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मुंबई में लॉकडाउन का डर बढ़ने लगा:फिर दिखी UP-बिहार जाने वाली भीड़, कंधे पर गृहस्थी उठाए ट्रेन में घुसने की जद्दोजहद और रोजगार छूटने का दर्द

मुंबई20 दिन पहले

तीसरी लहर की रफ्तार ने मुंबई को झकझोर दिया है। मुंबई में एक दिन में 20 हजार से ज्यादा केस सामने आने के बाद ही लोग भय और आशंकाओं से घिर गए हैं। लॉकडाउन का डर फिर सताने लगा है। साथ ही शुरू हो गई है प्रवासियों की जद्दोजहद, ​​​दर्द और बेबसी भरी वो दौड़... जिसे पिछले साल भी हमने देखा था।

एक बार फिर यूपी और बिहार जाने वाली ट्रेनें खचाखच भरने लगी हैं। रोजगार छूटने की बेबसी लिए लोग कंधे पर पूरी गृहस्थी लादे भागे चले जा रहे हैं। कतारों का कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा है। हर किसी को बस एक ही फिक्र है...ट्रेन में जगह पाने की, ताकि लॉकडाउन से पहले अपनों के बीच पहुंच सकें। सैकड़ों किलोमीटर का वह सफर न करना पड़े, जो पिछले साल कइयों के लिए जानलेवा बन गया था।

भास्कर रिपोर्टर राजेश गाबा जब गुरुवार रात मुंबई के लोकमान्य तिलक टर्मिनस रेलवे स्टेशन पहुंचे तो यही आपाधापी दिखी। उन्होंने फैसला किया रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक 12 घंटे यहीं गुजारने का, ताकि जान सकें कि लोगों पर डर और फिक्र किस कदर हावी है। 12 घंटे में बेबसी की कई कहानियां दौड़ती-भागती दिखीं। इनमें से 6 आपके लिए चुनीं। पढ़िए उन्हीं की जुबानी, जिन पर आफत का पहाड़ टूटा...

पहली कहानी में भरोसा उठने का दर्द

श्रवण कुमार कहते हैं कि जिनके भरोसे आए थे, उन्होंने भी साथ नहीं दिया।
श्रवण कुमार कहते हैं कि जिनके भरोसे आए थे, उन्होंने भी साथ नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में रहने वाले श्रवण कुमार वापस लौट रहे हैं। कहने लगे, "मैं यहां उत्तरप्रदेश से मंडप का काम करने आया था। अब घर जा रहा हूं, कल की ट्रेन है। यहां सब काम बंद है। सुन रहे हैं कि 12-15 तारीख को लॉकडाउन लग जाएगा। हमने जितना पैसा कमाया था, सब खत्म हो गया है। हजार-बारह सौ बचा है। इसमें ही किसी तरह अपने घर पहुंच जाएं। 4 दिसंबर को मुंबई आए थे और अब जा रहे हैं। दोबारा कभी मुंबई नहीं आएंगे। गांव छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे। सिर्फ नाम की मुंंबई है, यहां कोई किसी का नहीं। सब दिखावे की दुनिया। जिनके भरोसे आए थे, उन्होंने भी साथ नहीं दिया।"

दूसरी कहानी में लॉकडाउन का डर

जलालुद्दीन कहते हैं कि सूखी रोटी खा लेंगे, पर गांव में ही रहेंगे।
जलालुद्दीन कहते हैं कि सूखी रोटी खा लेंगे, पर गांव में ही रहेंगे।

उत्तर प्रदेश के बहराइच में रहने वाले जलालुद्दीन ने कहा, "लॉकडाउन लगने वाला है इसलिए मुंबई छोड़कर जा रहा हूं। यहां एल्युमीनियम का काम करता हूं। पिछली बार लॉकडाउन में फंस गया था तो बहुत मुसीबत हो गई थी। घरवाले भी बाेल रहे हैं कि सब छोड़ कर आ जाओ। सब बाेल रहे हैं लॉकडाउन लग रहा है। मेरी ट्रेन आज सुबह 5:25 की है। मैं रात को 10 बजे ही आ गया था। कुछ भी खाया-पिया नहीं है। पुलिस वाले के पास गए तो वो बोला कि कन्फर्म टिकट होगा, तभी जाने देंगे। टिकट नहीं है और न खाने-पीने का इंतजाम। अब तो हम यहां नहीं आएंगे। सूखी रोटी खाएंगे, लेकिन परिवार के साथ गांव में रहेंगे।"

तीसरी कहानी में घर पहुंचने के लिए दुआ

फिटिंग का काम करने वाले रफीक ने कहा-लॉकडाउन की खबर के चलते काम बंद हो गया है।
फिटिंग का काम करने वाले रफीक ने कहा-लॉकडाउन की खबर के चलते काम बंद हो गया है।

रफीक भी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। कहने लगे, "कारीगर हूं। यहां मुंबई में फिटिंग का काम करता हूं। सब बाेले लॉकडाउन लगने वाला है इसलिए हम अपने गांव जा रहे हैं। काम भी बहुत ठंडा हो गया है। मैं कल रात को स्टेशन 11 बजे से आ गया था। खाना-पीना कुछ नहीं किया। बस यहीं दुआ है कि किसी तरह घर पहुंच जाएं। टिकट भी नहीं है मेरे पास। जनरल में बैठेंगे, वहां फाइन की परची कटवा लेंगे। अब तो नहीं आएंगे मुंबई। बार-बार रोजी-रोटी के लिए आओ। जितना कमाओ नहीं, उतना खर्च हो जाए। ऊपर से ये लाॅकडाउन। सरकार भी हमारे लिए कुछ नहीं करती। यहां बचत भी नहीं हो रही। कई दिनों से काम भी मंद पड़ा है।"

चौथी कहानी में गरीब होने का मलाल

नफीस को पुलिसवालों से शिकायत है, जिन्होंने मास्क पहने होने के बाद भी डंडा मारकर फाइन वसूला।
नफीस को पुलिसवालों से शिकायत है, जिन्होंने मास्क पहने होने के बाद भी डंडा मारकर फाइन वसूला।

लखनऊ के रहने वाले नफीस डेकोरेशन का काम करते हैं। कोरोना के चलते उनका कामधाम बंद है। कहने लगे, "सब बता रहे हैं 12 जनवरी को लॉकडाउन लग रहा है। सब लॉक हो जाएगा, तो यहां हम क्या करेंगे। बहुत डरा हुआ हूं कोरोना के डर से। 17 दिन में जितनी कमाई की थी, उसी के सहारे वापस जा रहे हैं। चालू टिकट पर जा रहे हैं। टीसी 800 या 1000 ले लेगा। अब भागते-दौड़ते जल्दबाजी में स्टेशन आ रहे थे। मास्क लगा रखा था, फिर भी पुलिसवाले ने फाइन ले लिया। हमने पूछा कि मास्क लगा रखा है तो किस बात का फाइन तो डंडा मारने लगे और 200 रुपया ले लिया। कहने लगे कि ज्यादा बोलोगे तो सब ले लेंगे और जाने भी नहीं देंगे। कानून तो है ही नहीं यहां। सिर्फ पैसे वालों से डरते हैं ये लोग, गरीब को डराते हैं।"

पांचवी कहानी में भूखों मरने का डर

विक्रम को अभी भी मुंबई से उम्मीद है। कहते हैं कि सब ठीक रहा तो फिर लौटेंगे।
विक्रम को अभी भी मुंबई से उम्मीद है। कहते हैं कि सब ठीक रहा तो फिर लौटेंगे।

बिहार के रहने वाले विक्रम बताने लगे कि वे गोदरेज कंपनी में प्लास्टर का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि दो हफ्ते पहले कंपनी ने 15 जनवरी से लॉकडाउन लगने की जानकारी दी। इस बार पहले ही चले जा रहे हैं ताकि पिछले साल की तरह फंस न जाएं। पिछली बार तो भूखों मरने की नौबत आ गई थी। वो दिन याद करके रोना आ जाता है। बिहार में कोई काम धंधा नहीं है, सिर्फ गुंडागर्दी है। रोजी के लिए यहां आना पड़ता है। यहां की स्थिति देखेंगे, अगर सब ठीक हो गया, तभी होली के बाद आएंगे।

छठवीं कहानी में फिक्र कि कहीं पिछली बार की तरह फंस न जाएं

विनोद कुमार पिछली बार की तरह लॉकडाउन में फंसना नहीं चाहते हैं।
विनोद कुमार पिछली बार की तरह लॉकडाउन में फंसना नहीं चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश के विनोद कुमार कहते हैं, "हाउसकीपिंग का काम करता हूं। पिछले साल कोरोना महामारी के दौरान सूरत में था। लॉकडाउन के दौरान फंस गया था। इस बार पहले ही निकल जा रहे हैं ताकि फिर न फंस जाएं। 2 महीने का पेमेंट भी रुक गया है। 14-15 दिन से कोई काम नहीं है। ठेकेदार पूछने भी नहीं आया कि आपके पास पैसा है या नहीं। अभी हम बस जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहते हैं। अभी हमारे पास वेटिंग टिकट है। चाहे कैसे भी जाना पड़े, खिड़की या गेट पर लटकर ही चले जाएंगे।"

तस्वीरें कुछ और भी हैं...

उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले लोग लॉकडाउन के भय से फिर अपने घरों की ओर लौटने लगे हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले लोग लॉकडाउन के भय से फिर अपने घरों की ओर लौटने लगे हैं।
कई ऐसे भी लोग हैं, जो अब मुंबई लौटना नहीं चाहते, क्योंकि हर बार लॉकडाउन में उनकी जिंदगी बेपटरी हो जाती है।
कई ऐसे भी लोग हैं, जो अब मुंबई लौटना नहीं चाहते, क्योंकि हर बार लॉकडाउन में उनकी जिंदगी बेपटरी हो जाती है।
लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर कतारें हैं, लोग स्टेशन के बाहर भी बैठे हुए हैं ताकि किसी ट्रेन में जगह मिल जाए।
लोकमान्य तिलक टर्मिनस पर कतारें हैं, लोग स्टेशन के बाहर भी बैठे हुए हैं ताकि किसी ट्रेन में जगह मिल जाए।
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