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भास्कर रिसर्च / निर्भया के 3 दुष्कर्मियों के पास कानूनी विकल्प बाकी, किसी की भी याचिका लंबित रही तो चारों की फांसी टलती रहेगी

Nirbhaya Rape Convicts | Nirbhaya Rape Convict Mukesh Singh Death Warrant Bhaskar Research Latest News and Updates On Delhi Gang Rape And Murder Case Convict
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Nirbhaya Rape Convicts | Nirbhaya Rape Convict Mukesh Singh Death Warrant Bhaskar Research Latest News and Updates On Delhi Gang Rape And Murder Case Convict

  • निर्भया के 4 दुष्कर्मियों में एक के पास कोई विकल्प नहीं बचा, एक के पास दया याचिका, दो के पास दया याचिका और क्यूरेटिव पिटीशन का विकल्प
  • प्रिजन मैनुअल के मुताबिक, राष्ट्रपति अगर दया याचिका खारिज कर देते हैं, तो इसके 14 दिन बाद ही सभी दोषी को फांसी पर लटकाया जाएगा
  • दिल्ली प्रिजन मैनुअल 2018 के मुताबिक, मौत की सजा पाने वाले कैदी को तब तक फांसी नहीं होगी, जब तक उसके सारे कानूनी विकल्प खत्म नहीं होते

Dainik Bhaskar

Jan 17, 2020, 01:26 PM IST

नई दिल्ली. निर्भया के चार दुष्कर्मियों में से एक मुकेश की दया याचिका शुक्रवार को राष्ट्रपति ने खारिज कर दी। मुकेश के पास अब कोई विकल्प बाकी नहीं है। उसकी क्यूरेटिव पिटीशन पहले ही सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो चुकी है। लेकिन, बाकी तीन दुष्कर्मियों के पास अभी भी कानूनी विकल्प बाकी हैं। दोषी विनय के पास दया याचिका का विकल्प है। अक्षय और पवन के पास अभी क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका, दोनों ही विकल्प बाकी हैं। दिल्ली प्रिजन मैनुअल 2018 के मुताबिक, अगर किसी मामले में एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा दी गई है और इनमें से किसी की भी याचिका लंबित है, तो उस पर फैसला आने तक सभी दोषियों की फांसी टलती रहेगी। इसलिए चारों दोषियों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी नहीं दी जा सकती।

तिहाड़ जेल प्रशासन के वकील ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार को कहा था- चारों दोषियों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे निश्चित रूप से फांसी नहीं दी जा सकती, क्योंकि एक दोषी की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है। हम नियम से बंधे हैं, याचिका खारिज होने पर भी दोषियों को 14 दिन का नोटिस देना ही होगा।
 

22 को फांसी क्यों नहीं? इसकी 4 वजहें
1. दिल्ली प्रिजन मैनुअल 2018 के अनुसार दोषियों के पास डेथ वॉरंट या फांसी की सजा के खिलाफ आगे अपील करने का अधिकार होता है। इसमें जेल के अधीक्षक ही उनकी मदद करने के लिए बाध्य हैं। दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार है। अगर वे अपील करते हैं तो उन्हें तब तक फांसी नहीं दी जा सकती, जब तक उनकी अपील पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता या यह अपील खारिज नहीं हो जाती।

2. सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने पर भी दोषियों के पास 7 दिन के अंदर राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजने का अधिकार है। मौत की सजा पाने वाले दोषियों को 7 दिन के बाद भी दया याचिका भेजने का अधिकार है। ऐसे में जब तक दया याचिका पर फैसला नहीं हो जाता, उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती।

3. सभी दोषी राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करते हैं और ये सभी याचिकाएं खारिज हो जाती है, इस स्थिति में भी दोषियों को 14 दिन का समय मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिन का वक्त तय किया है, जो दोषियों को दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने और जरूरी कामों को निपटाने के लिए मिलता है।

4. दिल्ली प्रिजन मैनुअल के 837वें पॉइंट के मुताबिक, अगर एक ही मामले में एक से ज्यादा दोषियों को फांसी की सजा मिली है और इनमें से एक भी अपील करता है। इस स्थिति में सभी दोषियों की फांसी पर तब तक रोक लगी रहेगी, जब तक अपील पर फैसला नहीं हो जाता।

(निर्भया केस में 4 दुष्कर्मियों में से एक ने दया याचिका भेजी है। इस पर फैसला बाकी है और फैसले के बाद भी 14 दिन का समय मिलना तय है। उधर, 3 दुष्कर्मियों के पास अभी भी कानूनी विकल्प बचे हैं। इसीलिए तिहाड़ के वकील ने कहा है कि 22 जनवरी को फांसी नहीं होगी, यह निश्चित है।)

क्या कानून का गलत फायदा उठा रहे हैं दोषी?
सजा-ए-मौत पाए दोषी को सभी कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करने का अधिकार है, क्योंकि सजा दिए जाने के बाद सुधार की कोई गुंजाइश नहीं होती। इसलिए विकल्पों के इस्तेमाल में सरकार भी दोषियों का सहयोग करती है। निर्भया केस में चारों दुष्कर्मी न एक साथ रिव्यू पिटीशन दाखिल कर रहे हैं, न क्यूरेटिव पिटीशन और न ही दया याचिका। क्योंकि, अगर सभी ने एक साथ ये कानूनी विकल्प इस्तेमाल किए तो नियमानुसार जो वक्त उन्हें मिलना चाहिए, वह घट जाएगा।

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