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राजस्थान के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट:बिजली-सड़क जितनी दूर, कोरोना भी उतना ही दूर; दूसरी लहर आने से पहले ही मार्च से लगा दिया था लॉकडाउन

5 महीने पहले
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  • 25 किलोमीटर के दायरे में आते हैं करीब 9000 की आबादी वाले गांव
  • जांच के लिए सैंपल भी लिए गए, लेकिन सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई

राजस्थान के प्रतापगढ़ की ग्राम पंचायत पाल और मांड कला में न सड़क है, न बिजली है और न नेटवर्क आता है। ये कमियां ही कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ताकत साबित हो रही हैं। आज हम आपको राजस्थान के उन गांवों में ले चलते हैं, जहां पहुंचने के लिए लोगों को कच्चे रास्ते, पगडंडी और पानी से होकर गुजरना पड़ता है।

1. यहां कोरोना तो क्या, खांसी-बुखार भी दस्तक नहीं दे पाए
- प्रतापगढ़ से अजय कुमार और बारावरदा से महेश राव की रिपोर्ट

कोरोना की पहली लहर में जिले में करीब 100 से ज्यादा गांव ऐसे थे, जो पूरी तरह सुरक्षित बच गए, लेकिन दूसरी लहर ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। हालांकि अब भी कुछ ग्राम पंचायत और राजस्व गांव ऐसे हैं, जहां कोरोना तो क्या, खांसी-बुखार भी दस्तक नहीं दे पाए। इसकी वजह है यहां के जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों की सजगता।

जिला मुख्यालय से करीब 55 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत पाल है। यहां से करीब 8 किलोमीटर और आगे ग्राम पंचायत मांड कला है। इन दोनों ग्राम पंचायत में 8 राजस्व गांव और करीब 20 से ज्यादा ढाणियां हैं। ये सब लगभग 25 किलोमीटर के दायरे में फैली हुई हैं। आबादी 9 हजार लोगों की है।

वैसे यहां पर अब तक 10 फ्रंटलाइन वर्कर के साथ केवल 6 ग्रामीणों को ही कोरोना वैक्सीन लगी है, लेकिन कोरोना किसी को नहीं हुआ। इन 14 महीने में कहीं भी दूर-दराज तक कोरोना का कोई भी मामला सामने नहीं आया। ऐसा नहीं है कि यहां पर सैंपल नहीं लिए गए। हेल्थ डिपार्टमेंट ने सैंपल भी लिए, लेकिन सभी नेगेटिव ही आए।

जितनी दूर हेल्थ सेंटर, कोरोना से दूरी भी इतनी ही
प्रतापगढ़ से निकलने के बाद ग्राम पंचायत पाल तक करीब 55 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। जाखम बांध के मोड़ से करीब 10 किलोमीटर आगे सीता माता सेंचुरी के अधीन अनोपपुरा वन नाका तक पहुंचते-पहुंचते भास्कर टीम की गाड़ी का पहिया पंचर हो गया। बीच जंगल में स्टेपनी की मदद से दूसरा पहिया लगाया, लेकिन एक किलोमीटर बाद उसमें से भी हवा निकल गई। रास्ता इतना उबड़-खाबड़ और घुमावदार था कि गाड़ी गर्म होकर बंद हो गई।

यहां से एक बोलेरो की मदद से करीब 7 किलोमीटर आगे का सफर तय किया, लेकिन इसके बाद यहां से गाड़ी जाने का कोई रास्ता ही नहीं था। भास्कर के रिपोर्टर एक परिचित से साइकिल लेकर जंगल में पगडंडी के रास्ते आगे बढ़े। थोड़े ही आगे जाखम नदी का भराव क्षेत्र आ गया। कहीं आधा फिट तो कहीं घुटनों तक पानी था।

जूते खोल कर हाथ में लिए और अगले करीब ढाई किलोमीटर का सफर यहीं से पूरा किया। लेकिन पाल में एंट्री से ठीक पहले यहां निगरानी कर रहीं सरपंच संगीता मीणा और उनके पति बाबूलाल मीणा ने रास्ता रोक लिया। आने का कारण बताया तो वे बोले- पहली बार किसी मीडिया वाले ने यहां पर कदम रखा है, बड़ी खुशी हुई। चलो, आपको यहां के हाल-चाल बताते हैं।

हम जिन्हें कमियां मान रहे थे, यहां के लोग इसे ताकत बनाकर काम ले रहे हैं
पाल में सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क नहीं है। इन सभी सुविधाओं की दूरी यहां से कम से कम 18 किलोमीटर दूर है। नजदीकी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ग्यासपुर भी 18 किलोमीटर दूर है। पाल ग्राम पंचायत वह पहला गांव है, जिसके आगे से अन्य सभी गांव की सीमा शुरू होती है या यह कहें कि सीता माता सेंचुरी में बसे हुए गांव आते हैं।

सरपंच संगीता मीणा ने बताया कि सड़क नहीं होने से पाल में घुसने का इकलौता रास्ता अस्थाई पुल है, लेकिन कोरोना को दूर रखने के लिए यहां पानी में रखे गए एक टूटे हुए पेड़ को अब साइड में कर दिया गया है ताकि बिना जरूरत कोई अंदर-बाहर आए-जाए नहीं।

पाल पंचायत में जाने के लिए इस तरह रास्ता पार करना होता है। सरपंच, उनके पति और जनप्रतिनिधि पहरेदारी करते हैं।
पाल पंचायत में जाने के लिए इस तरह रास्ता पार करना होता है। सरपंच, उनके पति और जनप्रतिनिधि पहरेदारी करते हैं।

बिजली, मोबाइल नहीं तो तनाव भी नहीं मांड कला के सरपंच भाणजी मीणा बताते हैं कि यहां बिजली नहीं है। मोबाइल नेटवर्क नहीं है तो अमूमन कोरोना से जुड़ी खबरें भी सीधे नहीं पहुंच पातीं। लोगों को मानसिक तनाव नहीं होता और दिल से जुड़ी बीमारियां नहीं होतीं। अगर बिजली होती तो टीवी होता और मोबाइल होते। सोशल मीडिया या अन्य माध्यम से गलत सूचनाएं और खबरें लोगों तक पहुंचतीं तो भ्रम फैलता।

कोरोना के कदम रोकने के लिए उठाए ये 5 कदम

3 मार्च से ही लॉकडाउन, सभी आयोजन रद्द
राज्य सरकार ने 3 मई से सख्त लॉकडाउन शुरू किया, जबकि इन सभी गांव में सरपंच और जनप्रतिनिधियों ने कोरोना की दूसरी लहर को पहले ही भांप लिया। 3 मार्च से ही जून तक सभी धार्मिक, सामाजिक आयोजन रद्द कर दिए और शादियां टालने के निर्देश दे दिए।

सरपंच और जनप्रतिनिधि खुद रास्तों पर पहरेदारी देते हैं
ग्राम पंचायत पाल और मांड कला में दोनों सरपंच सहित उपसरपंच पाल सामाजी मीणा, मांडवला के लक्ष्मण मीणा, सामाजिक कार्यकर्ता रमेश चंद्र मीणा, सोहन लाल मीणा और कई वार्ड पंच खुद दिन में 4-4 घंटे की शिफ्ट में गांव में घुसने वाले रास्ते पर पहरेदारी देते हैं।

जरूरतमंदों को आने-जाने भी दिया जाता है, लेकिन बेवजह आने वालों को खाली हाथ लौटा भी दिया जाता है। इसके अलावा यहां ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के घर भी एक-दूसरे से काफी दूरी पर बनाए जाते हैं। ऐसे में यहां पर एक तरह से पहले पुराने जमाने से ही लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते आ रहे हैं।

गांव में घर इतने दूर-दूर बने हैं, जैसे घरों के बीच भी सोशल डिस्टेंसिंग हो।
गांव में घर इतने दूर-दूर बने हैं, जैसे घरों के बीच भी सोशल डिस्टेंसिंग हो।

गांव में ही मनरेगा के जरिए रोजगार
यहां के ग्रामीणों का प्रमुख रोजगार तेंदूपत्ता है, लेकिन अक्सर तेंदूपत्ता बेचने के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है। इससे कोरोना संक्रमण का खतरा था। सरपंच संगीता मीणा और भाणजी मीणा ने ग्रामीण स्तर पर ही ठेकेदार को इसकी सीधी खरीद के लिए मनाया ताकि लोगों को बाहर जाना नहीं पड़े। इसका दूसरा तोड़ मनरेगा के जरिए निकाला। हर ढाणी में 30 लोगों को हर 2 महीने में एक बार रोजगार देना तय किया।

झोलाछाप को ना, नर्सिंग कर चुके युवाओं से मदद
पीईईओ नानूराम मीणा की देखरेख में पाल में हेल्थ वर्कर कविता मीणा, तलाई पाल में रमीला मीणा, मांड कला में संसर मीणा यहां सर्वे और चिकित्सा सुविधा का काम लगातार कर रही हैं, लेकिन कई बार दूरदराज की ढाणियों तक सुविधाएं नहीं पहुंच पातीं। इसके लिए नर्सिंग कर चुके मुकेश चंद्र पारगी, दीपक राज गरासिया, विकास कुमार सोलंकी जैसे युवाओं से मदद ली जा रही है। करीब 10 साल पहले यहां पर आए दो झोलाछाप डॉक्टरों को ग्रामीणों ने खुद ही भगा दिया था।

हर घर मास्क और सैनेटाइजर
चाहे गांव की मुख्य बस्ती की आबादी हो या दूरदराज की ढाणियों में बसा कोई घर। यहां आपको लगभग हर घर में मास्क और सैनेटाइजर मिलेंगे। जब भास्कर टीम खलेल में नाराजी मीणा के घर पहुंची, तो वहां छोटे से लेकर बड़ों तक सब के मास्क देखकर चौंक गए। अंदर आते ही सबसे पहले उन्होंने हाथ सैनिटाइज करवाए, उसके बाद पानी पिलाया। उन्होंने बताया कि सरपंच संगीता मीणा की ओर से पाल ग्राम पंचायत में लोगों को नि:शुल्क मास्क और सैनिटाइजर दिए गए हैं।

यहां बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब मास्क पहने और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करते मिलेंगे।
यहां बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सब मास्क पहने और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करते मिलेंगे।

2. महिला के अंतिम संस्कार के लिए लोग आगे नहीं आए
- सीकर से यादवेंद्र सिंह राठौड़ की
रिपोर्ट

सीकर जिले के गांवों में काेरोना का कहर रुक नहीं रहा। बलांरा ग्राम पंचायत में कोरोना पॉजिटिव महिला के अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियों की जरूरत थी, लेकिन कोई ट्रैक्टर-ट्राॅली देने को तैयार नहीं हुआ। काेराेना के डर से सबने बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया। आखिर में एक युवक अपना ट्रैक्टर-ट्राॅली लेकर आया और खेत से लकड़ियां लेकर श्मशान पहुंचा। बलांरा गांव में पिछले 19 दिन में 19 लाेगाें की जान जा चुकी है।

बलांरा ग्राम पंचायत में महिला के अंतिम संस्कार के लिए कोई मदद को सामने नहीं आया।
बलांरा ग्राम पंचायत में महिला के अंतिम संस्कार के लिए कोई मदद को सामने नहीं आया।

राेरुं बड़ी गांव में एक ही परिवार के पांच लाेगाें की माैत, छठा वेंटिलेटर पर
लक्ष्मणगढ़ तहसील की राेरुं बड़ी ग्राम पंचायत में काेराेना के डर से लाेगाें ने घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया है। गांव के सरपंच महेंद्र गुर्जर ने बताया कि काेराेना से गांव में 13 दिन में 14 लाेगाें की माैत हाे चुकी है। एक परिवार में ताे पांच लाेगाें की जान जा चुकी है।

परिवार के सांवतसिंह शाेखावत ने बताया कि उनके भतीजे छाेटूसिंह का सतना में एक्सीडेंट हाे गया था, जयपुर में इलाज के दाैरान उन्हें काेविड हाेने से डेथ हाे गई। एक मई काे चचेरे भाई राजेंद्र सिंह की मौत हाे गई। दाे मई काे काेविड से ही राजेंद्र सिंह की बड़ी मां गुजर गईं। इसके बाद 8 मई काे छाेटू सिंह की मां सराेज कंवर की मौत हो गई। उनका अंतिम संस्कार करके आने के बाद उसी दिन दाेपहर दाे बजे सांवली काेविड सेंटर में सांवत सिंह के छाेटे भाई आनंद सिंह ने दम तोड़ दिया। 22 साल का भतीजा दीपेंद्र सिंह शेखावत सांवली काेविड अस्पताल में वेंटिलेटर पर है।

सांवत सिंह शेखावत ने बताया कि तीन दिन से वे लक्ष्मणगढ़ बीसीएमओ दिलीप सिंह कुल्हरी काे फाेन कर रहे हैं, लेकिन जांच के लिए आज तक टीम नहीं आई। यदि पूरे परिवार की जांच हाे जाती ताे निगेटिव आने वाले लोगों काे खेताें और रिश्तेदाराें के यहां क्वारैंटाइन कर बचा लेते।

शादियाें ने बांटा काेराेना
जिले की अंतिम ग्राम पंचायत दांतरू में 19 दिन में 30 लोगों की मौत हुई है। जेठवा का बास में पूर्व सरपंच सुप्यार देवी पत्नी गणेश खीचड़ के दाे बेटाें की 15 अप्रैल और 26 अप्रैल काे शादी थी। इस शादी में 1500 से ज्यादा लाेग और कई जनप्रतिनिधि भी शरीक हुए थे। माना जा रहा है कि यहीं से कोरोना फैला।

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