• Hindi News
  • National
  • Abhijit Banerjee Nobel | Abhijit Banerjee Exclusive Interview; Abhijit Banerjee On Indian economy, corporation tax cut

इंटरव्यू / डिमांड कमजोर है, गरीबों तक ज्यादा पैसा पहुंचे तो अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी: नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी



अभिजीत बनर्जी (फाइल) अभिजीत बनर्जी (फाइल)
X
अभिजीत बनर्जी (फाइल)अभिजीत बनर्जी (फाइल)

  • दैनिक भास्कर ने पूछा- भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने क्या चुनौतियां हैं, ये कैसे दूर हो सकती हैं?
  • अभिजीत बनर्जी ने कहा- भारतीय अर्थव्यवस्था केंद्रीकरण से पीड़ित
  • ‘ज्यादातर गरीब उद्यमी नहीं बनना चाहते, इसलिए भी गरीबी बड़ी समस्या, कॉर्पोरेट टैक्स घटाना एक गलती थी’

Dainik Bhaskar

Oct 22, 2019, 12:35 PM IST

दिल्ली (हेमन्त अत्री). पत्नी एस्तेय के साथ संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी भारत आए हुए हैं। वैश्विक गरीबी कम करने की दिशा में काम कर रहे अभिजीत ने भास्कर से बातचीत में कहा कि भारतीय अर्थव्यस्था केंद्रीयकरण से पीड़ित है। बाजार में डिमांड कम है, यानी ज्यादातर आबादी खर्च नहीं कर पा रही है। इसलिए गरीबों के हाथ में पैसा देना होगा, जिससे डिमांड बढ़ेगी। इसी से अर्थव्यवस्था रफ्तार  पकड़ेगी। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...

 

सवाल- दुनियाभर के देशों में अरबों रुपए खर्च करने के बावजूद गरीबी खत्म नहीं हो रही। आखिर समस्या कहां है? 
जवाब- ऐसा कहना ठीक नहीं होगा। 1.90 डाॅलर (134 रु.) प्रतिदिन से कम में गुजारा करने वाले लोगों की संख्या 30 साल में बहुत तेजी से गिरी है। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं कुछ काम जरूर हो रहा है।

 

सवाल- टैक्सपेयर मध्यम वर्ग बड़ी योजनाओं के फोकस में नहीं दिखता। ऐसा क्यों ? 
जवाब- क्योंकि वैश्विक स्तर पर अमीरों ने पिछले 30 वर्षों में विकास की बहुत बड़ी हिस्सेदारी हड़प ली है। इससे गरीबों को भी कुछ लाभ हुआ है। लेकिन, मध्यम वर्ग वहीं खड़ा है। उसका विकास नहीं हुआ।

 

सवाल- सरकार का 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का लक्ष्य कैसे पूरा होगा? 
जवाब- मौजूदा तथ्यों और आंकड़ों से साफ है कि भारत की विकास दर धीमी हो रही है। दरअसल, आज डिमांड ही कमजोर है। इसलिए गरीबों के हाथ में अधिक पैसा देकर बाजार में डिमांड बढ़ सकती है। तभी इकोनॉमी का भी आकार बढ़ेगा।

 

सवाल- भारतीय अर्थव्यवस्था में क्या कमी है? 
जवाब- मुझे चिंता है कि अर्थव्यवस्था  अति-केंद्रीकरण (ओवर सेंट्रलाइजेशन) से पीड़ित हो चुकी है। संस्थानों को काम करने की आजादी देना सबसे जरूरी है।

 

सवाल- भारत की अर्थव्यवस्था पर अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर का कितना असर पड़ेगा? 
जवाब- इसका असर अभी नहीं हुआ है। आगे जरूर हो सकता है, लेकिन हम तो उससे पहले ही धीमे हो चुके हैं।

 

सवाल- आपने भारत में अलग-अलग राज्य सरकारों के साथ भी काम किया है। गरीबी उन्मूलन में किसे बेहतर पाया? 
जवाब- गुजरात में नरेंद्र मोदी, बंगाल में ममता, बिहार में नीतीश, तमिलनाडु में एआईडीएमके, हरियाणा में खट्टर, पंजाब में कैप्टन, ये सब अपने राज्यों में बहुत कुछ अच्छा कर पाए हैं।
ज्यादातर गरीब उद्यमी नहीं बनना चाहते, इसलिए भी गरीबी बड़ी समस्या है।

 

सवाल- क्या भारतीय अर्थव्यवस्था को कॉरपोरेट टैक्स में की गई कटौती का लाभ मिलेगा?
जवाब- कॉर्पोरेट टैक्स घटाना एक गलती थी। निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए डिमांड बढ़ाने की जरूरत है।

 

सवाल- गरीबों को शायद ही वित्तीय संस्थानों से कोई कर्ज मिलता हो। इस व्यवस्था को कैसे बदला जा सकता है? 
जवाब- माइक्रोक्रेडिट और स्वयं सहायता समूह, गरीबों को उधार देने का प्रयास कर रहे हैं। वे गरीबों की मदद करते हैं।  जो उन्हें जरूरत है (जैसे टीवी या फ्रिज) खरीदने की अनुमति देते हैं, लेकिन अधिकांश उन्हें अमीर नहीं बनाते हैं। अर्थशास्त्र के मुताबिक, ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर गरीब वास्तव में उद्यमी नहीं बनना चाहते हैं।

 

सवाल- यह भी चर्चा है कि व्यापार युद्ध के कारण अमेरिकी कंपनियां अपने आधार को अन्य एशियाई देशों में स्थानांतरित कर देंगी। भारत को इससे क्या फायदे और नुकसान हैं?
जवाब- हमें कंपनियों को स्थापित करने के तरीके को आसान बनाना होगा। गीता गोपीनाथ, रघुराम राजन और मिहिर शर्मा के साथ हमारी पुस्तक व्हाट इकोनॉमी नीड्स नाउ, में हमने प्लग-इन लोकेशंस बनाने की बात कही है, जहां कंपनियां अच्छी कनेक्टिविटी, आसान भूमि अधिग्रहण और शायद आधुनिक श्रम कानूनों से लाभ उठा सकें।

 

सवाल- सरकार ने राजकोषीय घाटे को 3.4% तक लाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन जीएसटी संग्रह कम हो रहा है। कॉरपोरेट टैक्स कम किया गया है, विनिर्माण क्षेत्र में भारी मंदी है? इससे क्या फर्क पड़ेगा?
जवाब- राजकोषीय घाटे को कम करने का लक्ष्य संभवतया हासिल नहीं होगा। सामान्य तौर पर ऐसा लगता है कि मांग में कमी है। यही वजह है कि विनिर्माण नहीं बढ़ रहा है, कॉरपोरेट करों में कटौती शायद यहां मदद नहीं कर पाएगी।

 

सवाल- फिल्मों या कभी-कभी किताबों में कहा जाता है कि यह इतनी मध्यम वर्ग की सोच है। वे यह नहीं कहते कि यह गरीबों की सोच है? ऐसा क्यों है? 
जवाब- ऐसा इसलिए है क्योंकि वे आपस में भेद कर रहे हैं। मध्यम वर्ग एक पुट डाउन है - यह कहता है कि आप अभी भी ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे कि आप अमीर बनने से पहले करते थे।

 

DBApp

 

 
COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना