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मोबाइल गेमिंग / पबजी-फोर्टनाइट की लत, 2 साल में 3 गुना बढ़े गेमिंग रोगी



Pubj-FortNite game addiction
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  • देश में 68 फीसदी बच्चे खेल रहे हैं गेम
  • पबजी अब तक 20 करोड़ बार हो चुका डाउनलोड 
  • इसकी प्रतिदिन कमाई औसतन 12 करोड़ रु. 

Dainik Bhaskar

Dec 12, 2018, 12:00 PM IST

धर्मेन्द्र सिंह भदौरिया, बेंगलुरु. बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस परिसर में शट क्लीनिक में तीन-चार बच्चे माता-पिता के साथ आए हैं। डॉक्टर के केबिन में विशाल बैठा है। डॉक्टर विशाल से पूछते हैं कि उसके कितने दोस्त हैं। वह पूछता है- ऑनलाइन या ऑफलाइन? ऑनलाइन 500 से ज्यादा, जबकि ऑफलाइन दो-तीन।

 

विशाल ने बताया कि वह रोज 9 घंटे पबजी खेलता है। विशाल की तरह पबजी व फोर्टनाइट जैसे गेम्स की लत के शिकार तेजी से बढ़ रहे हैं। भास्कर के सर्वे में यह सामने आया है कि 68% बच्चे कोई न कोई गेम खेल रहे हैं। देश में 22 करोड़ से ज्यादा गेमर्स हैं। बच्चे 14 घंटे तक मोबाइल गेम्स में बिता रहे हैं।

 

शट (सर्विसेस फॉर हेल्दी यूज़ ऑफ टेक्नोलाॅजी) क्लीनिक के प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं सबसे बड़ी चुनौती तो यह होती है कि ज्यादातर केसों में बच्चे मानते ही नहीं हैं कि वे बीमार हैं। हमें वर्ष 2013 से इस बीमारी से संबंधित मरीज लगातार मिलना शुरू हुए। वर्ष 2016 में जब से इंटरनेट सस्ता हुआ है ऐसे मरीजों की संख्या में तीन गुना वृद्धि हो गई है। अभी सर्वाधिक केस पबजी के ही आ रहे हैं। 12 से 23 वर्ष के उम्र तक के युवा हमारे पास आ रहे हैं।

 

प्रो. डॉ. मनोज कुमार शर्मा कहते हैं कि हर सप्ताह तीन से चार नए मरीज हमारे पास आते हैं। दवाओं के अलावा ऐसे बच्चों के इलाज के लिए 8 से 25 काउंसलिंग सेशन लेने पड़ रहे हैं।

 

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क्लीनिक की सीनियर रिसर्च फेलो अश्विनी तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास ऐसे केस भी आते हैं जिसमें बच्चों की फिजिकल एक्टिविटी बंद हो जाती है। न सिर्फ सोशल लाइफ खत्म हो रही है बल्कि वे नहा भी नहीं रहे हैं, खा भी नहीं रहे हैं। रात-रात भर सोते भी नहीं हैं। दिन में सोते हैं, स्कूल नहीं जाते हैं- स्कूल जाते भी हैं तो वहां ऊंघते रहते हैं। अगर कोई दोस्त भी आता है तो उसके साथ भी पबजी खेलते हैं।

 

तडपत्रिकर कहती हैं कि हमारे पास सबसे ज्यादा केस न्यूक्लियर फैमिली या जिनके माता-पिता दोनों नौकरी कर रहे हैंं उनके परिवारों से आते हैं। बच्चा सिंगल चाइल्ड है तब भी ऐसे केसेस सामने आते हैं। शुरुआत में पैरेंट्स बच्चों को तकनीक सिखाते हैं और एक्सपोजर के नाम पर फिर बच्चे मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करने लगते हैं। गेमिंग की शुरुआत में फन, मनोरंजन, जीतने के लिए और टाइम पास के लिए टीनएजर्स जुड़ते हैं।

 

वे बताती हैं कि हम मोटीवेशनल क्लास, थैरेपी और पैरेंटल एज्युकेशन देते हैं। लाइफस्टाइल चेंज करने को प्रोत्साहित करते हैं। हम अचानक गेम्स नहीं छुड़वाते हैं। नहीं तो बच्चा चिड़चिड़ा और कभी-कभी आक्रामक भी हो जाता है। हम दिन में या शाम में एक ही वक्त सीमित समय के लिए खेलने को कहते हैं।

 

ऐसे बच्चों को ज्यादा देर अकेले में नहीं रहने देना चाहिए, परिवार को साथ समय बिताना चाहिए। गेम्स के अलावा यह लत सोशल मीडिया- जैसे वॉट्सएप, फेसबुक पर अधिक वक्त बिताने, पोर्न साइट देखने, नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉटस्टार पर कई सीरीज प्रोग्राम देखने के कारण भी सामने आए हैं। उम्रदराज लोगों में इन कारणों के साथ ही महिलाओं में ऑन लाइन शॉपिंग करने और सोशल मीडिया पर समय बिताने और पुरुषों में गेम्बलिंग और ट्रेडिंग करने के केस भी आए हैं। 

 

गौरतलब है कि टेक्नोलॉजी एडिक्शन का देश का पहला और सबसे बड़ा सेंटर निम्हांस में ही चलता है। यहां इस बीमारी से पीड़ित बच्चे देशभर से आते हैं। कानपुर, दिल्ली, पंजाब, पटना, ओडीशा, बेंगलुरु, कर्नाटक आदि क्षेत्रों से बच्चे आते हैं। बच्चे पबजी के अलावा डोटा-1, डोटा-2, फोर्टनाइट, काउंटर स्ट्राइक, वर्ल्ड ऑफ वॉर-क्राफ्ट जैसे खेलों की गिरफ्त में आ रहे हैं। अब यह बीमारी संपन्न परिवारों के बच्चों से लेकर छोटे शहर-गांवों के मध्यमवर्गीय परिवारों तक पहुंच गई है।
भारत में हैं 22 करोड़ गेमर्स

 

गेमिंग एनालिटिक्स फर्म न्यूज़ू के मुताबिक दुनियाभर में आज गेमिंग इंडस्ट्री की कमाई 138 अरब डॉलर (करीब 9700 अरब रुपए) से ज्यादा की हो चुकी है। इसमें लगभग 51 फीसदी हिस्सेदारी मोबाइल सेगमेंट की है।  वहीं गेमिंग रेवेन्यू के मामले में भारत टॉप 20 देशों में आता है। 2021 तक गेमिंग मार्केट की कमाई 100 अरब डॉलर से अधिक होने की संभावना है। न्यूज़ू के मुताबिक पूरी दुनिया में 2.3 अरब गेमर्स हैं। इसमें 22 करोड़ गेमर्स भारत से हैं।
डब्ल्यूएचओ ने इसे अब बीमारी कहा

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसी साल गेम खेलने की लत को मानसिक रोग की श्रेणी में शामिल किया है। इसे गेमिंग डिसऑर्डर नाम दिया गया है। शट क्लीनिक के अनुसार टेक एडिक्शन वालों में 60 फीसदी गेम्स खेलते हैंं। 20 फीसदी पोर्न साइट देखने वाले होते हैं। बाकी 20 फीसदी में सोशल मीडिया, वॉट्सएप आदि के मरीज आते हैं।
ऐसे पहचानें इसके लक्षण

 

प्रोफेसर शर्मा कहते हैं कि खुद का खुद पर नियंत्रण खत्म हो रहा है, गेम खेलते हैं तो खेलते ही रहते हैं। जीवन शैली में एक ही एक्टिविटी रह गई है। नुकसान की जानकारी होने के बावजूद आप खेलते रहते हैं। छह महीने से एक साल में आप ऐसा अपने बच्चे में देखते हैं तो समझें कि टेक्नोलॉजी एडिक्शन है। यह कुछ केसों में पहले भी हो सकता है।
(स्टोरी में सभी बच्चों के नाम और स्थान परिवर्तित हैं।)

 

 

ऐसे होती है गेम्स की कमाई, पबजी रोज कमा रहा 12 करोड़ रु. :

पबजी के रेवेन्यू में 2.7 गुना बढ़त हुई है। इसकी प्रतिदिन कमाई औसतन 12 करोड़ रु. तक है। पबजी अब तक 20 करोड़ बार डाउनलोड किया जा चुका है। इसके तीन करोड़ एक्टिव यूजर्स हैं। पबजी और फोर्टनाइट गेम्स इन-एप परचेज के माध्यम से पैसा कमाते हैं। यानी ये गेम के अंदर ही कुछ टूल (जैसे क्रेट्स, लूट बॉक्स आदि) खरीदने के लिए ऑफर करते हैं।

 

उदाहरण के लिए पबजी में गेम के कैरेक्टर के लिए कॉस्मेटिक खरीदने का विकल्प है। ऐसे ही पबजी ने इलाइट रॉयेल पास लॉन्च किया, जिससे गेम अपग्रेड हो जाता है और नए चैलेंज जुड़ जाते हैं। लेकिन इसके लिए प्लेयर को पैसे चुकाने होते हैं। अन्य प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग से भी पबजी ने पैसे कमाए। जैसे मिशन इम्पॉसिबल फिल्म के प्रमोशन के लिए गेम ने अपनी थीम बदल दी थी।

 

68 फीसदी बच्चे खेल रहे हैं गेम :

भास्कर ने देश के बड़े स्कूलों में 991 बच्चों का एक सर्वे किया। इसमें हमने कक्षा 8 के बच्चों को ही शामिल किया था। इसमें सामने आया कि 68.2 फीसदी बच्चे मोबाइल पर कोई न गेम जरूर खेलते हैं। गेम खेलने वाले बच्चों में 52.6 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जो पबजी खेलते हैं।

 

गेम इतना खेला कि 10वीं में फेल हुआ :
लखनऊ का सौरभ 12वीं में है। पिता बिजनेसमैन हैं व मां दूसरे शहर में नौकरी करती हैं। 9वीं में गेम्स की लत लग गई। घर में झगड़े बढ़ गए। 10वीं में मैथ्स का पेपर छूट गया। फिर से परीक्षा दी। उसका मनोबल गिर गया। स्कूल बदला लेकिन वह और अधिक खेलने लगा। फिर पैरेंट्स क्लीनिक लाए। अब सौरभ ठीक है।
 

गेम की लत, स्कूल ने निकाल दिया :
हैदराबाद का तेजस 12वीं का छात्र है। गेम की लत से 10वीं में नंबर कम आए। 11वीं में लत बढ़ी तो 8-10 घंटे तक पबजी व फोर्टनाइट खेलने लगा। पढ़ाई बेहतर न होने पर स्कूल ने निकाल दिया। घरवालों ने रोका तो तोड़-फोड़ करने लगा। उसका वजन भी बढ़ गया था। 25 सेशन की काउंसलिंग के बाद अब तेजस सामान्य है। 

 

5वीं में दिया मोबाइल, गेम की लत पड़ी :
सौरभ-सुमन दोनों आईटी कंपनी में काम करते हैं। 4 साल पहले 5वीं क्लास मेंे बेटे रवि को मोबाइल दिलाया। अब 15 के हो चुके रवि को एक्सपोजर मिला तो 8-9 घंटे पबजी खेलने लगा। माता-पिता भी ऑफिस से घर आते तो इंटरनेट पर समय बिताते। पहली बार जब रवि क्लीनिक पर आया तो बोला -मुझसे ज्यादा इलाज की जरूरत तो माता-पिता को है।


 

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