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महाराष्ट्र में कोरोना की कहानी:सांसदों और विधायकों के लिए बेड का कोटा तय कर रहे अफसर, नागपुर में सड़कों पर घूम रहे गरीब संक्रमित

मुंबईएक महीने पहलेलेखक: मनीषा भल्ला
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तपती दोपहर में नागपुर मेडिकल कॉलेज के गेट के सामने पटरी पर मैं भी बैठ गई। बगल में बैठी एक महिला के हाथ में रिपोर्ट्स थी, सरसरी तौर पर मैंने पूछा क्या हुआ है आपको ? वह बोली ‘मैं पॉजिटिव हूं।‘ यह सुनते ही मुझसे न तो तपाक से उठते बना, न बैठते।

देखते ही देखते दाएं-बाएं से आवाजें आने लगीं कि हम भी पॉजिटिव हैं, हम भी पॉजिटिव हैं। कोई हाथ जोड़ने लगा तो कोई गिड़गिड़ाने लगा कि हम किसी तरह उन्हें बेड दिलवा दें। लेकिन हम उनकी ऐसी कोई मदद नहीं कर सकते थे।

गढ़चिरौली के सिविल अस्पताल में श्याम बाबू के करीबी रिश्तेदार की कोविड से शाम 5 बजे मौत हो चुकी है। अभी दूसरे दिन के 12 बज चुके हैं, लेकिन उन्हें डेड बॉडी नहीं मिली है। वे दाह संस्कार के लिए लगभग 2800 रुपए की लकड़ियां खरीद चुके हैं। श्मशान में चिता तैयार करके यहां आए हैं।

बीती रात 8 बजे से लेकर अगले दिन 12 बजे तक गढ़चिरौली के इस अस्पताल में 21 मौतें हो चुकी हैं, लेकिन न कोई डेड बॉडी देने वाला, न बताने वाला कि कब देंगे। किसी से भी बात करो तो अधमरी आवाज में लोग बोल रहे हैं कि हमसे बात न करो, हम बोल भी नहीं पा रहे हैं...।

चंद्रपुर के सिविल अस्पताल के कोविड आईसीयू में अविनाश का भाई एडमिट था। रात में ऑक्सीजन नहीं मिली, तो भाई की हालत बिगड़ने लगी। अविनाश रात भर दौड़-भाग करता रहा। फिर देखा कि ऑक्सीजन न होने से एंबुलेंस में तो कभी एंबुलेंस से बाहर आते ही कॉरीडोर में मरीज दम तोड़ रहे हैं।

वह अगले दिन कलेक्टर से झगड़ने पहुंच गया कि ऑक्सीजन क्यों नहीं है...लेकिन मिली तो सिर्फ सरकारी सांत्वना। चंद्रपुर में इस रात 13 लोगों के शव उठे हैं।

नागपुर की नगरपालिका के एक अधिकारी कहते हैं, हमने RT-PCR टेस्ट ही बंद कर दिए हैं...कितने टेस्ट करेंगे, सब थक चुके हैं। किसी तरह से सांसद और विधायकों के लिए 40 बेड खाली करवाए हैं। अस्पताल के बाहर सड़कों पर गरीब संक्रमित मरीज फिदायीन बने भटक रहे हैं.. यानी आम जनता के रोने चिल्लाने का सरकार पर कोई फर्क नहीं...

महाराष्ट्र की यह चार कहानियां यहां के हालात बयां कर रही हैं। कोरोना यहां सड़कों पर खुलेआम घूम रहा है। कहीं बेड नहीं, कहीं टेस्ट नहीं, कहीं ऑक्सीजन नहीं, कहीं वेंटीलेटर नहीं, जहां सब हैं वहां डॉक्टर नहीं। जहां टेस्ट हो रहे हैं वहां तीन-तीन दिनों में रिपोर्ट आ रही है। ऊपर से- नगरपालिका अधिकारियों का बेतुका तर्क कि ‘सब थक चुके हैं।’

नागपुर में हर दिन 26,000 RT-PCR टेस्ट हो रहे थे, लेकिन अब ये बंद कर दिए गए हैं। यहां सुबह 6 बजे से ही लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। 'स्वपनिल' बताते हैं कि RT-PCR टेस्ट के लिए सुबह 6 बजे से लाइन में लगे हैं, लेकिन कोई कुछ बता ही नहीं रहा है।

स्वपनिल के पिता की बेड न मिलने की वजह से मौत हो चुकी है और घर पर मां का ऑक्सीजन लेवल लगातार गिर रहा है। वह बताते हैं कि ‘दो दिन से 2 लाख कैश लेकर घूम रहा हूं बेड के लिए, लेकिन कहीं कुछ नहीं है।’

महाराष्ट्र में टेस्ट न होने पर या रिपोर्ट देर से आने पर कोरोना किस-किस को अपनी चपेट में ले रहा है। नागपुर के डॉक्टर अनवर सिद्दीकी बताते हैं कि बीते साल की तरह कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग ज़ीरो है। बीते साल प्रशासन में भी जज्बा था और मदद करने वालों में भी, लेकिन इस साल मेडिकल अमला भी थक चुका है और मदद करने वाले भी।

कोरोना के बदले हुए रूप से स्वयं सेवी संस्थाएं, आम आदमी और मेडिकल स्टाफ सहमे हुए हैं। लोग इलाज के लिए एक जिले से दूसरे जिले जा रहे हैं। जैसे नागपुर में बेड नहीं मिल रहा तो लोग गढ़चिरौली जा रहे हैं। छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश से लोग नागपुर आ रहे हैं, औरंगाबाद वाले पुणे जा रहे हैं।

औरंगबाद के सांसद इम्तियाज जलील बताते हैं कि इस दफा एनजीओ वालों के पास भी भूखों को खाना खिलाने के लिए पैसे नहीं हैं। मदद करना अब दूर, सभी को अपनी जान बचाने की पड़ी है। औरंगाबाद में जब कलेक्टर सुनील चौहान ने लॉकडाउन की घोषणा की तो सांसद जलील ने पूछा कि लोग खाएंगे क्या?

इस पर कलेक्टर सुनील चौहान ने कहा कि बीते साल सभी फंड्स में से राशन पर खर्च किया जा चुका है, अब प्रशासन के पास लोगों को खिलाने का कोई साधन नहीं बचा है।

सरकारों का रवैया देखकर लग रहा है कि यहां आम इंसानी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है। नासिक के एक केमिस्ट बताते हैं कि उनकी दुकान पर आने वाले हर दूसरे आदमी को सर्दी-खांसी है। लेकिन लोग घर में ही इलाज कर रहे हैं, क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों में फीस बहुत है और सरकारी अस्पताल में जगह नहीं है।

औरंगाबाद की कलेक्टर ने तो वहां के कुछ प्राइवेट अस्पतालों पर ज्यादा फीस लेने के खिलाफ कार्रवाई भी की है।

नागपुर मेडिकल कॉलेज की एक नर्स मेरे पास आती है। मुझे अपने मोबाइल में एक तस्वीर दिखाती हैं। डरा देने वाली इस भयानक तस्वीर में आईसीयू के अंदर जमीन पर, कॉरिडोर में कोविड के मरीज पड़े हैं। वह बताती हैं कि आधे मरीज छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के हैं। लोग अगर अपने-अपने जिले में भी इलाज करवाएंगे तो नागपुर पर इतना बोझ नहीं पड़ेगा।

सबसे बड़ी दिक्कतें सभी जिलों में देखने में आ रही हैं। अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं है, बेड नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं। कई लोग आपदा में भी अवसर देख रहे हैं। यानी दवाएं ब्लैक में मिल रही हैं। एंबुलेंस वालों ने अपने चार्जेज बढ़ा दिए हैं। पुणे में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में एंबुलेंस से मरीज को शिफ्ट करने के 6,000 रुपए लिए जा रहे हैं।

औरंगाबाद के एक बड़े एशिया अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. शोएब बताते हैं कि उनके एक 100 बेड के अस्पताल में रोजाना 150 ऑक्सीजन सिलेंडर लगते हैं, मैन्युफैक्चरर ने इनसे बोला कि वह 70 सिलेंडर ही दे सकता है।

औरंगाबाद के कब्रिस्तान में दो दिन के बाद नंबर आ रहा है। गढ़चिरौली जैसे नक्सल प्रभावित जिले में केस की इतनी भरमार है कि रात आठ बजे से लेकर दिन के 11 बजे तक 26 मौतें हो चुकी हैं।

पुणे में देखो तो प्लाज्मा से लेकर रेमडेसिविर इंजेक्शन तक ब्लैक में मिल रहा है। नासिक में बीमारी इतनी बढ़ गई है कि हालात बेकाबू हैं, मेडिकल सुविधाएं भी यहां दुरुस्त नहीं हैं। लोग अस्पतालों के सामने रुपए लिए खड़े हैं, लेकिन बेड नहीं है।

एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी नासिक के लासलगांव और उसके आसपास के गांवों में हालात यह हैं कि घर-घर में कोरोना का मरीज है। कोरोना से डर कर खेत मजदूर इस साल नासिक आए ही नहीं। अंगूर हो या प्याज, खेत मालिक खुद ही खेत में परिवार सहित काम कर रहे हैं, मंडी जा रहे हैं।

बड़े जिलों को तो छोड़ो, अब छोटे और ग्रामीण जिले भी कोरोना का शिकार हो रहे हैं। गढ़चिरौली के सांसद अशोक नेते कहते हैं कि अब तो गढ़चिरौली भी चपेट में आ रहा है। अब आप यह नहीं कह सकते कि यह जिला बचा हुआ है।

भारत के जिन 10 जिलों में कोरोना महामारी सबसे ज्यादा तांडव मचा रही है, उनमें से 8 जिले महाराष्ट्र के हैं। पुणे और मुंबई की चर्चा तो मीडिया में हो रही है, लेकिन कमोबेश अब पूरा महाराष्ट्र इसकी चपेट में है।

महाराष्ट्र यात्रा के दौरान डॉक्टरों का कहना है कि सरकार सेकेंड वेव से क्यों बेखबर रही, क्यों तैयारी नहीं की गई? न तो प्रशासन की तैयारी थी, न लोगों ने सेकेंड वेव को गंभीरता से लिया। एक साल में कोई एक अस्पताल तक तैयार नहीं किया। उल्टे स्थिति बीते साल से ज्यादा खराब हो गई।

सरकारें तो अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों और चीजों पर जनता से ज्यादा नजर रखती हैं, कैसे सेकेंड वेव के तांडव को इतने हल्के में ले लिया गया। इससे पता चलता है कि आम आदमी की जिंदगी की यहां कोई परवाह नहीं है।

प्रशासन का कहना है कि लोग शादियों में गए, अगर ऐसा है तो उन्हें इजाजत किसने दी, कैसे वेडिंग हॉल खुले और एक साथ इतने लोग वहां जमा हो गए। लोग पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने पहुंचे, अगर ऐसा है तो चुनाव करवाए किसने, कौन लोग गए हिस्सा लेने और किसकी इजाजत से गए।

असल बात ये है कि प्रशासन और सरकार गेंद एक दूसरे के पाले में फेंक रहे हैं, लेकिन कोई भी स्वयं सेवी संस्था या व्यक्ति किसी सरकार या प्रशासन से ऊपर नहीं हो सकता है। जो काम सरकारें कर सकती हैं, वह संस्थाएं नहीं कर सकती हैं।

मुझसे रास्ते में कई लोगों ने सवाल किया कि अगर वुहान में सब नॉर्मल हो सकता है तो हमारे यहां तबाही कैसे मच गई? सरकार इस सेकेंड वेव के बारे में जानती थी, वह थर्ड वेव के बारे में भी जानती है, लेकिन तब भी शादियां होने दीं, चुनाव होने दिए, अस्पताल नहीं बनाए, बेड अरेंज नहीं किए।

महाराष्ट्र के 7 जिलों की 1028 किलोमीटर की यात्रा में एक चीज सामान्य तौर पर दिखी। हर जिले में मौतें, बेड, ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की कमी, कहीं डॉक्टर नहीं तो कहीं रेमेडेसिविर की कालाबाजारी। होम क्वारैंटाइन में मर रहे लोगों को मदद पहुंचाने के बजाय प्रशासन नियमों को लेकर उन्हें परेशान कर रहा है।

सरकारी में बेड नहीं, प्राइवेट अस्पताल में जाने की हैसियत नहीं, मौत हो रही है तो शव नहीं मिल रहे, श्मशान हांफ रहे हैं, चिता जलाने के लिए लंबी लाइन लगी हुई है, तो कब्रिस्तान भी भर चुके हैं। प्रशासन की दलील है कि हम थक चुके हैं। बस यही कहानी है महाराष्ट्र की।

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