पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • On This Day, China Was Occupied By Tibet; After 8 Years, The Dalai Lama Came To India, Since Then The Government Of Tibet Is Running From India.

आज का इतिहास:आज ही के दिन तिब्बत पर चीन का कब्जा हुआ; 8 साल बाद दलाई लामा भारत आए, तब से भारत से ही चल रही है तिब्बत की सरकार

4 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

23 मई, 1951। तिब्बती लोग इस दिन को काला दिन मानते हैं, वहीं चीनी लोग इसे शांति के प्रयासों वाला दिन बताते हैं। इसी दिन तिब्बत ने चीन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के साथ ही तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया।

दरअसल चीन और तिब्बत के बीच विवाद बरसों पुराना है। चीन कहता है कि तिब्बत तेरहवीं शताब्दी में चीन का हिस्सा रहा है इसलिए तिब्बत पर उसका हक है। तिब्बत चीन के इस दावे को खारिज करता है। 1912 में तिब्बत के 13वें धर्मगुरु दलाई लामा ने तिब्बत को स्वतंत्र घोषित कर दिया। उस समय चीन ने कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन करीब 40 सालों बाद चीन में कम्युनिस्ट सरकार आ गई। इस सरकार की विस्तारवादी नीतियों के चलते 1950 में चीन ने हजारों सैनिकों के साथ तिब्बत पर हमला कर दिया। करीब 8 महीनों तक तिब्बत पर चीन का कब्जा चलता रहा।

आखिरकार तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 17 बिंदुओं वाले एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के बाद तिब्बत आधिकारिक तौर पर चीन का हिस्सा बन गया। हालांकि दलाई लामा इस संधि को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि ये संधि जबरदस्ती दबाव बनाकर करवाई गई थी।

दलाई लामा को बंधक बनाने की खबरों के बाद हजारों की संख्या में तिब्बती लोग दलाई लामा के महल के आसपास इकट्ठा हो गए थे।
दलाई लामा को बंधक बनाने की खबरों के बाद हजारों की संख्या में तिब्बती लोग दलाई लामा के महल के आसपास इकट्ठा हो गए थे।

संधि के बाद भी चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों से बाज नहीं आया और तिब्बत पर उसका कब्जा जारी रहा। इस दौरान तिब्बती लोगों में चीन के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा। 1955 के बाद पूरे तिब्बत में चीन के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन होने लगे। इसी दौरान पहला विद्रोह हुआ जिसमें हजारों लोगों की जान गई।

मार्च 1959 में खबर फैली कि चीन दलाई लामा को बंधक बनाने वाला है। इसके बाद हजारों की संख्या में लोग दलाई लामा के महल के बाहर जमा हो गए। आखिरकार एक सैनिक के वेश में दलाई लामा तिब्बत की राजधानी ल्हासा से भागकर भारत पहुंचे। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी। चीन को ये बात पसंद नहीं आई। कहा जाता है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध की एक बड़ी वजह ये भी था। दलाई लामा आज भी भारत में रहते हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से तिब्बत की निर्वासित सरकार चलती है।

तिब्बत से भागकर असम के तेजपुर आए दलाई लामा।
तिब्बत से भागकर असम के तेजपुर आए दलाई लामा।

तिब्बत की इस निर्वासित सरकार का चुनाव भी होता है। इस चुनाव में दुनियाभर के तिब्बती शरणार्थी वोटिंग करते हैं। वोट डालने के लिए शरणार्थी तिब्बतियों को रजिस्ट्रेशन करवाना होता है। चुनाव के दौरान तिब्बती लोग अपने राष्ट्रपति को चुनते हैं जिन्हें 'सिकयोंग' कहा जाता है। भारत की ही तरह वहां की संसद का कार्यकाल भी 5 सालों का होता है। तिब्बती संसद का मुख्यालय हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में है।

चुनाव में वोट डालने और चुनाव लड़ने का अधिकार सिर्फ उन तिब्बतियों को होता है जिनके पास 'सेंट्रल टिब्बेटन एडमिनिस्ट्रेशन' द्वारा जारी की गई 'ग्रीन बुक' होती है। ये बुक एक पहचान पत्र का काम करती है। हाल ही में हुए चुनावों में पेंपा सेरिंग निर्वासित तिब्बती सरकार के नए राष्ट्रपति बने हैं।

बछेंद्री पाल ने रचा था इतिहास
बछेंद्री पाल को आज कौन नहीं जानता। कल उनका जन्मदिन है, लेकिन अपने जन्मदिन से एक दिन पहले ही बछेंद्री पाल ने खुद को नायाब तोहफा दिया था। आज ही के दिन 1984 में बछेंद्री पाल ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को फतह किया था। ऐसा करने वाली वो भारत की पहली और दुनिया की पांचवीं महिला हैं।

बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई 1954 को भारत के उत्तराखंड के गढ़वाल जिले के एक गांव नकुरी में हुआ था। उनके पिता एक व्यापारी थे जो अपने गेहूं, चावल और दूसरे सामान को खच्चरों पर लादकर तिब्बत ले जाते थे। इसी से परिवार का खर्चा चलता था। बछेंद्री पाल बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी आगे थीं। कहा जाता है कि एक बार स्कूल पिकनिक के दौरान बछेंद्री करीब 13 हजार फीट की ऊंचाई पर आसानी से चढ़ गई थीं। पहाड़ी पर पहुंचने के बाद मौसम खराब हो गया और बछेंद्री को पहाड़ी पर ही रात गुजारनी पड़ी।

2019 में बछेंद्री पाल को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
2019 में बछेंद्री पाल को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

घरवाले बछेंद्री को पर्वतारोही नहीं बनाना चाहते थे, लेकिन बछेंद्री की जिद के आगे घरवालों को झुकना पड़ा और उन्होंने नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग में दाखिला ले लिया। साल 1984 में भारत ने एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए एक अभियान दल बनाया। इस दल का नाम “एवरेस्ट-84” था। दल में बछेंद्री पाल के अलावा 11 पुरुष और 5 महिलाएं थीं। मई के शुरुआती दिनों में दल ने अपने अभियान की शुरुआत की। खतरनाक मौसम, खड़ी चढ़ाई और तूफानों को झेलते हुए आज ही के दिन बछेंद्री ने एवरेस्ट फतह किया था।

देश-दुनिया के इतिहास में 23 मई को इन महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है...

2019: आम चुनावों में भाजपा ने प्रचंड बहुमत से जीत हासिल की। नरेन्द्र मोदी लगातार दूसरी बार भारत के प्रधानमंत्री बने।

2015: एक कार दुर्घटना में अमेरिकी गणितज्ञ जॉन नैश का निधन।

2010: मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय खंडपीठ ने बिना विवाह किए महिला और पुरुष का एक साथ रहना अपराध नहीं माना।

2008: भारत ने सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल पृथ्वी-2 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।

2004: बांग्लादेश में तूफान के कारण मेघना नदी में नाव डूबने से करीब 250 लोगों की डूबकर मौत।

1995: प्रोग्रामिंग लैंग्वेज जावा को आधिकारिक तौर पर लॉन्च किया गया।

1994: सऊदी अरब में हज के दौरान भगदड़ मचने से 270 तीर्थयात्रियों की मौत हुई थी।

1942: भारतीय फिल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और कोरियोग्राफर के. राघवेंद्र राव का जन्म हुआ।

1788: साउथ कैरोलिना 8वें राज्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में शामिल हुआ था।

खबरें और भी हैं...