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भास्कर इंटरव्यू:प्रशांत भूषण का मानवाधिकार आयोग के नए अध्यक्ष पर आरोप, बोले- जस्टिस अरुण मिश्रा का सरकार के पक्ष में फैसले सुनाने का ट्रैक रिकॉर्ड

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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जस्टिस अरुण मिश्रा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल, जस्टिस मिश्रा की छवि सरकार के पक्ष में फैसले सुनाने की बनी हुई है। आदिवासियों से जुड़े मसलों में भी जस्टिस मिश्रा ने राज्य के पक्ष में फैसले सुनाए। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण उनके कई फैसलों का जिक्र करते हुए उन्हें मानवाधिकारों के प्रति असंवेदनशील बताते हैं। भास्कर ने उनसे इस मसले पर सवाल-जवाब किए, आप भी पढ़िए...

जस्टिस मिश्रा को मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने पर इतना हंगामा क्यों?

देखिए मानवाधिकार जैसी संस्था का अध्यक्ष ऐसे व्यक्ति को बना दिया जाए, जिसका मानवाधिकारों के हित में काम करने का कोई ट्रैक रिकॉर्ड न हो, बल्कि उल्टे उनका ट्रैक रिकॉर्ड मानवाधिकारों के प्रति बहुत बुरा हो तो सवाल तो उठेंगे ही। सुप्रीम कोर्ट में जब भी इनके सामने कोई पॉलिटिकली सेंसिटिव केस आया तो इन्होंने सरकार का पक्ष लिया।

मानवाधिकार आयोग नियामक संस्था है। सरकार की तरफ से किसी भी तरह के मानवाधिकार का हनन हो तो उस पर अंकुश लगाने का काम मानवाधिकार आयोग का है। जस्टिस मिश्रा का ट्रैक रिकॉर्ड ही सरकार के पक्ष में फैसले देने का है तो फिर मानवाधिकार आयोग का अब क्या हाल होने वाला है, ये सोचने वाली बात है। मानवाधिकारों की रक्षा करने वाली इतनी बड़ी संस्था को खत्म करने के खिलाफ हमारी आपत्ति है।

क्या उनकी नियुक्ति में नियम नहीं माने गए, क्या इस तरह के पद पर नियुक्ति से पहले ट्रैक रिकॉर्ड चेक होने का कोई नियम है?

देखिए, कोई कानूनी नियम नहीं है कि ट्रैक रिकॉर्ड चेक किया जाए, पर यह तो समझने वाली बात है कि आप मानवाधिकार आयोग में किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं बैठा सकते, जिसके खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के कई आरोप हों। जिसका ट्रैक रिकॉर्ड अपने पद के कर्तव्यों के बिल्कुल विपरीत हो। जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति में कानूनी तौर पर किसी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। पर, हमारी आपत्ति उनके पिछले फैसलों को लेकर है, जो साफ दिखाते हैं कि वे मानवाधिकारों के हितैषी नहीं हैं। उनका झुकाव सरकार की तरफ है।

आपको लगता है कि हाल ही में रिटायर हुए जजों में कुछ ऐसे नाम थे, जिनकी इस पद पर नियुक्ति होनी चाहिए थी?

हां बिल्कुल। हाल ही में रिटायर होने वाले दूसरे जजों का ट्रैक रिकॉर्ड चेक करेंगे तो ऐसे कुछेक नाम मिल जाएंगे, जिनका मानवाधिकारों के प्रति बढ़िया रिकॉर्ड रहा है। उदाहरण के तौर पर हाल में रिटायर हुए जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसफ, जस्टिस दीपक गुप्ता, जिनका मानवाधिकारों के प्रति बहुत बढ़िया रिकॉर्ड रहा है। लेकिन चुना गया जस्टिस मिश्रा को, क्यों? इसे उनकी सरकार से नजदीकी नहीं तो और क्या कहेंगे?

इस पद के लिए दो योग्यताएं जरूरी हैं। पहली- वह व्यक्ति मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील हो। दूसरी- वह सरकार से स्वतंत्र हो, लेकिन यह दोनों ही काबिलियत जस्टिस मिश्रा में नहीं हैं।

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे वकील दुष्यंत दवे ने चीफ जस्टिस बोबडे को पत्र लिखा था कि एक खास औद्योगिक घराने के सारे केस जस्टिस मिश्रा के पास जा रहे हैं, क्या उस वक्त जस्टिस मिश्रा को लेकर ऐसी आपत्तियां और लोगों ने उठाईं थीं?

यह लेटर सार्वजनिक हुआ था। पब्लिक डोमेन में यह लेटर है। दवे ने अडाणी ग्रुप का नाम लिया था। तब भी जस्टिस मिश्रा पर बहुत सवाल उठे थे। जनवरी 2018 में चार जजों; जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ, ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उसमें कहा था कि तत्कालीन चीफ जस्टिस अपनी पोजिशन का दुरुपयोग कर रहे हैं। पॉलिटिकल सेंसिटिव केस ऐसी बेंच और जज के पास भेजे जा रहे हैं जो सरकार के पक्ष में हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या आप लोग जज लोया की हत्या के केस का जिक्र कर रहे हैं? तो जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा, हां हमें उसकी वजह से यह प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ी। उसी दिन जज बृजमोहन हरकिशन लोया की हत्या का केस अरुण मिश्रा की बेंच को भेजा गया था। जबकि उस समय वे काफी जूनियर जज थे। इतना पॉलिटिकली सेंसिटिव केस इतने जूनियर जज के पास भेज देना और यह जानते हुए कि वह जज सरकार के साथ तालमेल में हैं। जज लोया सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे।

जस्टिस मिश्रा पर आरोप है कि उन्होंने एक के बाद एक कई फैसले अडाणी की कंपनी के पक्ष में सुनाए, कुछ खास मामलों के बारे में बताएंगे?
ज्यादातर मामले इलेक्ट्रिसिटी एग्रीमेंट्स के थे। एक ऐसा ही केस था, अडाणी ने स्टेट्स इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के साथ 25 साल का कॉन्ट्रैक्ट किया। फिर कहने लगे कि हम तो कोयला इंडोनेशिया से मंगाते हैं, कोयला महंगा हो गया है, इसलिए हमें ज्यादा दाम दिया जाए। जबकि कॉन्ट्रैक्ट हो चुका था। इस तरह के कई फैसले अरुण मिश्रा ने अडाणी के पक्ष में किए, जिससे अडाणी को कम से कम 20 हजार करोड़ का फायदा हुआ। यह सारे केस पब्लिक डोमेन में हैं।

तो क्या वह सारे फैसले गलत सुनाए गए?
फैसले ठीक थे या गलत, इस पर इसलिए सवाल उठेंगे क्योंकि एक खास बेंच जिसमें हर बार अरुण मिश्रा शामिल थे, उन्हें ही अडाणी के सारे केस सौंपे गए। दूसरी बात दो केस तो ऐसे थे, जिन्हें वेकेशन लीव में ही सुनवाई करने के बाद फैसला सुना दिया गया, फैसला अडाणी के हक में ही आया। वो भी ये फैसले तब सुनाए गए, जब दूसरी साइड के काउंसिल नहीं थे। उनसे पूछा भी नहीं गया। क्या ऐसा होता है? क्या कोई और बेंच नहीं थी? कोई और जज कोर्ट में नहीं थे? उस वक्त के चीफ जस्टिस को लिखी अपनी चिट्ठी में दुष्यंत दवे ने इन दोनों केसेज का प्रमुखता से जिक्र किया था। और ये तो सबको पता है कि अडाणी की सरकार से नजदीकी है।

जस्टिस मिश्रा का प्रधानमंत्री की तारीफ करना कितना बड़ा मुद्दा है?
प्रशंसा करना ज्यूडिशियल इंप्रोपराइटी (कोर्ट का नियम तोड़ना, लॉ का उल्लंघन) माना जाता है, क्योंकि जब आप खुली सभा में यह कह रहे हैं कि मोदीजी तो वर्सेटाइल जीनियस हैं, तो इसका मतलब है कि आप उनसे प्रभावित हैं। और जब प्रभावित हैं तो सरकार के खिलाफ या सीधा उनके खिलाफ कोई मामला आने पर निष्पक्ष कैसे रहेंगे?

आप जब जज हैं तो आपके पास सरकार से जुड़े कई मुद्दे आते ही हैं, जैसे कि इनके पास भी आए, चाहें वो CBI डायरेक्टर का हो, चाहे CVC के चेयरमैन का हो या फिर बिरला-सहारा डायरीज का मामला हो। बिरला सहारा डायरी में तो सीधा डायरी में दर्ज था कि 2013 में इन्होंने मोदी जी को 25 करोड़ रु. और 40 करोड़ रु. दिए। अब यह केस जस्टिस अरुण मिश्रा के पास आया, तो इन्होंने कह दिया कि ऐसे बड़े लोगों के खिलाफ लूज पेपर के आधार पर जांच नहीं कराई जा सकती।

केसेज के अलावा भी क्या कुछ ऐसा है, जो दिखाए कि सरकार ने इन्हें फेवर किया है?
हां, बिल्कुल। रिटायरमेंट के बाद सभी जजों को एक महीने के भीतर सरकारी आवास खाली करना पड़ता है, लेकिन इन्हें एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन मिलता रहा। इससे पहले सभी जजों ने एक महीने के भीतर घर खाली कर दिया तो इन्हें क्यों 9 महीने तक उसी आवास में रहने दिया गया? सरकार का इन्हें एक्सटेंशन देना दो बातें दर्शाता है। पहली- सरकार इन्हें बहुत ज्यादा फेवर करती है। दूसरी- शायद सरकार को पता था कि इन्हें यह घर खाली ही नहीं करना पड़ेगा। सरकार ने इन्हें NHRC का अध्यक्ष बना दिया।