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वायरस कल्चर वाली देश की सबसे पुरानी लैब से रिपोर्ट:13 महीनों से बिना ब्रेक वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग कर रहे 210 वैज्ञानिक, देश के हर एयरपोर्ट से हैदराबाद की इस लैब में आते हैं सैंपल

हैदराबाद8 दिन पहलेलेखक: प्रमोद कुमार
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CCMB की लैब में कोरोना वायरस की टेस्टिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग, कल्चर, व्यवहार, क्षमता और वैक्सीन रिसर्च होती है। - Dainik Bhaskar
CCMB की लैब में कोरोना वायरस की टेस्टिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग, कल्चर, व्यवहार, क्षमता और वैक्सीन रिसर्च होती है।

तेलंगाना के हैदराबाद में केंद्र सरकार जीनोम सीक्वेंसिंग लैबोरेट्री सेल्युलर और आणविक जीव विज्ञान केंद्र (CCMB) में 210 वैज्ञानिक पिछले 13 महीनों से बिना ब्रेक लिए काम कर रहे हैं। चाहे रविवार हो या कोई दूसरी छुट्‌टी, सभी वैज्ञानिक यहां रोज काम पर आते हैं। इस लैब में कोरोना वायरस की टेस्टिंग, जीनोम सीक्वेंसिंग, कल्चर, व्यवहार, क्षमता और वैक्सीन रिसर्च होती है। देश में CCMB ने ही सबसे पहले वायरस कल्चर डेवलप किया था। भास्कर ने हैदराबाद की इस लैब में पहुंचकर देखा कि हमारे वैज्ञानिक कैसे इस परिस्थिति में भी डटे हुए हैं।

210 लोगों की टीम में इनमें 60 वैज्ञानिक और 150 PHD स्कॉलर हैं। डॉ. पूरन सिंह सिजवाली और डॉ तेज सौपाटी कहते हैं कि CCMB के वैज्ञानिकों के लिए वायरस दोस्त की तरह हैं। वायरस की वजह से ही म हैं। जिस तरह एक सफल वायरस तेजी से फैलता है, ठीक उसी तरह सफल वैज्ञानिक वायरस का व्यवहार समझकर उसे मानव स्वास्थ्य के अनुकूल बनाता है।

इन रिसर्च पर लैब में चल रहा है काम

  • नए ड्राई स्वाइप मैथड से टेस्टिंग तीन गुना बढ़ेगी, लागत आधी होगी।
  • देशभर में बन रही टेस्टिंग किट का परिक्षण कर वेलीडेट करते हैं।
  • कोरोना दवा का फार्मूला परखते हैं। 100 से ज्यादा टेस्टिंग में हैं।
  • कम्युनिटी सैंपलिंग कर बता रहे हैं कहां कितने लोग इंफेक्टेड हैं।
  • वायरस बनाकर कल्चर बना रहे हैं, ताकि देश में रिसर्च हो सके।

हर वैज्ञानिक को मशीन चलाने की खुली छूट

CCMB के डायरेक्टर राकेश मिश्रा बताते हैं कि रात 2 बजे भी आइडिया आए तो रिसर्चर को करोड़ों की मशीन चलाने के लिए किसी की इजाजत नहीं लेनी होती। RTPCR टेस्ट का नया मैथड ऐसे ही विकसित हुआ। डबल-ट्रिपल म्यूटेंट पर काम कर लैब में परीक्षण के लिए वायरस बना रहे हैं और ज्यादा प्रभावी टीका बनाने और वायरस को निष्प्रभावी करने की दिशा में काम चल रहा है। रोज 500 से ज्यादा आरटीपीसीआर, 50 से ज्यादा जिनोम सीक्वेंसिंग टेस्ट करते हैं।

रिसर्च इस बात पर कि वायरस से लड़ना कैसे है
मिश्रा कहते हैं कि रिसर्च इसी बात की होती है कि हमें लड़ना किससे है। हमारे पास एयरपोर्ट का हर सैम्पल आता है। इससे हम जीनोम सीक्वेंसिंग कर वायरस की कुंडली निकाल लेते हैं। हमने शुरू में ही बताया था कि ए3आई वैरिएंट मलेशिया से आया। हमने यह भी बताया था कि इसकी प्रसार क्षमता ज्यादा नहीं। तब पूरी दुनिया में यह वैरिएंट था। वहीं, यूके वैरियंट सबसे पहले पंजाब आया। देश के सभी एयरपोर्ट के डाटा से हमने यह सीक्वेंस किया।

सीक्वेंसिंग में 10 दिन तक का समय लगता है
CCMB के मेडिकल जेनेटेसिस साइंटिस्ट डॉ. कार्तिक भारद्वाज बताते हैं कि एक सैंपल की सीक्वेंसिंग में 10 से 15 दिन तक का समय लग सकता है। पहले दो घंटे में सैम्पल का आरएनए, फिर दो घंटे में आरएनए को डीएनए में कन्वर्ट करते हैं। इसके बाद डीएनए एम्पलीफाई करने में छह घंटे और सीक्वेंसिंग देने में छह घंटे लगते हैं। सीक्वेंसिंग के बाद डेटा एनालसिस में दो दिन लगते हैं। इसके बाद 10 से 12 दिन तक इसके वैरिएंट के असर पर काम करते हैं।

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