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कश्मीर की मशहूर कनी पश्मीना शॉल:सवा लाख की शॉल, कारीगर को मिलते हैं रोजाना सिर्फ 250 रु; PM मोदी भी इसे पहनने के शौकीन

श्रीनगर4 दिन पहलेलेखक: मुदस्सिर कुल्लू

PM मोदी ने 19 नवंबर कृषि कानून वापस लिया। इस दौरान उन्होंने जो कश्मीरी कनी पश्मीना शॉल पहना था, उसकी कीमत 1.25 लाख रुपए बताई जा रही है। इसकी बुनाई में पूरे 6 महीने का समय लगा था। PM मोदी शॉल के शौकीन हैं। उन्हें कई मौकों पर महंगे शॉल, जैकेट और घड़ियां पहने देखा जाता है। कनी शॉल को दुनियाभर के बड़े म्यूजियम्स में कलेक्शन के तौर पर रखा गया है। इनमें लंदन का विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम, पेरिस में मुसी डेस आर्ट्स डेकोरेटिफ्स और न्यूयार्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट का इस्लामी आर्ट डिपार्टमेंट शामिल है।

कनी पश्मीना शॉल के बारे में और जानने के लिए, दैनिक भास्कर के मुदस्सर कुल्लू ने कश्मीर के बडगाम जिले के कनिहामा गांव का दौरा किया। यह गांव कनी शॉल को बनाने के लिए जाना जाता है।

फयाज अहमद वानी बडगाम जिले के कनिहामा गांव में रहते हैं। 42 साल के वानी पिछले 20 साल से कनी पश्मीना शॉल की बुनाई की काम कर रहे हैं। लेकिन इतना बेहतरीन काम करने के बावजूद उन्हें अपने मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। वानी बताते हैं कि, शॉल की बुनाई से उन्हें रोजाना केवल 250 रुपए मिलते हैं। वानी के परिवार में 5 लोग हैं और इस कमाई में उनका पेट पालना बहुत मुश्किल है।

शॉल की एक फैक्ट्री में बुनाई करते कारीगर
शॉल की एक फैक्ट्री में बुनाई करते कारीगर

15 साल पहले उन्हें 6 महीने तक शॉल बुनने पर 80 हजार रुपए का मेहनताना मिलता था। अब केवल 30 हजार रुपए ही मिलते हैं। वानी कहते हैं- मुझे इस बात का पछतावा है कि मैने ये पेशा चुना। इसमें बिचौलियों की संख्या बहुत ज्यादा है। ये लोग बहुत ज्यादा पैसा कमाते हैं और इनके मुकाबले हमें कुछ भी नहीं मिलता।

कनिहामा के अब्दुल राशिद का हाल भी वानी की तरह ही है। 2 बच्चों के पिता राशिद पिछले 30 साल से शॉल की बुनाई का काम कर रहे हैं। राशिद भी अपने परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पिछले 30 साल से कनी शॉल बनाने जानने बाद भी, वह रोज 10 घंटे काम करने के बदले 250 रुपए ही कमा पाते हैं।

कारीगरों पर लोन वापस करने की चुनौती
राशिद कहते हैं- मुझे यह पुश्तैनी पेशा चुनना ही नहीं चाहिए था। सरकार का दावा है कि वे कारीगरों के लिए बहुत कुछ कर रही है, लेकिन हकीकत में स्थिति बिल्कुल उलट है। हम कारीगरों पर बैंकों का लोन बकाया है, जिसे हम चुका नहीं पा रहे। हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने में मुश्किलें आ रही है। राशिद की तरह ही, कनिहामा में सैकड़ों कारीगर हैं, जो अपनी राेजी- रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनकी कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें वो सब नहीं मिलता, जिसके वह हकदार हैं।

कनी शॉल का इतिहास

कश्मीरी कनी पश्मीना शॉल अपनी खूबसूरत नक्काशी के लिए जाना जाता है।
कश्मीरी कनी पश्मीना शॉल अपनी खूबसूरत नक्काशी के लिए जाना जाता है।

​​​​​​माना जाता है कि कनी शॉल बुनाई कनिहामा गांव की देशी कला है। यह काम 3000 ईसा पूर्व से होता चला आ रहा है। कश्मीरी भाषा में कनी का मतलब लकड़ी का छोटा आयताकार चरखा होता है। इस शॉल को 70 से अधिक कानिस या लकड़ी की सुइयों का इस्तेमाल कर बुना जाता है। अच्छी क्वालिटी और हाथ की कारीगरी की वजह से कश्मीरी शॉल और कालीनें दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।

कश्मीर में कालीन, पेपर-माची, शॉल, लकड़ी की नक्काशी और हैंडीक्राफ्ट का काम करने वाले 3 लाख लोगों के सामने रोजी- रोटी का गंभीर संकट है। अगस्त 2019 में आर्टिकल 370 के हटने के बाद और पूरे कोरोना के दौरान कश्मीर में बंद लागू था, जिस वजह से परेशानी और भी बढ़ गई।

कश्मीरी शॉल के एक्सपोर्ट में कमी
जम्मू-कश्मीर सरकार के हैंडीक्राफ्ट डिपार्टमेंट के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 3 साल में कश्मीर से शॉल का एक्सपोर्ट तेजी से गिरा है । 2018-19 के दौरान 305.90 करोड़ रुपए, 2019-20 में 271.62 करोड़ रुपए और 2020-21 में 172.53 करोड़ रुपए का एक्सपोर्ट हुआ था। हालात ऐसे हैं कि कनिहामी में सरकारी हैंडलूम डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की कनी शॉल वीविंग फैक्ट्री पिछले 18 महीने से बंद है।

कनिहामा गांव में मौजूद कनी पश्मीना शॉल बनाने वाली एक निजी फैक्ट्री
कनिहामा गांव में मौजूद कनी पश्मीना शॉल बनाने वाली एक निजी फैक्ट्री

पिछले 45 साल से शॉल बुन रहे 60 साल के बशीर अहमद वानी इन दिनों बेरोजगार हैं। बशीर कहते हैं- अगर यह फैक्ट्री खुली होती तो हमें शॉल बुनने पर रोजाना 300 से 400 रुपए की आमदनी होती, लेकिन फैक्ट्री बंद है। इस फैक्ट्री से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा था। पिछले 2 साल से यहां के कारीगर काफी परेशान हैं।