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मोदी के लद्दाख दौरे के कूटनीतिक मायने:मोदी ने चीन और दुनिया को बताया- लद्दाख का पूरा इलाका भारत का; यहां न सिर्फ सेना, बल्कि देश का प्रधानमंत्री भी मौजूद है

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: गौरव पांडेय
लेह पहुंचने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने सेना, आईटीबीपी और वायुसेना के जवानों से बातचीत की। वहां उन्होंने मैप के जरिए सेना की स्ट्रैटजी भी समझी।
  • प्रधानमंत्री ने चीन को संदेश दिया कि भारत इस मुद्दे को लेकर कितना गंभीर है
  • विपक्ष को बताया कि भारत सबकुछ सोची समझी रणनीति के तहत कर रहा है
  • प्रधानमंत्री चीन का नाम न लेते हुए भी उसे अलग-थलग करने में सफल रहे हैं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह अचानक लेह पहुंचकर हर किसी को चौंका दिया। उनके इस दौरे को चीन और दुनिया को संदेश देने के तौर पर देखा जा रहा है। इस दौरे के कूटनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक मायने क्या हैं? इससे क्या चीन सीमा पर तनाव और बढ़ेगा? चीन और दुनिया को इससे क्या मैसेज जाएगा? मोदी की कूटनीतिक स्ट्रेजी के मायने क्या हैं? दौरे से जुड़े ऐसे सभी मसलों पर हमने पूर्व डिप्लोमेट, रक्षा मामलों के जानकार जी. पार्थसारथी और विदेश मामलों के एक्सपर्ट्स हर्ष वी पंत से बातचीत की। 

कूटनीतिक मायने

  • यह साफ है कि भारत सरकार इस पूरे मामले में चीन को अंडर स्कोर कर रही है। सरकार यह बताना चाह रही है कि यह विवाद एकतरफा चीन ने पैदा किया है। वह जमीन कल भी हिंदुस्तान के पास थी, आज भी है और आगे भी रहेगी। हमारे प्रधानमंत्री वहां कभी भी जा सकते हैं। 
  • प्रधानमंत्री मोदी खुद वहां जाकर यह बता रहे हैं कि भारत अपनी संप्रभुता और अखंडता से कोई समझौता नहीं करेगा। वे चीन को संदेश दे रहे हैं कि भारत अपनी एक इंच जमीन नहीं छोड़ेगा, पूरा लद्दाख भारत का है। 
  • प्रधानमंत्री का वहां जाना, इस बात को भी बताता है कि टॉप लेवल लीडरशिप इस मामले को कितनी गंभीरता से ले रही है। सरकार यह भी बता रही है कि दोनों देशों के बीच भले ही बातचीत चल रही है, लेकिन यह विवाद चीन की वजह से है। 

राजनीतिक मायने

  • यह प्रधानमंत्री का स्टाइल है। वे चौंकाते रहते हैं। ऐसा ही उन्होंने इस बार भी किया। कल तक रक्षामंत्री राजनाथ सिंह लेह जाने वाले थे। लेकिन यहां प्रधानमंत्री का जाना ज्यादा जरूरी था। चीन के साथ उन्होंने विपक्ष को भी जवाब दिया है। वो विपक्ष को भी बता रहे हैं कि सबकुछ सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है।
  • प्रधानमंत्री यदि वहां जाते हैं, तो दो चीजें बता रहे हैं कि इस मुद्दे पर देश कितना गंभीर है। दूसरा यह है कि भारत अपने हितों के लिए खड़ा होगा। यदि चीन और विपक्ष को यह लग रहा होगा कि भारत पीछे हट जाएगा, तो यह नहीं होगा। सरकार और सेना को जो कुछ करना होगा, वो किया जाएगा। 

सामरिक मायने

  • देश के प्रधानमंत्री जो भी करते हैं, वो सोच समझकर ही करते हैं। उन्होंने चीन का नाम लिए बगैर विस्तारवादी नीति के खिलाफ भी बोला, इसका मतलब हमारी जमीन पर कब्जा की उम्मीद छोड़ दो।लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि आगे चीन से बातचीत नहीं होगी।
  • पाकिस्तान से करगिल युद्ध के दौरान भी भारत बातचीत कर रहा था। लेकिन यह बात सेकंड विंडो से हो रही थी। किसी भी देश से संपर्क तोड़ना अच्छी बात नहीं है। किसी मध्यस्थ के जरिए बात करना ठीक नहीं होता है। किसी से भी जो भी बात करनी है, वो आंख में आंख देखकर करिए, सोच समझकर करिए। यह एक प्रधानमंत्री से बेहतर कोई और नहीं सोच सकता है।

आर्थिक मायने-  

  • भारत, चीन को ट्रेड मुद्दे पर भी घेर रहा है और बता रहा है कि यह बहुत गंभीर मामला है। भारत ने चीन के साथ पूरी तरह से ट्रेड न बंद करते हुए भी साफ मैसेज दिया है कि हम आर्थिक नुकसान को भी अफोर्ड करने की स्थिति में हैं। 
  • भारत ने चीन के सामने यह बात रखी है कि सीमा विवाद का कोई हल निकलना चाहिए, नहीं तो क्राइसिस बढ़ सकती है। पहले दोनों के बीच यह होता था कि सीमा विवाद चलता रहे, लेकिन बाकी काम न रुके। लेकिन अब ऐसा नहीं है। 
  • इस बार भारत ने सीमा विवाद और आर्थिक रिश्तों की सारी जिम्मेदारी चीन पर डाल दी है। यदि चीन हमारे साथ संबंध सुधारना चाहता है तो उसे पहले कदम उठाना होगा, नहीं तो इससे दरार और ही बढ़ेगी।

सेना को संदेश-

  • यह सेना के मनोबल और उनकी दृढ़ता को बढ़ाने का प्रयास भी है। प्रधानमंत्री ने वहां जाकर सेना के जवानों को यह संदेश दिया है कि पूरा देश और सरकार आपके साथ खड़ी है। मोदी ने उन्हें संबोधित करके और गलवान का जिक्र करके भी उनके उत्साह को दोगुना बढ़ा दिया है। 
  • प्रधानमंत्री का यह लेह दौरा सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ाने के लिए ही था। सरहद और सेना के बीच से ही चीन को उन्होंने यह साफ संदेश भी दिया है कि भारत अपनी धरती के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। हम शांति चाहते हैं, लेकिन इसकी कीमत आत्मसम्मान समझौता नहीं हो सकता है। 

चीन को संदेश-

  • भारत ने चीन को यह साफ बता दिया है कि तुम हमारी सीमा को क्रॉस नहीं कर सकते हो। तुम हमारी जमीन की ओर देख भी नहीं सकते हो। वहीं, चीन पर बहुत प्रेशर में है। उस पर तमाम आर्थिक प्रतिबंध हैं। कोरोना को लेकर दुनिया उसे घेर रही है। वहां इंटरनल पॉलिटिक्स भी चल रही है। 
  • भारत अपनी डिप्लोमेटिक रणनीति को साधने में सफल हुआ है। भारत ने हाल ही में यूनाइटेड नेशंस में हांगकांग का मुद्दा उठाया है। 27 और देश भी भारत के साथ आ गए हैं। भारत की रूस के साथ कल वार्ता हुई, इसमें रक्षा डील भी हुई है। अमेरिका खुलकर भारत के पक्ष में बोल रहा है। 
  • चीन को मैसेज जा रहा है कि भारत न सिर्फ खुद खड़े होने सक्षम है, बल्कि दूसरे देश भी उसके साथ खड़े हो रहे हैं। चीन से जो खफा देश हैं, वह भारत के साथ आ रहे हैं। बीच वाले देश जैसे रूस भी भारत के साथ आया है। चीन के पास अब कोई ऐसा देश नहीं है, जो उसके साथ खड़ा हो, सिवाय पाकिस्तान।

दुनिया को संदेश- 

  • प्रधानमंत्री यह भी बता रहे हैं कि भारत पूरी तरह से उस जमीन पर कब्जा बनाए रखने में सक्षम है। यह मैसेज सिर्फ चीन के लिए ही नहीं, उन देशों के लिए भी है, जो इस कन्फ्यूजन में हों कि आखिर यह मुद्दा क्या है। भारत का स्टैंड क्या है।  
  • इस दौरे से दुनिया को यह पूरी तरह से पता चल गया कि यह भारत का इलाका है, जहां न सिर्फ सेना खड़ी है, बल्कि भारत के प्रधानमंत्री भी मौजूद हैं।  

मोदी की स्ट्रैटजी 

  • भारत चीन को डिप्लोमेटिक तौर से अलग-थलग करने में सफल रहा है। पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा है कि प्रधानमंत्री ने चीन का एक बार भी नाम नहीं लिया है। लेकिन उन्होंने चीन का नाम न लेकर सबकुछ किया है। 
  • इस मुद्दे को मीडिया और विपक्ष भी लगातार उठा रहा है। अभी भारत की तरफ से वो सबकुछ हो रहा है, जो चीन को टारगेट करके किया जा रहा है। चीन भी समझ गया है कि भारत की ओर से क्या किया जा रहा है। यह सब एक अच्छी रणनीति के तहत हो रहा है। 
  • यह समझी हुई पहल है, क्योंकि डिप्लोमेसी में सिम्बॉलिज्म बहुत अहम होता है। प्रधानमंत्री के दौरे से हमारे दूसरे सहयोगी देशों को भी मैसेज गया है कि कौन सा इलाका भारत का है और उसके लिए भारत कैसे खड़ा है। यह बताने प्रधानमंत्री खुद वहां पहुंचे हैं। 

भारत-चीने के बीच अब आगे का रास्ता

  • भारत और चीन के पास लड़ाई की वजह नहीं है। लेकिन चीन और भारत ने जिस तरह से वहां मिलेट्री बिल्टअप किया है। इसका कोई शॉर्टकट नहीं है। दोनों सेनाएं वहां लंबे समय के लिए हैं। दोनों सेनाओं ने वहां इंफ्रास्ट्रक्चर बना लिया है। यह विवाद तो ठंड के मौसम तक चल सकता है।
  • अभी तक दोनों पक्षों ने ऐसा कोई कदम भी नहीं उठाया है। चीन ने भी कोई कदम नहीं उठाया है। जिससे लगे कि तनाव कम होगा। चीन, भारत की एलएसी की बात भी नहीं मान रहा है। हां, भारत और चीन लड़ाई भी नहीं चाहते हैं।

पीएम के लेह दौर के बाद चीन का रवैया 

  • चीन बार-बार यही करता रहा है कि जब भी अरुणाचल प्रदेश में चुनाव होते हैं या प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री वहां जाते हैं, तो वो एक बयान जारी कर देता है कि यह ठीक नहीं है। लेकिन यहां चीन यह भी नहीं बोल सकता है कि प्रधानमंत्री लेह क्यों आए हैं। 
  • चीन अपने माउथपीस मीडिया के जरिए यही कहेगा कि इस मुद्दे पर भारत में कितनी घबराहट है। भारत बौखला गया है। प्रधानमंत्री को खुद जाना पड़ रहा है। चीन किसी डिप्लोमैटिक स्टैंड की स्थिति में नहीं है। उसके विदेश मंत्रालय का बयान भी आया है।

गलवान के बाद दुनिया में भारत की स्थिति

  • दुनिया में चीन बहुत ही अलग-थलग पड़ा हुआ है। अंतराष्ट्रीय मामलों पर भी हमें हर कोई देश हमें समर्थन दे रहा है। सिवाय, चीन और पाकिस्तान के। हिंदुस्तान की यह समस्या ऐसे वक्त में आई है, जब चीन अन्य मुद्दों पर घिरा हुआ है। 
  • ऑस्ट्रेलिया से लेकर जापान, वियतनाम, यूरोप, अमेरिका तक हर कोई चीन को समस्या बता रहा है। हांगकांग, ताइवान, दक्षिण चीन सागर की भी समस्या बनी हुई है।  
  • रूस को चीन की बहुत जरूरत है, इसके बावजूद रूस ने भारत के साथ स्पेशल रिलेशनशिप बढ़ाने की बात कही है। हमारे साथ वो मिलेट्री स्ट्रेंथन की भी बात कर रहा है। चीन के मुकाबले ग्लोबली भारत की डिप्लोमेटिक पोजिशन बहुत मजबूत है। इस मुद्दे पर भारत के नजरिए पर दुनिया चीन की तुलना में ज्यादा यकीन कर रही है। 

चीन के खिलाफ भारत की ग्लोबल डिप्लोमेसी

  • ट्रेड को लेकर सारी दुनिया ने हमें समर्थन दिया है। इसकी वजह है कि चीन ने एशिया के तमाम देशों को प्रताड़ित किया है। वियतनाम के अलावा चीन के सामने हर देश ने सिर झुका लिया। अब भारत ने बोला तो उसके साथ पहली बार आसियान के 10 देश भी चीन के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं।
  • चीन को सबसे ज्यादा घबराहट अमेरिका से नहीं, रूस से है। क्योंकि रूस इस समय में भी भारत को हथियार देने का फैसला किया है। भारत के साथ बातचीत कर रहा है। इससे चीन परेशान है। अमेरिका के चलते रूस, चीन के साथ मजबूरी में आता है, लेकिन वो चीनियों पर विश्वास नहीं करते हैं। 
  • चीन पर गलवान के बाद से अंतराष्ट्रीय दबाव बढ़ा है। पहले एशिया और दक्षिण चीन सागर में छोटे-छोटे टापुओं पर कब्जा कर लिया। इससे उसे घमंड आ गया कि कोई हमारे खिलाफ कोई कुछ नहीं बोल सकता है। अब पहली बार भारत ने खुलकर बोला है, जिसके बाद बाकी देश भी उसके खिलाफ बोलने को आगे आए हैं।