एक्सपर्ट ओपिनियन / ईवीएम से मतदान रोकने के लिए पार्टियों ने उतार दिए थे 64 से ज्यादा प्रत्याशी

Dainik Bhaskar

Mar 20, 2019, 06:21 PM IST


एसवाय कुरैशी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त। एसवाय कुरैशी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त।
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एसवाय कुरैशी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त।एसवाय कुरैशी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त।
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  • ईवीएम में 64 उम्मीदवारों के नाम ही आ सकते हैं, इससे ज्यादा नाम होने पर मतपत्र से चुनाव करवाना पड़ता है

जुलाई 2010 की बात है। उस समय तेलंगाना आंदोलन तेजी पर था। आंध्र विधानसभा के 12 विधायकों ने इस मुद्दे पर इस्तीफा दे दिया था और वे उपचुनाव में दोबारा चुनाव लड़ रहे थे। उस समय भाजपा की वजह से ईवीएम के खिलाफ भी आंदोलन हो रहा था। टेक सैवी माने जाने वाले चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में दलों ने बैलेट पेपर से चुनाव की मांग की।

 

आयोग ने जब उनकी इस मांग को ठुकरा दिया तो उन्होंने चालाकी दिखाई। ईवीएम मशीनों में अधिकतम 64 प्रत्याशियों के नाम आ सकते थे। ऐसे में टीआरएस ने निर्दलीयों से बड़ी संख्या में नामांकन भरवा दिए। बड़े पैमाने पर नामांकन खारिज किए जाने के बावजूद 12 में से छह सीटों पर उम्मीदवारों की संख्या 64 से ज्यादा हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि आयोग को इन छह सीटों पर बैलट पेपर से मतदान कराना पड़ा।

 

लेकिन आयोग ने इस मौके को दोनों प्रणालियों की ताकत दिखाने के तौर पर लिया। जिन इलाकों में मतदान ईवीएम से हुआ था वहां के परिणाम तो चार घंटे में आ गए, लेकिन मतपत्रों वाले इलाकों में 40 घंटे लग गए। इसके अलावा हजारों वोट अवैध हो गए। बैलेट पेपर का खर्च और स्टाफ की लंबी ड्यूटी का अलग भार था। जबकि, दोनों ही प्रक्रियाओं में रिजल्ट एक सा था। इसलिए इस एक्सरसाइज से उन्हें क्या मिला? शून्य।

 

देखिए, उस समय ये राजनीतिक दल कहां थे? एक अखबार ने लिखा कि टीआएस ईवीएम का विरोध इसलिए कर रही है कि उसके पास पुख्ता सूचना है कि कांग्रेस मशीनों में गड़बड़ी कर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है। संयुक्त आंध्र प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष बंडारू दत्तात्रेय की टिप्पणी थी कि हमारी मांग है कि ईवीएम पर देशव्यापी बहस होनी चाहिए, टीआएस ने सही रणनीति अपनाई। कांग्रेस प्रवक्ता कमलाकर राव का कहना था कि पार्टियों द्वारा आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है और इस वजह से चुनाव आयोग को बैलेट पेपर छापने का अतिरिक्त खर्च करना पड़ा।

 

गीत अब भी वही है, पर गायकों की जगह आपस में बदल गईं
इस विवाद का असर यह हुआ कि चुनाव आयोग को अक्टूबर 2010 में एक सर्वदलीय बैठक बुलानी पड़ी। जिसमें तय हुआ कि इसका जवाब वीवीपैट (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल्स) होगा। जिन दो कंपनियां ने ईवीएम बनाई थीं, उन्हें वीवीपैट मशीनें बनाने को कहा गया। कई चरणों के ट्रायल व 2011 व 2012 में अलग-अलग वातावरण में इन मशीनों का डेमो हुआ। ये डेमो चेरापूंजी, दिल्ली, लेह, जैसलमेर और तिरुअनंतपुरम में किए गए। आवश्यक सुधार के बाद इन्हें 20,000 पोलिंग बूथों पर लगाया गया। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट लगाने के चुनाव आयोग के फैसले की सराहना की और केंद्र को इसके लिए फंड जारी करने को कहा, ताकि 2019 के चुनाव में पूरे देश में वीवीपैट का इस्तेमाल हो सके।

 

  • 2018 तक सभी राज्यों में विधानसभा चुनाव वीवीपैट से हुए। इसके अलावा करीब 1500 मशीनों की स्लिप को भी गिना गया, लेकिन मशीन में दर्ज वोट और स्लिप से गिने वोटों में कोई भी अंतर नहीं मिला। इससे तय हो गया कि वीवीपैट सर्वोत्तम समाधान है। 
  • यह देश का पहला लोकसभा चुनाव होगा जिसमें हर ईवीएम के साथ वीवीपैट मशीन होगी। सभी ईवीएम-वीवीपैट ले जाने वाले वाहन जीपीएस से ट्रैक होंगे।

 

लेखक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। साथ ही इन्होंने  ‘एन अनडॉक्यूमेंटेड वंडर- द मेकिंग ऑफ द ग्रेट इंडियन इलेक्शन’ नाम से किताब भी लिखी है।

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