरकार को चुनौती दी

500 साल पुरानी है पालकी की परंपरा

राज्य में मठ प्रमुख को कंधों पर पालकी में घुमाने की परंपरा 500 साल पुरानी है। द्रविड़ कड़गम पार्टी ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताया है। इसी के बाद सरकार ने इस पर रोक लगा दी। हालांकि भाजपा ने प्रतिबंध को तमिल सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ बताया है।