• Hindi News
  • National
  • Pakistan Kartarpur Corridor; History Of Gurdwara Darbar Sahib And Interesting Facts Everyone Should Know

करतारपुर गुरुद्वारे के बारे में जानें सब कुछ:अंग्रेज वकील की गलती से यह पाकिस्तान के हिस्से में चला गया, लोग यहां मवेशी बांधने लगे थे

9 महीने पहले

करतारपुर कॉरिडोर बुधवार से फिर खुल गया। कोरोना महामारी के कारण यह पिछले साल 16 मार्च से बंद था। करतारपुर गुरुद्वारा बंटवारे के समय एक अंग्रेज वकील की गलती से पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। अनदेखी और जंग में हुए हमलों से यह जर्जर होता गया। लोग यहां आसपास मवेशी तक बांधने लगे थे, लेकिन 90 के दशक में पाकिस्तान सरकार ने इसकी मरम्मत का फैसला किया। आइए इस गुरुद्वारे के इतिहास के बारे में जानें सब कुछ।

यह तस्वीर उस समय की है, जब करतारपुर कॉरिडोर का पाकिस्तान वाले हिस्से में निर्माण किया जा रहा था।
यह तस्वीर उस समय की है, जब करतारपुर कॉरिडोर का पाकिस्तान वाले हिस्से में निर्माण किया जा रहा था।

करतारपुर गुरुद्वारे का इतिहास
करतारपुर साहिब पाकिस्तान के नारोवाल जिले में रावी नदी के पास स्थित है। इसका इतिहास 500 साल से भी पुराना है। माना जाता है कि 1522 में सिखों के गुरु नानक देव ने इसकी स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी साल यहीं बिताए थे।

रावी नदी के फ्लो को बॉर्डर मानने से यह पाकिस्तान में चला गया

लाहौर से करतारपुर साहिब की दूरी 120 किलोमीटर है। वहीं, पंजाब के गुरदासपुर इलाके में भारतीय सीमा से यह लगभग 7 किलोमीटर दूर है। लैरी कॉलिन्स और डॉमिनिक लैपियर की किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के मुताबिक, अंग्रेज वकील सर क्रिल रेडक्लिफ को बंटवारे का नक्शा बनाने के लिए 2 महीने से भी कम का समय मिला था और उन्हें भारत की भौगोलिक स्थिति की कोई जानकारी नहीं थी। ऐसे में उन्होंने रावी नदी की धारा को ही बॉर्डर बना दिया। करतारपुर गुरुद्वारा रावी के दूसरी तरफ था, लिहाजा यह पाकिस्तान के हिस्से में चला गया।

भारत-पाकिस्तान की जंग से गुरुद्वारे को काफी नुकसान हुआ

करतारपुर गुरुद्वारे की यह तस्वीर 1984 की है। इसे हरदीप सिंह चौधरी की किताब सिख पिलग्रिमेज टु पाकिस्तान से लिया गया है।
करतारपुर गुरुद्वारे की यह तस्वीर 1984 की है। इसे हरदीप सिंह चौधरी की किताब सिख पिलग्रिमेज टु पाकिस्तान से लिया गया है।

1965 और 71 की जंग में इस गुरुद्वारे का काफी नुकसान हुआ। 90 के दशक तक तो इसकी इमारत बहुत खराब हो गई थी। लोग यहां मवेशी बांधने लगे थे। लोग इसका इतिहास तक भूल गए थे। जिन भारतीयों को इसकी अहमियत पता थी, उनमें से कुछ लोग ही यहां जाते थे। इन्हें भी वाघा बॉर्डर से ही जाना पड़ता था।

दोनों देशों की सरकारों की कोशिशों से बना था कॉरिडोर

यह तस्वीर 2004 की है, जब पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण शुरू किया था।
यह तस्वीर 2004 की है, जब पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण शुरू किया था।

1998 के बाद पाकिस्तान सरकार ने गुरुद्वारे पर ध्यान दिया। 1999 में इसे दुरुस्त करने की मांग उठने लगी, तब पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने सरकार के सामने गुरुद्वारे की मरम्मत का प्रस्ताव रखा। इसके बाद सालों तक इसके निर्माण का काम चलता रहा। बाद में भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने गुरदासपुर के डेरा बाबा नानक और पाकिस्तान के करतारपुर में स्थित पवित्र गुरुद्वारे को जोड़ने के लिए कॉरिडोर बनाने का फैसला किया। भारत में 26 नवंबर 2018 को और पाकिस्तान में 28 नवंबर 2018 को कॉरिडोर की नींव रखी गई। गुरुनानक देव जी के प्रकाशोत्सव पर 9 नवंबर 2019 को इसे जनता को समर्पित कर दिया गया था।