--Advertisement--

मंडे पॉजिटिव / मां से मिली सकारात्मक सोच ने बनाया स्केटिंग चैंपियन

Dainik Bhaskar

Jan 13, 2019, 11:23 PM IST


ध्रुव-शिशिर कमाडी, लिंबो स्केटिंग में गिनीज बुक में रिकॉर्ड बनाने वाले स्केटर ध्रुव-शिशिर कमाडी, लिंबो स्केटिंग में गिनीज बुक में रिकॉर्ड बनाने वाले स्केटर
X
ध्रुव-शिशिर कमाडी, लिंबो स्केटिंग में गिनीज बुक में रिकॉर्ड बनाने वाले स्केटरध्रुव-शिशिर कमाडी, लिंबो स्केटिंग में गिनीज बुक में रिकॉर्ड बनाने वाले स्केटर

  • दो साल की उम्र में बड़े भाई के स्केट्स से की शुरुआत, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है नाम 

मेरा जन्म महाराष्ट्र के चंद्रपुर में हुआ। दो वर्ष का होने तक मैं ठीक से चल-बोल नहीं पाता था। मेरी मां शिल्पा की किडनियां जन्म से सिकुड़ी हुई थीं, पेनक्रियाज की दिक्कत और शुगर अलग से थी। यह सब जानते हुए भी पिता सुभाष कमाडी ने 2004 में उनसे शादी की।

 

चार साल बाद भी कोई बच्चा नहीं हुआ तो दोनों ने बेटा गोद ले लिया जिसका नाम रखा क्षितिज। फिर 2010 में मेरा जन्म हुआ तो दोनों की खुशी दोगुनी हो गई। सुबह दोनों सैर पर जाते समय क्षितिज को भी ले जाते थे। वहां एक छोटे से खेल परिसर में बच्चों को स्केटिंग करते देख उन्होंने क्षितिज के लिए भी स्केट खरीदे, लेकिन उसे जिमनास्टिक पसंद था। इस बीच मैं दो साल का हो चुका था, लेकिन चल-बोल नहीं पाता था।

 

माता-पिता के नौकरी पर चले जाने के बाद दिनभर मैं भाई के स्केट से खेलता रहता था। एक दिन दोनों ने देखा कि मैं घर में स्केटिंग कर रहा हूं। उन्होंने मुझे इसकी कोचिंग दिलाने का फैसला किया, लेकिन इसके लिए न्यूनतम आयु साढ़े तीन वर्ष थी, मैं ढाई वर्ष का ही था। मां ने आवेदन देकर मुझे स्केट सिखाने की इजाजत ले ली।

 

साढ़े तीन वर्ष का होने पर मैंने चंद्रपुर िजला स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीत लिया। चार वर्ष का होने तक मैं बोतल से दूध पीता था। ठीक से बोल नहीं पाता था। लोग हंसते। मां कहती ‘तुझे किसी की परवाह नहीं करना है, तू बहुत आगे जाएगा’। 


मां ने सोचा यदि मुझे स्केटिंग में आगे जाना है तो अच्छे कोच की जरूरत होगी। 2015 में माता-पिता मुझे वीकेंड पर नागपुर ले जाते थे। मैंने 1 अगस्त 2015 को लिंबो स्केटिंग (दोनों पांव 180 डिग्री तक फैलाना) में गोल्ड मेडल जीता । मां ने गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड वालों से संपर्क किया। पता चला कि इसके लिए निर्धारित आयु पांच साल है, मैं कुछ दिन छोटा पड़ रहा था। लेकिन, वे लोग मेरा लाइव देखने को तैयार हो गए। मैंने सड़क पर ही परफॉर्म करने का फैसला कर लिया, क्योंकि चंद्रपुर में स्केटिंग की सुविधा नहीं थी।

 

दिसंबर 2015 को मेरा नाम लिंबो स्केटिंग में गिनीज बुक में दर्ज हो गया।  मेरे आठवें जन्मदिन पर मां इनलाइन स्केट्स खरीदना चाहती थीं, जो काफी महंगे आते हैं। इसके लिए उन्होंने पैसे जोड़े थे, लेकिन मां गंभीर बीमार हो गईं तो वे रुपए उनके इलाज पर खर्च हो गए। माता-पिता दोनों ही अनुदान प्राप्त संस्थानों में लेक्चरर होने के कारण उन्हें महीनों वेतन नहीं मिलता था। इस बार 17 महीने से वेतन नहीं मिला था। पिता मुझे नागपुर ले जाकर प्रैक्टिस नहीं करा सकते थे। मां ने चंद्रपुर में ही एक सामुदायिक भवन वाले से बात की ताकि जब वह खाली रहे, तब मैं वहां प्रैक्टिस कर सकूं। गिनीज बुक वालों ने मेरा टेस्ट लिया और मैंने रिकॉर्ड बना दिया। 


इसके बाद मां की तबीयत खराब हुई तो नागपुर में भर्ती करना पड़ा। इसी बीच नंदूरबार में राज्यस्तरीय स्पर्धा में अंडर 8 वर्ष के लिए मेरा चयन हो गया, मैं तो मात्र 6 वर्ष का ही था। पिता ने कहीं से उधार लेकर कार किराए पर ली और हम वहां गए। यहां मैं फाइनल तक ही पहुंच पाया। लौटते समय 8 जनवरी 2017 को कार का एक्सीडेंट हो गया और मैं 15 फीट गहरी खाई में जा गिरा। सौभाग्य से किसी को ज्यादा चोट नहीं आई। इसके बाद मैंने चार टूर्नामेंट में भाग लेकर चार गोल्ड जीते।

 

हमने जीत के जश्न में रक्षाबंधन पर्व मनाया। त्योहार के अगले दिन मां उठ नहीं रही थीं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन पापा, भाई और अन्य लोग रो रहे थे मां हमें छोड़कर चली गईं। मां ने जाने से पहले वर्ल्ड रिकॉर्ड स्पर्धा में मेरा नाम लिखा दिया था जो पुणे में होनी थी। अब सवाल यह था कि वहां मुझे लेकर कौन जाएगा? फिर मैं मामा के साथ पुणे चला गया। मैंने वहां भी गोल्ड मेडल जीतकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। मैं अब सामान्य बच्चों जैसा व्यवहार करने लगा था।


सितंबर में साढ़े छह साल की आयु में तिरुपति में मैंने एक हजार मीटर की स्पर्धा में ट्रायल पास किया। मैं सेकंड स्टैंडर्ड में आ चुका था। 2018 में फास्ट हाफ स्केटिंग के लिए भी मां ने नाम लिखा रखा था, करीब 21 किलोमीटर की दूरी मुझे निर्धारित से कम समय में तय करना थी। उसकी तैयारी करने के लिए मेरे पास कोच और ग्राउंड नहीं था। पिता टू व्हीलर पर साथ चलते थे और मैं उनकी लेफ्ट साइड में स्केट पर दौड़ लगाता था। वाहनों के शोर और हॉर्न से मेरा ध्यान भंग होता था, लेकिन मैंने ऐसी कठिन स्थिति में भी अभ्यास जारी रखा। इस स्पर्धा के लिए मैं बहुत छोटा था, मेरे पैर दर्द करते थे। पिता रात को पैरों की मालिश करते थे, डॉक्टर के पास ले जाते थे।


2 अक्टूबर 2018 को गिनीज बुक की टीम ने देखा कि यह बच्चा रोड पर कैसे 21 किमी स्केटिंग कैसे करेगा? मेरे सामने  मां का चेहरा आ गया- ‘तू कर सकता है। दिखा दे।’ मैंने शाम 4 बजे स्केटिंग शुरू की और 1 घंटा, 5 मिनट, 5 सेकंड में दूरी तय कर पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया। मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हो गया। इसके बाद गोवा में 25वीं नेशनल रोलर स्केटिंग चैम्पियनशिप दो बार जीती। लोगों ने कहा इसे इनलाइन स्केटिंग शूज दिलाओ। इतने पैसे हमारे पास नहीं थे। जब यह बात मुंबई में माने अस्पताल के डॉक्टर शिशिर पंड्या को पता चली तो उन्होंने 25 हजार रुपए अपने एक डॉक्टर अमोल के हाथ भिजवाए। उसमें पांच हजार रुपए और मिलाकर पिता ने मेरे लिए वे शूज खरीदे। मैं लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ता चला गया। जिला स्तर, राज्य स्तरीय से लेकर नेशनल लेवल तक की स्पर्धाओं में मैं 23 गोल्ड, 6 सिल्वर, 3 कांस्य के मेडल जीते। 2017 में मैंने नॉन स्टॉप स्केटिंग कर एक और रिकॉर्ड बनाया। मां की सकारात्मक सोच ने ही मुझे चैंपियन बनाया।   (जैसा उन्होंने दैनिक भास्कर को फोन पर बताया)

Astrology
Click to listen..