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भास्कर ओपिनियनआर्थिक आरक्षण:देश के लिए आरक्षण का कौन सा आधार उचित? आर्थिक या जातीय?

17 दिन पहले
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आरक्षण शब्द कानों तक आते ही हर किसी के मन में तरह-तरह के तर्क आने लगते हैं। जब पहली बार हरिजन-आदिवासियों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल यानी आरक्षित संसदीय या विधानसभा सीटों की बात चली तो गांधी जी ने इसका विरोध किया था।

उनका तर्क था कि यदि हरिजन-आदिवासियों के लिए अलग सीटें आरक्षित की गईं तो बाक़ी हिन्दूजन पिछड़ी जातियों की सहायता कर उन्हें ऊपर उठाने की अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से विलग हो जाएँगे।

ख़ैर सीटों के आरक्षण की बात अब पुरानी हो चुकी। अब तो नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की बात चल रही है। इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में रोचक बहस चल रही है। मुद्दा है- आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए या नहीं?

आर्थिक आधार पर आरक्षण के विरोध में तर्क दिया जा रहा है कि यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। तर्क यह है कि आरक्षण का प्रावधान सामाजिक रूप से पिछड़े हुए वर्ग के उत्थान के लिए किया गया था। आर्थिक मामला अलग है।

उदाहरण से समझिए। कल को आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्ति के बच्चे का कॉलेज में इस आधार पर एडमिशन हो जाता है और दूसरे दिन उस व्यक्ति यानी एडमिशन पाने वाले बच्चे के पिता की लॉटरी लग जाती है तो क्या वह एडमिशन कैंसिल हो जाएगा?

क्योंकि जिस आर्थिक आधार पर वह एडमिशन हुआ था वह तो ख़त्म हो चुका है! दरअसल, यह सुनवाई उन याचिकाओं पर चल रही है जो आर्थिक आरक्षण के खिलाफ लगाई गईं थीं।

याचियों का कहना यह भी है कि सरकार पिछड़ों की मदद करने की बजाय यह कह रही है कि जो गरीब सवर्ण हैं वे भी आर्थिक रूप से पिछड़े तो हैं ही। इसलिए वे पिछड़े हैं, लेकिन सच यह है कि वे जातीय या सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं हैं।

संविधान सामाजिक पिछड़ों को न्याय देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था करता है। इसलिए आर्थिक आरक्षण ग़लत है। वकीलों का कहना यह भी है कि यदि आर्थिक आरक्षण दिया गया तो यह शेर और बैल के लिए समान क़ानून लागू करने जैसा होगा जो कि किसी एक के उत्पीड़न की तरह होगा।

हिंदुस्तान में जब तक जातीय व्यवस्था चलती रहेगी, सामाजिक उत्थान के लिए आरक्षण ज़रूरी होगा। वर्ना शंबुका, एकलव्य और कर्ण जैसों के साथ अन्याय होता रहेगा। उन्हें शिक्षा से वंचित किया जाता रहेगा।

मान लीजिए सुप्रीम कोर्ट के माननीय वकीलों के ये सभी तर्क सही हैं, और आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना क़तई उचित नहीं है तो पिछड़े वर्ग को जो आरक्षण दिया गया है, उसमें आर्थिक आधार को क्यों इम्प्लीमेन्ट किया गया? वह कैसे संविधान की भावना के अनुरूप हो गया?

पिछड़े वर्ग यानी OBC के तहत आने वाले उन्हीं बच्चों को आरक्षण मिलता है जिनके पिता की आय सालाना सात लाख रु. से कम हो, यानी इसमें क्रीमी लेयर लागू है। सात लाख के ऊपर आय वाले OBC को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। तो यह भी एक तरह से आर्थिक आधार ही हुआ!

अगर यह चल सकता है तो सरकार जो आर्थिक आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण दे रही है, वह कैसे अनुचित है? तर्क यह हो जाता है।