TRP की बात:BARC की डिमांड- चुनाव नतीजों के बाद जारी हो रेटिंग, सरकार ने तत्काल जारी करने के दिए हैं निर्देश

नई दिल्ली6 महीने पहले
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ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) टीवी रेटिंग जारी करने के लिए मार्च तक का समय चाहता है। BARC का मानना है कि चुनाव के नतीजों के बाद ही रेटिंग जारी हों। दरअसल, 12 जनवरी को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने BARC को चैनल्स की रेटिंग तत्काल जारी करने के निर्देश दिए हैं। उसे मंथली फॉर्मेट में पिछले तीन महीने का डेटा भी जारी करने के लिए कहा गया है।

BARC टीवी दर्शकों की संख्या के आधार पर रेटिंग जारी करती है। BARC अपनी वेबसाइट पर ट्रांसपेरेंट, सटीक और टीवी ऑडियंस मेजरमेंट सिस्टम की रेटिंग डिक्लेयर करती है। हालांकि, BARC के कुछ कर्मचारियों द्वारा रेटिंग में हेरफेर के आरोपों के बाद इसे सस्पेंड कर दिया गया था। ब्रॉडकास्टर्स चाहते थे रेटिंग को फिर से शुरू करने से पहले हेरफेर जैसे गंभीर मामलों को सुलझाया जाए।

BARC ने 10 सप्ताह का समय मांगा
इंडस्ट्री को BARC की रिपोर्ट का इंतजार है कि इसके ऑपरेशन में क्या गलत हुआ और पिछले मैनेजमेंट की तरफ से इसे कवर करने का प्रयास क्यों किया गया। 16 दिसंबर को सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) के अधिकारियों के साथ BARC के CEO नकुल चोपड़ा की मीटिंग हुई। उसमें नकुल ने कहा कि एजेंसी को अपने स्टेकहोल्डर्स को बोर्ड में लाने और रेटिंग को फिर से शुरू करने के लिए 10 सप्ताह का समय देने पर विचार करना चाहिए। इसके बाद भी मंत्रालय ने इस फैसले में जल्दबाजी की है।

मंत्रालय ने ब्रॉडकास्टर्स को पिछले तीन महीने का डेटा मंथली फॉर्मेट में जारी करने का भी निर्देश दिया है। साथ ही, टेलीविजन रेटिंग पॉइंट (TRP) सर्विस से जुड़ी वर्किंग कमेटी बनाई है। इसकी अध्यक्षता प्रसार भारती के CEO शशि शेखर वेमपति करेंगे।

सभी मामलों में रेटिंग्स को एक साल के लिए सस्पेंड किया गया था। तब से क्या बदल गया है?

मोटे तौर पर इसके 5 स्टेकहोल्डर्स हैं। इसमें न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, नॉन-न्यूज ब्रॉडकास्टर्स, एडवर्टाइजर, व्यूअर्स और पांचवां सरकार है। हालांकि, इतनी जल्दी फिर से रेटिंग फिर शुरू करने पर ब्रॉडकास्टर्स के बीच सहमति नहीं बन पाई।

BARC को रेटिंग फिर से शुरू करने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन ब्रॉडकास्टर्स को पता है कि उन्हें आंका जा रहा है। इसलिए आंखों के सामने इनके बीच कड़ा कॉम्पटिशन होने की संभावना है। न्यूज चैनल्स के कंटेंट की क्वालिटी पिछले साल की तुलना में मोटे तौर पर अपरिवर्तित रही और स्थापित प्रोग्रामिंग फॉर्मूला पर जारी थी। कंटेंट में तीखापन कम हो गया था, क्योंकि रेटिंग अब उद्देश्य नहीं था। विज्ञापन के रेट पिछले प्रदर्शन और ब्रांड की ताकत के आधार पर सुरक्षित थे।

पेड न्यूज को मिल सकता है बढ़ावा
डिजिटल चैनल्स और न्यूज चैनल्स के लिए पॉलिटिकल पार्टियों के पास बड़ा बजट होता है। ऐसे में इन पार्टियों को न्यूज चैनल्स से बेहतर सौदेबाजी में भी मदद मिलेगी। वे पेड न्यूज की मदद से अपना फायदा सुनिश्चित कर सकते हैं। ऐसे में चैनल्स की रेटिंग जारी करने वाले फैसले लोकतंत्र और भारतीय मीडिया के ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने का काम कर सकते हैं।

चैनल्स के बीच कॉम्पिटिशन शुरू होने की संभावना
क्या नया डेवलपमेंट न्यूज चैनल्स को एक-दूसरे के साथ कॉम्पिटिशन और बांटनेवाला कंटेंट बनाने के लिए मजबूर करेगा? इस सरकार के पूर्व इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग (I&B) मंत्रियों ने इसी कारण से न्यूज चैनल्स के लिए रेटिंग नहीं होने की वकालत की थी। 10 साल से भी पहले बाबा रामदेव ने TRP को 'तत्काल राष्ट्र पाटन' बताया था। अब लगता है कि बाबा की बात एकदम सही थी।

दो अन्य बिंदुओं पर ध्यान देने की भी जरूरत है।

  • पहला: सरकार के निर्देश की वैधता ध्यान रखना जरूरी है। बता दें कि यह BARC पर एक तरह की बाइन्डिंग है। 2006 के ट्राई दिशानिर्देशों को 2008 में स्वीकृत और लागू किया गया था। इसमें कहा गया था कि यह निर्धारित किया जाए कि सरकार रेटिंग एजेंसी और BARC को MIB से रेटिंग के लाइसेंस धारक के रूप में मान्यता देती है। जबकि, BARC इसे चुनौती दे सकता है। तब MIB कारण बताओ नोटिस दे सकता है।
  • दूसरा: BARC, इंफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग (I&B) के इस आदेश से बहुत खुश होगा और हो सकता है कि इसने इसके लिए एक मामला बनाया है, क्योंकि इसका रेवेन्यू चिंता का कारण है। यह BARC और सरकार दोनों के लिए फायदे का सौदा है।

TRP क्या होती है?
टेलीविजन रेटिंग पॉइंट (TRP) से इस बात का पता चलता है कि कौन सा न्यूज चैनल, प्रोग्राम सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। चैनल या प्रोग्राम की TRP ज्यादा होने का मतलब ये है कि सबसे ज्यादा दर्शकों ने उसे देखा। TRP का डेटा विज्ञापनदाताओं के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। इसी के आधार पर विज्ञापन को देने और उसकी रेट तय किए जाते हैं।

TRP का पता लगाने के लिए कुछ जगहों पर पीपल्स मीटर लगाए जाते हैं। इस मीटर पर स्पेशल फ्रीक्वेंसी के जरिए पता लगाते हैं कि उस टीवी सेट पर कौन सा चैनल, प्रोग्राम या शो कितनी बार और कितने देर तक देखा जा रहा है। अलग-अलग पीपल्स मीटर के सैंपल के जरिए सभी दर्शकों की पसंद का अनुमान लगाया जाता है। कुल मिलाकर देश के करोड़ों दर्शकों की पसंद कुछ हजार लोगों के अनुमानित आंकड़े से लगाया जाता है।

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