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सड़कों ने संकरी कर दीं नदियां:उत्तराखंड में घाटियों-नदियों में डंप किया जा रहा मलबा, कम हो रही नदियों की चौड़ाई

देहरादून10 दिन पहलेलेखक: एम. रियाज हाशमी
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उत्तराखंड में पहाड़ों को काटकर मलबे को नदी किनारे डाला जा रहा है। - Dainik Bhaskar
उत्तराखंड में पहाड़ों को काटकर मलबे को नदी किनारे डाला जा रहा है।
  • 1 किमी सड़क चौड़ी करने से 60 हजार क्यूबिक मी. मलबा निकलता है

उत्तराखंड में हर तरफ पहाड़ काटकर सड़कें बन रही हैं। जेसीबी मशीनों और पहाड़ काटने के लिए डायनामाइट का शोर देवभूमि की शांति भंग कर रहा है। कंस्ट्रक्शन कंपनियां ढलानों और प्राकृतिक नदियों में मलबा डंप कर रही हैं। मलबों का यह ढेर नदियों के प्रवाह को रोक रहा है।

उत्तराखंड की स्टेट हार्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डाॅ. एसपी सती बताते हैं, ‘पहाड़ में 20 से 60 हजार क्यूबिक मीटर मलबा प्रति एक किमी सड़क के चौड़ीकरण में निकलता है। अब अंदाजा लगाएं कि 20 साल में बनीं 20 हजार किमी सड़कों से कितना मलबा निकला होगा?’ पहाड़ी ढलानों से खिसका कर नदियों और घाटियों में फेंक दिए जाने वाला यह मलबा बरसात में नदियों में बारूद का काम करता है।’

उत्तराखंड में सड़कों का जाल बिछ रहा है। इनमें सामरिक रूप से अहम चार धाम प्रोजेक्ट की ऑल वेदर रोड भी है, जो यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के बीच 900 किमी लंबी है। इसमें 10-15 मीटर चौड़ी टू लेन वन साइड प्रस्तावित सड़कों पर काम चल रहा है। 400 किमी सड़क बन चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित रवि चोपड़ा कमेटी ने पर्यावरण मंत्रालय को सौंपी रिपोर्ट में 10-15 मीटर चौड़ी सड़क निर्माण सेे इकोलॉजी में होने वाले नुकसान को लेकर चेताया था।

इस परियोजना का सबसे ज्यादा प्रभाव ऋषिकेश में दिखता है, जहां हजारों पेड़ काटे गए। चिल्ला में हाथियों के प्राकृतिक गलियारे से हाईवे निकाला गया हैै। पहाड़ों का मलबा यहीं से मिलना शुरू हो जाता है। इतना जरूर है कि इसे ऋषिकेश और हरिद्वार में बन रही सड़कों के भराव में इस्तेमाल किया जा रहा है। अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के लिए काटे जा रहे पहाड़ों का मलबा या तो ढलानों से सड़कों किनारे घाटियों में धकेला जा रहा है या नदियों के किनारों पर भरा जा रहा है।

नियमों से बचने के लिए 900 किमी लंबे ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट को 10 से ज्यादा छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया ईआईए (एन्वायरमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट) के सौ किमी से बड़ी सड़क के लिए कड़े नियम हैं। ऑल वेदर रोड प्रोजेक्ट में चालाकी से इन नियमों को बाइपास कर लिया गया।

900 किमी की सड़क को 100 किमी से छोटी 10 से ज्यादा परियोजनाओं में बांट दिया गया। कई जगहों पर क्लीयरेंस लेने के लिए इको-सेंसेटिव जोन के अस्तित्व को ही नकार दिया गया। वरिष्ठ पत्रकार चारू तिवारी बताते हैं, ‘सरकार की इसके पीछे यही मंशा थी कि नियम लागू न हों और यदि सुप्रीम कोर्ट रोक भी लगाए तो वह किसी एक हिस्से पर ही प्रभावी हो।’

सुप्रीम कोर्ट की हाई पावर कमेटी ने भी नियमों की अनदेखी की बात कही
चोपड़ा कमेटी ने टार वाली सड़क की चौड़ाई 5.5 मीटर रखने की मांग सुप्रीम कोर्ट में की। कोर्ट ने परिवहन मंत्रालय के 2018 के नोटिफिकेशन को बहाल रखा, जिसमें चौड़ाई 5.5 मी. रखने का प्रावधान है। केंद्र सरकार ने 7 मीटर की इजाजत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि आप अपने ही सर्कुलर का उल्लंघन कैसे कर सकते हैं। इसके बावजूद 10-15 मीटर की चौड़ाई पर काम जारी है।’

नेपाल के रास्ते चीनी घुसपैठ के चलते सड़क सामरिक रूप से जरूरी
दिसंबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट में केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने बताया था कि यह सड़क सामरिक महत्व के चलते जरूरी है। चीन ने घुसपैठ की कोशिशें के लिए नेपाल का इस्तेमाल किया। दोनों ही देशों की सीमाएं उत्तराखंड से लगती हैं। लिहाजा इस सड़क का निर्माण और उसकी चौड़ाई बढ़ाना जरूरी है। कोर्ट में 5.5 मीटर से ज्यादा चौड़ाई के मामले पर सुनवाई जारी है।

हिमालय नया पर्वत होने के साथ सेंसिटिव भी है
फिजिकल रिसर्च लैब अहमदाबाद से रिटायर्ड वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन जुयाल पहले ही चेता चुके हैं, ‘हिमालय सबसे नया पर्वत होने के साथ ही सेंसिटिव भी है। इस क्षेत्र में निर्माण को लेकर संवेदनशीलता चाहिए। तीखे ढलान से यहां नदियों का बहाव काफी तेज है, जो धारा बदलकर पहाड़ों के लिए भी नुकसानदायक हो जाता है और इसे रोका या बांधा नहीं जा सकता है।’

चारधाम सड़क योजना का आपदा से संबंध नहीं: केंद्र
केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि पिछले हफ्ते उत्तराखंड में आई आपदा का चारधाम रोड़ चौड़ीकरण योजना से कोई संबंध नहीं है। रक्षा मंत्रालय की तरफ से एटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने जवाब के लिए और समय मांगा है। हाई पावर कमेटी ने कहा है कि उत्तराखंड में आई हालिया आपदा और चारधाम रोड़ चौड़ीकरण योजना का सीधा संबंध है।

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