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राजस्थान, MP और गुजरात में सत्ता का फॉर्मूला हैं आदिवासी:तीन राज्यों में 99 सीटें आदिवासियों के हिस्से, 50 नजदीकी सीटों पर भी असर

नई दिल्ली3 महीने पहले

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में आदिवासी तीर्थ मानगढ़ में एक सभा को संबोधित किया। रैली के लिए राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात से हजारों आदिवासियों को बुलाया गया था। PM का कार्यक्रम सरकारी था, इसलिए तीनों मुख्यमंत्रियों यानी अशोक गहलोत (राजस्थान), शिवराज सिंह चौहान (मध्य प्रदेश) और भूपेंद्र भाई पटेल (गुजरात) को भी इसमें बुलाया गया।

ये तो हुई बात प्रधानमंत्री के कार्यक्रम की... लेकिन क्या आपने गौर किया कि इस कार्यक्रम में जिन तीन राज्यों के आदिवासी बुलाए गए थे, वहां अगले एक से 12 महीने के अंदर चुनाव होने हैं। गुजरात में 2022 के आखिर में तो मध्य प्रदेश और राजस्थान में अगले साल यानी 2023 में चुनाव होने हैं।

मानगढ़ की पहा्ड़ीे तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात की सीमा से सटी है।
मानगढ़ की पहा्ड़ीे तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात की सीमा से सटी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि तीन राज्यों के चुनाव का आपस में क्या कनेक्शन हो सकता है... दरअसल तीनों ही राज्यों में सत्ता हासिल करने का एक कॉमन फैक्टर है... और वो है आदिवासी वोट। तीनों राज्यों की कुल 652 में से 99 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति यानी ST के लिए रिजर्व हैं। इसके मायने है कि तीनों राज्यों की कुल 16% सीटों से आदिवासी विधायक ही चुने जाते हैं।

सत्ता तक पहुंचने में आदिवासी वोट की अहमियत कितनी है, हर राज्य में विधानसभा सीटों का गणित क्या है, इसे ग्राफिक्स के जरिए समझते हैं...

मध्य प्रदेश: राज्य की कुल 230 विधानसभा सीटों में से 35 अनुसूचित जाति (SC) और 47 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए रिजर्व हैं। राज्य में ST सीटों का हिस्सा 20.4% है। ऐसे में कुल सीटों का पांचवां हिस्सा रखने वाली इन सीटों की ताकत से ही चुनावी हार-जीत का फैसला होता है।

सोर्स: मध्य प्रदेश विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।
सोर्स: मध्य प्रदेश विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।

राजस्थान: प्रदेश की कुल 200 विधानसभा सीटों में से 34 अनुसूचित जाति (SC) और 25 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए रिजर्व हैं। ST सीटों की हिस्सेदारी करीब 12.15% है। यह आंकड़ा मध्य प्रदेश की तुलना में कम है, लेकिन चुनावी हार-जीत के लिहाज से बेहद अहम है।

सोर्स: राजस्थान विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।
सोर्स: राजस्थान विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।

गुजरात: राज्य में विधानसभा की कुल 182 सीटें हैं। इनमें से 13 अनुसूचित जाति (SC) और 27 अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए रिजर्व हैं। यहां कुल सीटों का 14.83% हिस्सा ST के लिए सुरक्षित है। ऐसे में हर पार्टी की कोशिश इस वर्ग के वोटों को साधने की होती है।

सोर्स: गुजरात विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।
सोर्स: गुजरात विधानसभा और चुनाव आयोग की वेबसाइट।

आसपास की 50 सीटों पर भी असर
तीनों राज्यों में इन 99 सीटों से सटी करीब 50 दूसरी सीटों पर भी आदिवासियों के वोट हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं। आदिवासी सीटों पर जीत दर्ज करने वाली पार्टी ही अमूमन सत्ता तक पहुंचती रही है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में पिछले चुनाव (2018) के नतीजे इसकी गवाही देते हैं। नीचे दिए ग्राफिक से यह बात साफ होती है...

सोर्स: आंकड़े चुनाव आयोग की वेबसाइट से लिए गए हैं।
सोर्स: आंकड़े चुनाव आयोग की वेबसाइट से लिए गए हैं।

गुजरात में आदिवासी वोट हासिल करके भी कांग्रेस सत्ता तो हासिल नहीं कर सकी, लेकिन उसने भाजपा को कड़ी टक्कर दी। विधानसभा चुनाव के आखीर में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की प्रधानमंत्री मोदी पर की गई विवादित टिप्पणी को भी कांग्रेस को हुए नुकसान की वजह बताया गया।

आदिवासियों को साधने मानगढ़ धाम ही क्यों चुना?
राजस्थान की राजधानी जयपुर से 550 किलोमीटर दूर बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ की पहाड़ियां मौजूद हैं। मानगढ़ की पहाड़ियों की सीमा गुजरात और राजस्थान को छूती है, तो मध्य प्रदेश की सीमा भी इसके बेहद नजदीक है। इस तरह से यह तीन राज्यों का कनेक्टिंग पॉइंट है।

निहत्थे आदिवासियों की शहादत का गवाह है मानगढ़
बांसवाड़ा जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर मानगढ़ में संत गोविन्द गुरू ने अंग्रेजों और सूदखारों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन शुरू किया था। अंग्रेजों ने इस आंदोलन को कुचलने की साजिश रची। 17 नवंबर 1913 को जब गोविंद गुरु की अगुआई में सैकड़ों आदिवासी मानगढ़ की पहाड़ियों पर पहुंचे, तो अंग्रेजों ने उन पर गोलियां बरसा दीं।

इस घटना में 1500 से ज्यादा आदिवासी मारे गए थे। इसके बाद यह आदिवासियों के लिए आस्था का केंद्र बन गया। यहां एक संग्रहालय बनाया गया है, जिसमें पूरी घटना को दिखाया है। मोदी अगर इस जगह से आदिवासियों के लिए कोई ऐलान करते हैं, तो उसका फायदा तीन राज्यों के साथ देशभर में होगा। मोदी मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक भी घोषित कर सकते हैं।

मानगढ़ राष्ट्रीय स्मारक घोषित नहीं हुआ:गहलोत बोले- गांधी के कारण आपका दुनिया में सम्मान; मोदी बोले- आप सबसे सीनियर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 1 नवंबर को 10 साल बाद करीब 1500 आदिवासियों की शहीद स्थली मानगढ़ धाम पहुंचे। मोदी ने कहा कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले आदिवासी समाज ने आजादी का बिगुल फूंका था। हम आदिवासी समाज के योगदानों के कर्जदार हैं। भारत के चरित्र को सहेजने वाला आदिवासी समाज ही है। हालांकि उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्मारक बनाने की घोषणा नहीं की। इससे पहले प्रधानमंत्री ने शहीद स्मारक में आदिवासियों को श्रृद्धांजलि दी। पढ़ें पूरी खबर...