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टीचर्स डे पर विशेष:क्या आप जानते हैं कि PM मोदी के टीचर उन्हें कैसा स्टूडेंट मानते हैं? अमित शाह और अडाणी कैसे स्टूडेंट थे? पढ़िए 10 हस्तियों के टीचर और स्कूल से जुड़े किस्से

20 दिन पहले

क्या आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के टीचर कौन थे? गृहमंत्री अमित शाह को किसने और क्या पढ़ाया होगा? अरबपति गौतम अडाणी को किसने गणित सिखाई होगी? सुपरफिट हीरो अक्षय कुमार अपनी टीचर की नजरों में कैसे हैं? टोक्यो ओलिंपिक्स में गोल्ड जीतने वाले भालेबाज नीरज चोपड़ा को उनके टीचर कैसे याद करते हैं? सुपर स्टार शाहरुख खान को किंग बनाने में उनके टीचर का क्या रोल है?

अगर नहीं जानते, तो आइए आज टीचर्स डे पर हम आपको देश की ऐसी 10 बड़ी हस्तियों के बारे में उनके टीचर या साथियों की जुबानी दिलचस्प किस्से-कहानियां बताते हैं। इन हस्तियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, उद्यमी गौतम अडाणी, महेंद्र सिंह धोनी, अरविंद केजरीवाल, नीरज चोपड़ा, अक्षय कुमार, अजीम प्रेमजी, सोनू सूद और शाहरुख खान शामिल हैं।

देश के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन को हम शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत के सबसे बड़े शिक्षाविदों में से एक राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेन्सी के चित्तूर जिले में हुआ था।

1. नाटक में हिस्सा लेने के लिए अड़ गए थे मोदी, उनके जोरदार अभिनय की सभी ने तारीफ की थी : प्रहलाद पटेल

बचपन में पीएम नरेंद्र मोदी को प्राथमिक शिक्षा का ज्ञान देने वाली शिक्षिका हीराबेन मूलचंद ने वडनगर के स्कूल में उन्हें कक्षा एक से चार तक पढ़ाया। वे बताती हैं कि ‘वड़नगर में मेरा घर मोदी के घर के ठीक सामने था। आज मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, लेकिन अब भी उनके परिवार के साथ वैसे ही रिश्ते हैं। हीराबेन कहती हैं कि मुझे इस बात का सबसे ज्यादा गर्व है कि मेरी क्लास में पढ़ने वाले नरेंद्र भाई मोदी आज देश के प्रधानमंत्री हैं। हीराबेन मोदी के बचपन का एक किस्सा बताती हैं कि कैसे मोदी रोजाना शाम को महादेव की आरती कर अपने माता-पिता को प्रणाम करते थे।

प्राथमिक शिक्षा के बाद नरेंद्र मोदी ने गांव के ही बीएम हाईस्कूल में एडमिशन लिया था। वडनगर में ही रहने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक प्रहलाद भाई पटेल बताते हैं कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को बीएन हाईस्कूल में नौवीं से 11वीं तक यानी करीब तीन साल पढ़ाया है। उन दिनों के बारे में पूछने पर वे बताते हैं कि ‘मोदी हमेशा संस्कृत और गुजराती पढ़ने के लिए लालायित रहते थे। बाकी छात्रों की तुलना में वे हमेशा संस्कृत और गुजराती भाषा से जुड़े सवाल करते थे।’

प्रहलाद भाई आगे बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की एक खास बात यह थी कि वे हर स्पर्धा में हिस्सा लेने की कोशिश करते थे। हमेशा भाग लेने वाले दो स्टूडेंट थे- एक नरेंद्र मोदी और दूसरी रंजना पारीख, जो वर्तमान में बॉम्बे हाईकोर्ट में नामी वकील हैं। स्कूल में आयोजित एक नाटक को याद करते हुए प्रहलाद भाई ने बताया कि ‘मुझे आज भी याद है कि एक नाटक में जोगीदास खुमान की भूमिका निभाने के लिए नरेंद्र भाई जिद पर अड़ गए और आखिरकार जोगीदास खुमान का रोल उन्होंने किया। इस नाटक में मोदी ने हाथों में तलवार लेकर जोरदार भूमिका की थी, जिसकी जमकर तारीफ हुई थी।’

‘जीवनी प्रकाशित हुई तो नरेंद्र भाई ने मुझे पत्र भेजा था’
वडनगर के स्कूल में प्रधानमंत्री मोदी को पढ़ाने वाले टीचर सोमाभाई पटेल अब बहुत बुजुर्ग हो चुके हैं। सोमाभाई पटेल याददाश्त पर जोर देकर बताते हैं कि ‘पढ़ाई के साथ जब भी देशभक्ति के गीत गाने की बात हो या फिर आजादी से जुड़े प्रसंगों के बारे में कोई बात हो, नरेंद्र मोदी उसे बहुत ध्यान से सुनते और आत्मसात करते थे। उस दौरान, मैंने वडनगर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक की एक शाखा भी शुरू की थी। नरेंद्र मोदी तुरंत उसमें शामिल हो गए थे। यहां कई कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहा करती थी।’

सोमाभाई पटेल बताते हैं कि ‘2005 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उस समय उन्होंने उन शिक्षकों को सम्मानित करने के लिए एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था, जिन्होंने उनके जीवन को आकार दिया। कार्यक्रम में उन्होंने मेरे समेत सभी शिक्षकों का सम्मान कर आशीर्वाद भी लिया था। इतना ही नहीं, जब मेरी जीवनी पर आधारित एक किताब आई तो नरेंद्र मोदी ने मुझे बधाई पत्र भी भेजा था।’ सोमाभाई भावुक होकर कहते हैं कि मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस छात्र को मैं पढ़ा रहा हूं, वह एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। सोमाभाई पटेल रिटायरमेंट के बाद सामाजिक जीवन से जुड़े हुए हैं और झुग्गी-झोपड़ी में रह रहे बच्चों को शिक्षा देते हैं।

2. छात्र राजनीति में होने के बावजूद अमित भाई ने कभी शिक्षकों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला : अनीता धोरखा

अनीता धोरखा अहमदाबाद के सीयू शाह साइंस कॉलेज में गृह मंत्री अमित शाह के साथ पढ़ी हैं। बाद में वे उसी कॉलेज में टीचर भी रहीं। अनीता अमित शाह के कॉलेज के दिनों और अध्यापकों के साथ उनके रिश्तों को याद करती हैं।

अनीता बताती हैं कि ‘कॉलेज में अमित भाई मुझसे एक साल जूनियर थे। सीयू शाह कॉलेज में वे दो साल रहे। फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे जेवियर्स कॉलेज चले गए थे। कॉलेज में इलेक्शन के दौरान हमारी एक-दूसरे से अच्छी पहचान हो गई थी। अमित भाई अपनी क्लास के रिप्रेजेंटेटिव थे और मैं एलआर के रूप में। उस समय के छात्रसंघ चुनाव में कोई राजनीति नहीं थी और चुनाव केवल कॉलेज तक ही सीमित हुआ करते थे।

चुनाव के दौरान भी हम सभी दोस्त काफी मस्ती किया करते थे, लेकिन अमित भाई का स्वभाव हमेशा से धीर-गंभीर रहा है। उनके दिमाग में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता था। आज उन्हें देखती हूं तो पता चलता है कि इलेक्शन को लेकर उनमें एक अलग तरह का पैशन था, जिसके चलते आज वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं। अनुशासन की बात करें तो अमित भाई बहुत अच्छे छात्र रहे हैं। छात्र राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने कभी किसी शिक्षक के खिलाफ नहीं बोला और हमेशा उनका सम्मान किया।’

अनीता बताती हैं कि ‘कॉलेज में अमित भाई की पहचान छात्र नेता की रही, लेकिन इस छवि के बावजूद उनका व्यवहार बिल्कुल सामान्य स्टूडेंट की तरह ही था। उनके साथ कॉलेज में जो दोस्ती थी वह आज भी कायम है। मैं 2008 में उनसे तब मिली थी, जब पूर्व छात्रों को सीयू शाह कॉलेज के पूर्व छात्र संघ के सदस्य के रूप में चुना जा रहा था। तब मैं अमित भाई से फॉर्म लेने गई। मैंने उन्हें आदरपूर्वक संबोधित किया तो उन्होंने हंसते हुए कहा- सिर्फ अमित नाम से बुलाओ। आज अमित भाई देश के गृहमंत्री हैं। इसके बावजूद भी पुराने दोस्तों के संपर्क में रहते हैं।’

‘अमित भाई दोस्तों को हजारों की भीड़ में पहचान लेते हैं’
अमित शाह के बचपन के दोस्त सुधीर दारजी स्कूल के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि ‘अमितभाई और मैं 1968 से बाल मंदिर स्कूल में कक्षा 4 तक और इसके बाद 5वीं से 9वीं तक RBLD मिडिल स्कूल में साथ पढ़े। इसके बाद अमित शाह 1979 में अहमदाबाद के संघवी स्कूल में पढ़ने चले गए थे।

अमितभाई बचपन से ही शांत स्वभाव के थे। न तो उनका किसी से विवाद होता था और न वे कभी किसी के विवाद के बीच में आते थे। वे पढ़ाई में भी बहुत अच्छे थे। पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी के चलते ही मेरी भी पढ़ाई अच्छे से हो सकी। वे तब भी मिलनसार थे और आज भी हैं। हजार लोगों की भीड़ में भी वे मुझे आसानी से पहचान लेते हैं। आज भी मेरा उनके बचपन के दोस्त की तरह का रिश्ता है।’

3. सालों बाद भी गौतम अपने टीचर्स को नहीं भूले, बेटे की शादी में स्कूल के सब टीचर्स को बुलाया: जगदीश पाठक

देश के दिग्गज कारोबारी गौतम अडाणी के टीचर रहे जगदीश पाठक ने दैनिक भास्कर से उनके स्कूल के दिनों से जुड़ी कुछ यादें साझा कीं। जगदीश पाठक कहते हैं कि ‘गौतम अपने छात्र जीवन के दौरान बहुत ईमानदार थे। जब भी वे अपना होमवर्क नहीं कर पाते थे तो क्लास में खड़े होकर खुद इस बात को स्वीकार करते थे। उनकी मित्र मंडली भी अच्छी थी। वे सब भी अडाणी की तरह पूरी मेहनत से पढ़ाई करते थे। अडाणी और उनके दोस्त हमेशा स्कूल की परंपरा का ध्यान रखते थे और दूसरे स्टूडेंट्स को भी अनुशासित रखने की कोशिश करते थे।

हमें उनकी सफलता पर गर्व है
जगदीश पाठक बताते हैं कि ‘आज जब भी मैं गौतम अडाणी की उपलब्धियों और सफलताओं के बारे में सुनता हूं तो बहुत गर्व होता है। गौतम भाई सीएन हाईस्कूल के सर्वश्रेष्ठ छात्रों में से एक हैं। 1972 से 2004 तक सीएन स्कूल में पढ़े कई छात्रों के व्यक्तित्व की बहुत चर्चा होती है। वहीं गौतम अडाणी आज सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उनकी पहचान तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है।’ आज पहली बार किसी ने मुझसे उनके स्कूली दिनों के बारे में पूछा है तो काफी यादें ताजा हो गईं।’

जगदीश पाठक कहते हैं कि ‘टेक्निकल सब्जेक्ट के छात्रों को भाषा पढ़ाना टीचर की परीक्षा होती है। हालांकि, गौतमभाई और उनके दोस्तों को पढ़ाने का समय आया तो मेरे लिए इतना मुश्किल नहीं रहा, क्योंकि वे पूरी गंभीरता से पढ़ाई करते थे और इसी के चलते वे गुजराती भाषा में भी बहुत अच्छे रहे। जब उनके बेटे की शादी हुई तो उन्होंने सीएन स्कूल के सभी टीचर्स को आमंत्रित किया था। यह हमारे लिए सम्मान की बात थी। सालों बाद भी वे अपने किसी शिक्षक को नहीं भूले।’

असाइन किया हर काम समय पर पूरा करते थे
सीएन स्कूल में गौतम अडानी को तकनीकी विषय पढ़ाने वाले दिलीप सिंह जाला बताते हैं कि ‘गौतम अडाणी 8वीं, 9वीं और 10वीं में टेक्निकल सब्जेक्ट पढ़ा करते थे। वे डिस्टिंक्शन वाले छात्र थे। उन्हें जो भी असाइनमेंट दिया जाता था, उसे वे पूरी ईमानदारी से समय पर पूरा करते थे। उस समय इस बात का अंदाजा नहीं था कि एक दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनेगी, लेकिन उनकी मेहनत और लगन को देखकर लगता था कि वे अपनी फील्ड में आगे बढ़ेंगे। वे स्वभाव से सरल और लो प्रोफाइल छात्र थे। ’

पहले लोकसभा स्पीकर भी सीएन स्कूल में ही पढ़े
अहमदाबाद का सीएन स्कूल वही है, जहां न केवल गौतम अडाणी, बल्कि भारत की विश्व प्रसिद्ध फार्मा कंपनी जायडस कैडिला के मालिक पंकज पटेल ने भी पढ़ाई की है। इसके अलावा वाघ-बकरी ग्रुप के पीयूष देसाई और टोरेंट पावर के सुधीर मेहता भी इसी स्कूल के स्टूडेंट्स रह चुके हैं। इससे आगे बढ़ें तो गुजराती साहित्यकार जीणाभाई देसाई और लोकसभा के पहले अध्यक्ष गणेश मावलंकर जैसी महान हस्तियां भी इसी स्कूल का हिस्सा रही हैं।

4. धोनी के शॉट्स से खिड़कियां टूटती थीं तो तनख्वाह से जुर्माना देने की नौबत आ जाती थी : केशव बनर्जी

इंडियन क्रिकेट टीम के सबसे सफल कैप्टन में शुमार महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी स्कूली शिक्षा रांची के श्यामली कॉलोनी स्थित जवाहर विद्या मंदिर (तब DAV) से पूरी की है। इनके क्रिकेट के सफर का आगाज भी इसी स्कूल के ग्राउंड से हुआ है।

आठ साल के धोनी की गोलकीपिंग के कायल थे बनर्जी सर
JVM श्यामली के स्पोर्ट्स टीचर रहे केशव रंजन बनर्जी (बनर्जी सर) ने बताया कि ये 1991 की बात है जब उन्होंने धोनी को पहली दफा फुटबॉल मैच खेलते देखा था। तब 8 साल के धोनी फुटबॉल में गोलकीपर थे। धोनी के डाइव मारकर बॉल पकड़ने के अंदाज के बनर्जी सर कायल हो गए। उसी दौरान उन्होंने तय कर लिया था कि वे उन्हें स्कूल क्रिकेट टीम के विकेटकीपर के रूप में तैयार करेंगे। दो साल बाद उन्हें स्कूल क्रिकेट टीम में एंट्री भी मिल गई। उन्होंने बताया कि शुरुआत में वे फुटबॉल की तरह ही क्रिकेट की बॉल भी पकड़ा करते थे।

बनर्जी प्रिंसिपल से बोले जुर्माना दूंगा, शॉट नहीं रोक सकता
बनर्जी सर बताते हैं कि धोनी शुरू से ही पावरफुल रहे हैं। वे बचपन से ही दमदार शॉट्स मारा करते थे। शाम की प्रैक्टिस के दौरान जब स्कूल के ग्राउंड्स में उन्हें बैटिंग का मौका दिया जाता था तब वे अपने शॉट्स से स्कूल के तीसरे तल्ले की खिड़कियों का शीशा तोड़ देते थे। ऐसा कई बार होने पर स्कूल के प्रिंसिपल ने बनर्जी सर को एक बार बुलाया और उन्हें कहा कि अगर बच्चे ऐसा करते रहे तो वे स्कूल में क्रिकेट बंद करा देंगे। तब बनर्जी सर ने कहा था कि सर वे शॉट्स मारने से तो बच्चों को नहीं रोक सकते। तब टूटी खिड़कियों का जुर्माना उनसे मांगा गया था। वे इसे अपनी सैलरी से कटवाने के लिए भी तैयार हो गए थे।

धोनी की कॉल पर तुरंत होने लगा बनर्जी की पत्नी का इलाज
कामयाबी की बुलंदियों को छूने के बाद भी धोनी बनर्जी सर की उतनी ही इज्जत करते हैं जितना वे बचपन में किया करते थे। बनर्जी सर ने बताया कि 2008 की बात है। तब धोनी इंडियन क्रिकेट टीम के बड़े स्टार हो गए थे। उन्हें अपनी पत्नी का इमरजेंसी में अर्थाइटिस का इलाज करवाना था। सारी पहुंच और पैरवी करने के बाद भी CMC वेल्लोर में उनकी पत्नी का इलाज शुरू नहीं हो पा रहा था। 4 महीने बाद उन्हें बुलाया जा रहा था। तब आखिर में उन्होंने धोनी को फोन किया और अपनी परेशानी बताई। धोनी ने उन्हें बस इतना कहा कि सर मैं कुछ कर के देखता हूं। उनके फोन रखने के 10 मिनट बाद ही CMC वेल्लोर से उन्हें फोन आ गया और उनकी पत्नी का इलाज शुरू हो गया। वे कहते हैं कि आज भी धोनी के फॉर्म हाउस के अंदर तक वे बिना किसी रोक-टोक के जाते हैं।

एलेक्सा के हेड साइंटिस्ट रोहित प्रसाद भी जवाहर विद्या मंदिर स्कूल से ही पढ़े हैं
मेकॉन मैनेजमेंट की ओर से संचालित इस स्कूल के कई स्टूडेंट्स आज अपने क्षेत्र के शिखर पर हैं। मशीन से बात करने का सपना पूरा करने वाले एलेक्सा के हेड साइंटिस्ट रोहित प्रसाद ने भी अपनी स्कूली पढ़ाई यहीं से पूरी की है।

5. अरविंद केजरीवाल हमेशा से टीचर्स के चहेते थे, तेजतर्रार थे लेकिन बोलते बहुत कम थे : डॉ. गगन मल्होत्रा

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हिसार के एचएयू में स्थित कैंपस स्कूल से वर्ष 1982 में 9वीं कक्षा में दाखिला लिया था। 10वीं पास करने के उपरांत उन्होंने हिसार के डीएन कॉलेज में दाखिला लेकर दो साल पढ़ाई की थी। केजरीवाल को पढ़ाने वाले टीचर्स में से इस समय कोई हिसार में नहीं रहता, लेकिन उनके स्कूल के दिनों के साथी गगन उनके शिक्षकों से उनके रिश्तों को याद करते हैं।

डॉ. गगन बताते हैं कि ‘केजरीवाल कम बोलने वाले, लेकिन तेजतर्रार स्टूडेंट्स थे। वे स्कूल में नंबर दो के छात्र थे। आईएएस सुधीर राजपाल उस समय फर्स्ट थे। दोनों टीचर्स के पसंदीदा थे। केजरीवाल की खासियत थी कि वे कभी कच्ची बात नहीं करते थे और बात की तह तक जाते थे। इसलिए स्कूल के अध्यापकों के भरोसेमंद थे।’

डॉ. गगन स्कूल के दिनों का एक वाकया भी साझा करते हैं। स्कूल की फुटबॉल टीम का मैच था। अरविंद केजरीवाल भी टीम में थे। जिस दिन मैच था, उसी दिन केजरीवाल को बुखार हो गया। उसके बावजूद वे मैच खेलने के लिए स्कूल पहुंचे। कुछ देर खेलने के बाद अरविंद केजरीवाल की तबीयत ज्यादा खराब हो गई तो उन्हें आराम दिया गया। हमारी टीम मैच भले नहीं जीत पाई, लेकिन केजरीवाल ने अपनी कोशिशों में कोई कमी नहीं रखी।

6. सोशल मीडिया और मोबाइल से दूर रहते थे नीरज, खाका तैयार करके करते हैं काम : रविंदर चौधरी

टोक्यो ओलिंपिक में जेवलिन थ्रो में गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज चोपड़ा इन दिनों चर्चा में हैं। देश-विदेश में एक सेलिब्रेटी के रूप में वे उभरे हैं। नीरज हरियाणा से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन उनका काफी समय चंडीगढ़ में बीता है। साल 2015-16 में डीएवी कॉलेज सेक्टर-10 में नीरज चोपड़ा ने बीए फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया था। एक साल तक उन्होंने यहां पढ़ाई की। उसके बाद वे आर्मी में भर्ती हो गए। अभी वे लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी से डिस्टेंस मोड में पढ़ाई कर रहे हैं।

डीएवी कॉलेज में नीरज के टीचर रहे कॉलेज के डायरेक्टर रविंदर चौधरी बताते हैं कि कॉलेज के दिनों में नीरज हमेशा डाउन टु अर्थ रहता था। वह अपने काम पर पूरा फोकस बनाए रखता था। उसका व्यवहार भी दूसरे बच्चों से अलग था। वह सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रहता था, मोबाइल का भी इस्तेमाल नहीं करता था।

वे कहते हैं कि नीरज को जो कुछ भी करना था, उसका खाका वह अपने दिमाग में तैयार कर लेता था। वह पूरी तरह अपनी प्लानिंग को लेकर फोकस्ड रहता था। यही वजह है कि ओलिंपिक में भी उसने शानदार प्रदर्शन किया।

आयुष्मान खुराना सहित कई हस्तियां इस स्कूल से पढ़ी हैं
रविंदर चौधरी बताते हैं कि टोक्यो ओलिंपिक में नीरज चोपड़ा के अलावा कई ऐसे प्लेयर थे जो इस कॉलेज से पढ़े हैं। इंडियन हॉकी स्टार गुरजंट सिंह भी एक साल तक उनके स्टूडेंट रहे हैं। इसके अलावा हाल ही में पैरा ओलिंपिक में हाई जंप में सिल्वर जीतने वाले निषाद भी उनके स्टूडेंट रहे हैं। फिल्म स्टार आयुष्मान खुराना और भारतीय फिल्मों के म्यूजिक कंपोजर रोचक कोहली भी उनके स्टूडेंट रहे हैं।

7. स्कूल में भी अपने दोस्तों को एक्सरसाइज करना सिखाते थे, मकसद को लेकर साफ थे : अक्षय

मशहूर एक्टर अक्षय कुमार की स्कूल की पढ़ाई मुंबई के माटुंगा स्थित डॉन बॉस्को स्कूल में हुई और 11वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई उन्होंने माटुंगा के खालसा कॉलेज से पूरी की। 5 सितंबर यानी शिक्षक दिवस पर दैनिक भास्कर ने अक्षय के टीचर रहे सुधाकर तेली से जाना कि वे अपने इस प्रसिद्ध छात्र को कैसे याद करते हैं।

अक्षय को 12वीं में हिंदी पढ़ाने वाले प्रोफेसर सुधाकर तेली बताते हैं कि ‘स्कूल में अक्षय बहुत शालीन, मिलनसार और खुशदिल हुआ करते थे। उनका असली नाम राजीव भाटिया है, इसलिए मैं उन्हें राजीव कहकर ही बुलाता था। राजीव का अर्थ 'कमल' होता है, बाद में वे ऐसे खिले कि अक्षय बन गए। वे अपने दोस्तों में भी काफी पॉपुलर हुआ करते थे। मैं उन्हें अक्सर उन्हें अपने साथियों को व्यायाम सिखाते देखा करता था।’

सुधाकर सर याद करते हैं कि अक्षय और उनका परिवार माता का भक्त था और उनके घर माता का जगराता हुआ करता था, जिसमें स्कूल के उनके बहुत से दोस्त शिरकत करते थे।

प्रोफेसर सुधाकर बताते हैं कि ‘अपने मकसद को लेकर अक्षय बचपन से ही क्लियर थे। वे खाने के भी बहुत शौकीन थे। आज भी अक्षय ने अपने स्कूल से नाता नहीं तोड़ा है। उनकी जब भी कोई फिल्म रिलीज होती है, वे कॉलेज के प्रिंसिपल को बच्चों के लिए पास भेजते हैं।’

बतौर टीचर वे अपने स्टूडेंट्स की कौन सी फिल्में पसंद करते हैं? इस सवाल पर सुधाकर कहते हैं कि ‘उन्हें अक्षय की कॉमेडी फिल्में देखना पसंद है। वे उसे एक हास्य कलाकार के रूप में ज्यादा सफल मानते हैं।’

8. सादगी को लेकर प्रिंसिपल काफी सख्त थे, आज भी फाइव स्टार होटलों में नहीं जाते अजीम : आदिल ईरानी

आदिल ईरानी, मुंबई में इन्वेस्टर हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई माजागांव के सेंट मेरी स्कूल से हुई है। वे इस स्कूल के एल्यूमनी एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट भी रहे हैं। इसी स्कूल से विप्रो के पूर्व चेयरमैन अजीम प्रेमजी भी पढ़े हैं। आदिल अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि अजीम प्रेमजी आज जो कुछ भी हैं, वे अपने स्कूली एजुकेशन की वजह से ही हैं। उनकी सादगी, मेहनत, डिसिप्लिन और फिटनेस के पीछे सेंट मेरी स्कूल का खासा योगदान है। हम दोनों एक ही स्कूल के पढ़े हैं, प्रेमजी हमारे सीनियर रहे हैं। वे 1961 में इस स्कूल से पास आउट हुए जबकि मैंने 1969 में यहां से पढ़ाई पूरी की।

आदिल बताते हैं कि स्कूल में पढ़ाई के दौरान हम एक दूसरे से नहीं मिले। बहुत दिनों तक मुझे यह बात भी मालूम नहीं थी कि प्रेमजी की पढ़ाई इसी स्कूल से हुई है, लेकिन जब देश-दुनिया में विप्रो का नाम हुआ तब मुझे पता चला कि हम दोनों की स्कूलिंग एक ही स्कूल से हुई है। यानी हम दोनों को पढ़ाने वाले ज्यादातर टीचर्स कॉमन रहे। मैंने अजीम जी के बारे में सुना है कि वे क्लास में हमेशा बेस्ट परफॉर्मर रहे। हर बार प्राइज उनके ही नाम होती थी।

स्कूली दिनों को याद करते हुए आदिल कहते हैं कि तब हमें स्कूल में सादगी के बारे में पढ़ाया जाता था। हमारे प्रिंसिपल इसको लेकर सख्त रहते थे। यही वजह है कि प्रेमजी आज भी सादगी से जीवन जीते हैं। उन्होंने अपने बच्चों की शादियां भी सादे तरीके से ही की। वे कभी फाइव स्टार होटलों में नहीं बैठते हैं। हमेशा इंडियन कार का ही इस्तेमाल करते हैं।

40 मिनट की एक्सरसाइज की वजह से अजीम फिट हैं
अजीम प्रेम जी के स्कूल में फिजिकल एजुकेशन पर भी खूब जोर दिया जाता था। तब पूर्व ओलिंपियन जलपाडीवाला फिजिकल एजुकेशन के टीचर थे। वे इतने सख्त थे कि हर दिन ग्राउंड में 40 मिनट एक्सरसाइज कराते थे। इसको लेकर कोई बहाना भी नहीं चलता था। यही वजह है कि अजीम प्रेम जी 76 साल की उम्र में भी पूरी तरह फिट हैं।

इसी तरह मैथ्स के टीचर एच मिरांडा और जेम्स फर्न, फिजिक्स के टीचर केकु ईरानी बेहद सिंपल तरीके से पढ़ाते थे। तब एबिथ रबेलो अंग्रेजी की इतनी डेडिकेटिड टीचर थीं कि हमारी कॉपी में कहीं गलती मिले तो उसे वे याद रखती थीं। जब भी उनकी कभी हमारी मुलाकात होती तो बताती थीं कि उस कॉपी में उस पैरा की उस लाइन में तुमने गलती की है। उस वक्त तीन-तीन टीचर अंग्रेजी के थे। यानी हमारे स्कूल में हर सब्जेक्ट के एक से बढ़कर एक टीचर थे। इसलिए मेहनत, ईमानदारी और डेडिकेशन की सीख अजीम प्रेमजी के जीवन में झलकती है।

9. होमवर्क पूरा नहीं होने पर बहाने बनाता था सोनू सूद, कभी लगा ही नहीं कि वह एक्टिंग में जाएगा

फिल्म अभिनेता सोनू सूद का जन्म पंजाब के मोगा में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई मोगा में ही सेक्रेड हार्ट स्कूल में हुई। इसके बाद इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए वे नागपुर चले गए। वहां उन्होंने यशवंतराव चव्हाण कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बैचलर्स डिग्री हासिल की।

सेक्रेड हार्ट स्कूल में उनकी टीचर रहीं अमरजीत कौर गिल बताती हैं कि सोनू सूद की स्कूलिंग आम बच्चों की तरह ही रही। तब हमें कभी ऐसा लगा ही नहीं कि वह आगे चलकर एक्टिंग में भी जाएगा। वो तो इंजीनियर बनना चाहता था।

वे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में सोनू सूद के बहाने काफी दिलचस्प होते थे। वह जब कभी होमवर्क नहीं करता था तब एक से बढ़कर एक बहाने बनाता था। कभी-कभी तो वह अपनी कॉपी के पन्ने ही पानी में गीले कर लेता था। जब हम उसे सजा देते और दूसरे बच्चों से अलग बैठाते तो झट से माफी भी मांग लेता था। उसे बाकी बच्चों से अलग बैठना पसंद नहीं था। अमरजीत उस स्कूल में इतिहास और भूगोल पढ़ाती थीं।

सोनू सूद की बहन मालविका भी सेक्रेड स्कूल से ही पढ़ी हैं। वे कहती हैं कि भैया मुझसे उम्र में काफी बड़े हैं और उनसे पहले ही वे इस स्कूल से पासआउट हो गए थे। नर्सरी से लेकर 10वीं तक की पढ़ाई उनकी इस स्कूल से हुई है। तब मोगा में यही एक स्कूल था जो इंग्लिश मीडियम में था। उनके स्कूल के दिनों में तो हमें कभी लगा ही नहीं कि वे मॉडलिंग या एक्टिंग के फील्ड में भी जाएंगे।

10. शाहरुख बहुत अच्छे स्टोरीटेलर भी हैं, जिंदगी में सब कुछ बैलेंस करना जानते हैं : फरहत बसीर खान

दुनिया भर के लोगों को इंस्पिरेशन देने वाले बॉलीवुड के किंग खान के टीचर बताते हैं कि अपने कॉलेज के दिनों में भी शाहरुख खान टीचर्स के फेवरेट हुआ करते थे। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से मास कम्युनिकेशन करते वक्त शाहरुख के प्रोफेसर रहे फरहत बसीर खान कहते हैं कि शाहरुख हर काम को अलग तरीके से किया करते थे, उनके जैसा स्टूडेंट मैंने पहली बार देखा था। वो बहुत अच्छे स्टोरीटेलर थे।

शाहरुख का किसी भी चीज को देखने का नजरिया ही अलग था, वो काफी जल्दी चीजों को समझते थे। जिन चीजों को लोग नजरअंदाज कर दिया करते थे, शाहरुख उन्हें भी बेहद सुंदर तरीके से लोगों के सामने पेश किया करते थे।

इंटरव्यू में शाहरुख का एक्ट कभी भूल नहीं सकते
प्रोफेसर बशीर कहते हैं कि शाहरुख एक्टिंग में शुरू से ही माहिर थे, जामिया के लिए इंटरव्यू देते वक्त शाहरुख से एक एक्ट करने के लिए कहा गया था। उन्होंने शेक्सपियर का एक्ट किया था, जिसमें उनकी एक्टिंग इतनी शानदार थी कि मैं कभी भूल नहीं पाया। शायद मेरे साथ उस वक्त वहां मौजूद कोई भी व्यक्ति उस एक्ट को नहीं भूल पाया होगा। शाहरुख उस वक्त भी किसी मंजे हुए कलाकार से कम नहीं थे।

प्रोफेसर बशीर कहते हैं कि शाहरुख अपनी पर्सनल लाइफ, थिएटर और कॉलेज इन तीनों ही चीजों को इतने बेहतर तरीके से बैलेंस करना जानते थे। वे जितना समय अपने दोस्तों को देते थे उतने ही बेहतर तरीके से कॉलेज की पढ़ाई और थिएटर किया करते थे।

कई बार क्लास मिस कर देते थे शाहरुख
जामिया में पढ़ाई करते वक्त ही शाहरुख को फौजी सीरियल में काम करने का मौका मिला था। जिसमें शाहरुख को अधिक समय देना पड़ता था। इस वजह से शाहरुख कई बार क्लास लेने भी नहीं आ पाते थे, लेकिन क्लास में जो भी होता था वो उसे पहले तो अपने दोस्तों से समझते थे फिर भी कोई कमी रह जाती थी, तो कई बार मेरे घर भी आते थे। उनकी लगन को देखते हुए मैं भी उन पर पूरा ध्यान देने की कोशिश करता था। शायद इस वजह से भी मैं उन्हें कभी भूल नहीं सकता।

व्यस्तता के चलते आसान प्रोजेक्ट चुनना सही नहीं समझा
प्रोजेक्ट का जिक्र करते हुए प्रोफेसर बशीर बताते हैं कि शाहरुख व्यस्त होने की वजह से कभी किसी आसान चीज को नहीं चुनते थे। कॉलेज में जब प्रोजेक्ट की बारी आई तो फौजी में काम करने की वजह से उनके पास ज्यादा समय नहीं होता था, फिर भी उन्होंने दो ऐसे टॉपिक पर प्रोजेक्ट बनाना चुना जिसे करना बेहद मुश्किल था। उन्होंने न सिर्फ वो प्रोजेक्ट चुने बल्कि उन पर उतने ही बेहतर तरीके से काम भी किया, हालांकि कुछ देरी जरूर हुई उन्हें सबमिट करने में, लेकिन हमने उनकी लगन देखते हुए उन्हें पूरा समय दिया।

प्रोफेसर बशीर कहते हैं कि अब शाहरुख खान से उनकी व्यस्तता के चलते मिल पाना काफी मुश्किल है, लेकिन मेरे दूसरे स्टूडेंट शाहरुख के साथ कई प्रोजेक्ट पर काम करते रहते हैं, जिनसे मुझे उनके बारे में खबर मिलती रहती है।

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