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निर्वाणी अखाड़े को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ दाखिल करने की इजाजत, अखाड़े ने पूजन का अधिकार मांगा

10 महीने पहले
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  • सुप्रीम कोर्ट की ओर से 3 दिन की समय सीमा बीतने के बाद निर्वाणी अखाड़े को मिली इजाजत
  • निर्वाणी अखाड़े के वकील ने कहा- उनके पक्षकार से अदालत के निर्देश समझने में भूल हुई
  • अखाड़े ने नोट में कहा- मंदिर में पूजा करने के अधिकार की हमारी मांग अविवादित
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निर्वाणी अखाड़े को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ पर लिखित नोट दाखिल करने की इजाजत दे दी। निर्वाणी अखाड़े ने अयोध्या में विवादित स्थान पर स्थापित मूर्ति की पूजा के प्रबंधन का अधिकार देने की मांग की है। 
 
निर्वाणी अखाड़े के वकील जयदीप गुप्ता ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच से कहा कि उनके पक्षकार से सुप्रीम कोर्ट की ओर से लिखित नोट दाखिल करने संबंधी 2 दिन की समय सीमा को समझने में गलती हुई है। अखाड़े के वकील ने सुनवाई के दौरान उठाए गए मुद्दों का हवाला देते हुए कोर्ट से लिखित नोट दाखिल की करने की इजाजत मांगी।
 

अदालत ने निर्वाणी अखाड़े से तुरंत नोट फाइल करने को कहा
जस्टिस एस ए बोबड़े और जस्टिस एस ए नजीर ने निर्वाणी अखाड़े को तुरंत नोट फाइल करने को कहा। इस मामले में निर्मोही अखाड़ा और निर्वाणी अखाड़ा, दोनों ने ही राम जन्मस्थान पर पूजा के प्रबंधन का अधिकार देने की मांग की है।
 

निर्मोही और निर्वाणी अखाड़े दोनों चाहते हैं पूजा का अधिकार
निर्मोही अखाड़े ने 1959 में एक मुकदमा दाखिल करके शेबैत यानि पूजा का अधिकारी बनाए जाने का अधिकार मांगा था। दूसरी तरफ निर्वाणी अखाड़ा 1961 में उत्तर प्रदेश सुन्री सेंट्रल वक्फ बोर्ड और 1989 में राम लला की तरफ से फाइल मामलों में प्रतिवादी बनकर ऐसी ही मांग कर चुका है। 
 
निर्वाणी अखाड़े की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल नोट में कहा गया- हम अदालत को बताना चाहते हैं कि हिंदुओं में किसी भी पक्ष ने पुजारी बनने के अधिकार की मांग नहीं की है। इस रूप में पुजारी बनने के अधिकार की हमारी मांग अविवादित है। एक पुजारी के तौर पर हम विवादित स्थान पर मंदिर बनाने की मांग करते हैं।
 

मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के मायने

  • सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 और सीपीसी (सिविल प्रोसिजर कोड) की धारा 151 के तहत इस अधिकार का इस्तेमाल करता है। खासतौर पर संपत्ति के मालिकाना हक यानी टाइटल सूट डिक्री के मामलों में \'मोल्डिंग ऑफ रिलीफ\' का प्रावधान है। इसमें तय किया जाता है कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट से जिस संपत्ति की मांग की है। अगर कोर्ट अपने फैसले में उसे नहीं देता है तो विकल्प के तौर पर उसे क्या दिया जा सकता है।
  • अयोध्या के मामले को देखें, तो एक से अधिक दावेदारों वाली जमीन का मालिकाना हक किसी एक पक्ष को मिलने पर अन्य पक्षों को इसके बदले क्या मिलेगा, मोल्डिंग ऑफ रिलीफ के जरिए इस बारे में लिखित नोट फाइल कराए गए हैं।

अयोध्या विवाद पर फैसला सुरक्षित
अयोध्या विवाद में 2 अगस्त से लगातार चली सुनवाई के बाद, 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। संविधान पीठ इस मामले पर 23 दिन के भीतर फैसला सुनाएगी। संविधान पीठ की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर होंगे। अदालत ने सभी पक्षों को मोल्डिंग ऑफ रिलीफ पर तीन दिन में लिखित जवाब पेश करने को कहा था। हिंदू और मुस्लिम पक्षों की तरफ से कोर्ट में लिखित नोट पहले ही दाखिल किए जा चुके हैं।
 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमीन को 3 हिस्सों में बांटने के लिए कहा था
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा रामलला विराजमान को मिले। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
 


 

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