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अब सिर्फ यादों में संस्कृत के प्रोफेसर यूसुफ:वो अक्सर कहते थे-अगर संस्कृत न सीखी होती, तो मैं ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का अर्थ कभी नहीं जान पाता

एक महीने पहले
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संस्कृत भाषा में यूनिवर्सिटी के पहले और दुनिया के दूसरे मुस्लिम स्कालर थे, जिन्होंने ऋग्वेद में पीएचडी की थी - Dainik Bhaskar
संस्कृत भाषा में यूनिवर्सिटी के पहले और दुनिया के दूसरे मुस्लिम स्कालर थे, जिन्होंने ऋग्वेद में पीएचडी की थी
  • एएमयू के पहले स्कॉलर, जिन्होंने ऋ ग्वेद में पीएचडी की, नौ किताबें और 55 शोध लिखे

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के संस्कृत विभाग के पूर्व चेयरमैन प्रो. खालिद बिन यूसुफ नहीं रहे। वे 54 साल के थे। कोरोना संक्रमण से उनका निधन हो गया। वे संस्कृत भाषा में यूनिवर्सिटी के पहले और दुनिया के दूसरे मुस्लिम स्कालर थे, जिन्होंने ऋग्वेद में पीएचडी की थी। उन्होंने 9 किताबें और 55 शोध पत्र लिखे थे।

उन्होंने संस्कृत और अरबी भाषा में 300 से अधिक समान शब्दों को खोजा और बताया कि संस्कृत और अरबी भाषाओं में बहुत समानता है, क्योंकि हजारों साल पहले इन दोनों भाषाएं बोलने वाली मानवीय सभ्यता संबंधित भूभाग पर फैली हुई थी। खालिद को वेद-पुराणों का भी अच्छा ज्ञान था।

वे चाहते थे नई पीढ़ी संस्कृत को पढ़े और जाने

प्रो. खालिद बिन यूसुफ का एकाएक चले जाना संस्कृत भाषा और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बहुत बड़ी क्षति है। संस्कृत व वेदों पर उनका बहुत-सा काम अधूरा रह गया। उनकी लिखी संस्कृत भाषा सीखने की किताब ‘बोधी मयूख’ एएमयू में बच्चों को पढ़ाई जाती है। वे चाहते थे कि नई पीढ़ी संस्कृत को पढ़े और जाने। वे हमेशा कहते थे कि इसे सिर्फ यूपीएससी जैसी परीक्षाओं के लिए स्काेरिंग सब्जेक्ट भर न मानें। संस्कृत ही वह भाषा है, जो मैंने न सीखी होती तो शायद वसुधैव कुटुम्बकम का अर्थ नहीं जान पाता। उन्होंने वेद मंत्रों के लोकजीवन के महत्व पर भी बहुत काम किया था।

वे रिटायर होने के बाद संस्कृत व वेदों को लेकर बड़ा काम करना चाहते थे। हालांकि, उनके रिटायर होने में 6 साल बाकी थे। वे ‘सर्वधर्म समभाव’ के परम हितैषी होने के साथ मानवतावादी थे। वेद व कुरान में समानता पर वे बहुत कुछ लिखना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए काफी सामग्री भी जुटाई थी। इस पर उनके बहुत से शोध पत्र हैं। उन्होंने ‘ऋग्वेद के नीति तत्व’, ‘इंद्र सूक्त में नीति तत्व’ ‘कुरान में मानवतावाद’ किताबें लिखी थीं। प्रो.खालिद ने एएमयू में 11वीं कक्षा से पढ़ाई शुरू की थी और यहीं उन्हें प्रोफेसर बनने का मौका मिला। मैं एएमयू में स्नातक संस्कृत पढ़ रहा था, तब वे भारतीय दर्शन पढ़ाते थे।

मेरा सौभाग्य है कि मुझे उनके साथ काम करने का भी मौका मिला। संस्कृत के प्रति ऐसे समर्पित बिरले ही होंगे। उनके निजी जीवन में हमेशा ट्रेजडी रही। पहले पिता, फिर मां का साया उठ गया। एएमयू में लेक्चरर थे। उसी समय भोपाल हादसे की जांच कर रहे इनके भाई अलीगढ़ आए थे। उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते समय हादसे में भाई की मौत हो गई और वे भी 3 साल बिस्तर पर रहे। मेरी कोशिश होगी कि उन्होंने जो शोध पत्र लिखे हैं और अप्रकाशित हैं, उसे किताब का रूप दूं।’