भास्कर ओपिनियनपार्टी अध्यक्ष:कांग्रेस में अब पार्टी स्तर पर एक और मनमोहन की तैयारी

2 महीने पहले
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तमाम चतुर, उत्तर भारतीय नेताओं को छोड़कर अब कांग्रेस आलाकमान 80 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे पर दांव लगा रहा है। उत्तर भारत में जहां से कांग्रेस को सर्वाधिक सीटें मिल सकती हैं, वहाँ का एक भी उम्मीदवार नहीं है। फिर सब कुछ यानी नामांकन, नामांकन वापसी, चुनाव आदि आलाकमान के इशारे पर ही होना है तो चुनाव करवा ही क्यों रहे हैं?

अच्छा! शशि थरूर मज़े में हैं। वे शुरू से उम्मीदवार थे और अब तक बने हुए हैं। आलाकमान का अपना उम्मीदवार जाने कितनी बार बदल गया। नाम वापसी तक हो सकता है और ही कोई हो। लेकिन फ़िलहाल खड़गे आलाकमान के वफ़ादार माने जा रहे हैं। सबसे पहले आलाकमान ने अशोक गहलोत पर भरोसा जताया।

हो सकता है उन्होंने चुनाव लड़ने से मना भी किया हो। नहीं माने। उन्होंने राजस्थान में ऐसा रायता फैलाया कि खुद ही रेस से बाहर होना पड़ा। फिर मध्यप्रदेश से कमलनाथ को बुलाया गया। वे कहाँ मानने वाले थे। उन्हें भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की उम्मीद है। सो वे भी मना करके भोपाल लौट आए।

इसके बाद नंबर आया मध्यप्रदेश के तेज-तर्रार नेता दिग्विजय सिंह का। वे लड़ने को आतुर भी थे, क्योंकि वे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कमलनाथ के रहते अब वे इस पद पर फिर से आना भी नहीं चाहते। इसलिए अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने को राज़ी हो गए थे। सही मायने में दिग्विजय इस पद के अव्वल उम्मीदवार थे। लेकिन रातो-रात फिर फ़ैसला बदल गया। दूल्हा अचानक बराती हो गया। आलाकमान ने इशारा किया और बेचारे दिग्गी राजा को मल्लिकार्जुन खड़गे का प्रस्तावक बनना पड़ गया।

यह तस्वीर भारत जोड़ो यात्रा के दौरान 1 सितंबर को ली गई थी। जब एक प्रोग्राम के दौरान दिग्विजय इस भावभंगिमा में नजर आए। आज यह तस्वीर उनके एक बयान से मिलती-जुलती दिख रही है। आज दिग्गी ने कहा- खड़गे जी सीनियर हैं, उनके खिलाफ चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता।
यह तस्वीर भारत जोड़ो यात्रा के दौरान 1 सितंबर को ली गई थी। जब एक प्रोग्राम के दौरान दिग्विजय इस भावभंगिमा में नजर आए। आज यह तस्वीर उनके एक बयान से मिलती-जुलती दिख रही है। आज दिग्गी ने कहा- खड़गे जी सीनियर हैं, उनके खिलाफ चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता।

जब सब कुछ खुद ही चलाना है। पार्टी के तमाम फ़ैसले खुद ही करना है तो ग़ैर गांधी अध्यक्ष लाने का मतलब ही क्या? खुद ही बने रहते! क्या लोग समझते नहीं? फिर भाजपा और कांग्रेस में अंतर ही क्या रहा? भाजपा में भी जेपी नड्डा अध्यक्ष हैं, लेकिन फ़ैसले कब कौन करता है, हर कोई जानता है। लेकिन भाजपा चुनाव जैसा कोई ड्रामा नहीं करती। ऊपर से नाम आता है या घोषणा होती है और हो जाता है चुनाव। चाहे पार्टी अध्यक्ष हो, चाहे किसी राज्य का मुख्यमंत्री।

बहरहाल, कांग्रेस को अगर कोई आगे ले जा सकता था तो वह थे अशोक गहलोत और दिग्विजय सिंह। मैदानी नेता यही थे। इन्हें अच्छी तरह आता है कि कार्यकर्ता को कैसे जोड़े रखना है और कैसे उससे जुड़े रहना है। ठीक है, खड़गे पार्टी आलाकमान की पसंद होंगे, लेकिन वे उन्हीं की पसंद बने रहेंगे। पार्टी कार्यकर्ता तक वे कैसे पहुँच पाएंगे, यह कहना बहुत मुश्किल है।

फिलहाल उम्मीद तो की ही जा सकती है कि कांग्रेस आलाकमान ही सही हों और खड़गे ही वे व्यक्ति हों जो पार्टी में नई ऊर्जा का संचार कर पाएँ और फिर से कांग्रेस को अपनी पहली हैसियत में ला पाएं। उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है। कांग्रेस कोई दुनिया से अलग थोड़े ही है! दस साल मनमोहन सिंह से भी उम्मीद में ही तो गुज़ारे थे!

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