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सिख दंगे / एसआईटी ने कहा- 1984 में सिख यात्रियों को ट्रेन से खींचकर मारा गया, पुलिस ने किसी दंगाई को गिरफ्तार नहीं किया

SIT said- In 1984, Sikh passengers were dragged off the train, police did not arrest any rioters
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SIT said- In 1984, Sikh passengers were dragged off the train, police did not arrest any rioters

  • एसआईटी ने कहा- दिल्ली के नांगलोई, किशनगंज, दयाबस्ती, शाहदरा और तुगलकाबाद रेलवे स्टेशनों पर हत्या की वारदातें हुईं
  • पुलिस को घटना की सूचना दी गई थी, लेकिन पुलिस ने कहा था कि वो दंगाइयों के मुकाबले तादाद में बेहद कम है- एसआईटी
  • ‘‘एक एफआईआर में दंगे और हत्याओं की 498 शिकायतें थीं, लेकिन जांच के लिए केवल एक अफसर नियुक्त किया गया’’

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2020, 11:00 PM IST

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल (एसआईटी) ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट में कहा कि 1984 में सिख विरोधी दंगों में सिख यात्रियों की ट्रेन से खींचकर हत्या की गई। जांच दल ने कहा कि जब यह हत्याएं की जा रही थीं, तब पुलिस ने किसी को भी मौके से गिरफ्तार नहीं किया। पुलिस ने तब कहा था कि हम संख्या में बहुत कम थे।

जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी का गठन किया था। इसका नेतृत्व दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ज जज जस्टिस एसएन ढिंगरा कर रहे हैं। इसमें रिटायर्ड आईपीएस राजदीप सिंह और मौजूदा आईपीएश अभिषेक दुलार को शामिल किया गया था। लेकिन, राजदीप सिंह निजी वजहों से इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था।

31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में दंगाइयों ने बड़े पैमाने पर सिख समुदाय को निशाना बनाया था। इस हिंसा में केवल दिल्ली में 2,733 लोगों की जान गई थी।

एसआईटी रिपोर्ट की अहम बातें


1. सिख यात्रियों की क्षत-विक्षत लाशें प्लेटफॉर्म पर पड़ी थीं
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा- दंगाइयों द्वारा ट्रेन से यात्रा कर रहे सिख यात्रियों को बाहर खींचकर रेलवे स्टेशन पर उनकी हत्या के 5 मामले हैं। यह घटनाएं 1 और 2 नवंबर 1984 को दिल्ली के नांगलोई, किशनगंज, दयाबस्ती, शाहदरा और तुगलकाबाद में हुईं। यात्रियों को मरते दम तक पीटा गया और जला दिया गया। इन सभी के क्षत-विक्षत शव प्लेटफॉर्म और रेल की पटरियों पर पड़े हुए थे।

2. पांचों मामलों की जानकारी पुलिस को दी गई
रिपोर्ट के मुताबिक, इन पांचों मामलों की जानकारी पुलिस को दी गई थी। पुलिस को बताया गया था कि दंगाइयों ने ट्रेन को रोका और सिख यात्रियों पर हमला किया। पुलिस ने किसी भी दंगाई को गिरफ्तार नहीं किया। इसके पीछे वजह यह बताई गई कि पुलिस दंगाइयों के मुकाबले तादाद में बहुत कम है। पुलिस के पहुंचते ही सारे दंगाई भाग गए थे।

3) 337 शिकायतें भेजी गईं, एफआईआर एक दर्ज हुई

रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘फाइलों की जांच के बाद यह खुलासा हुआ कि पुलिस ने एफआईआर घटनाओं और अपराधों के हिसाब से नहीं दर्ज की थी। एक ही एफआईआर में कई शिकायतें दर्ज की गई थीं। तत्कालीनी डीसीपी ने दंगों के बाद सुल्तानपुरी पुलिस स्टेशन को 337 शिकायतें भेजी थीं। लेकिन, इन सभी मामलों में एक एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद हत्याओं और दंगों की अन्य शिकायतें भी इसी एफआईआर में दर्ज की गईं। ऐसी एफआईर में करीब 498 घटनाओं की शिकायतें थीं, लेकिन इस मामले की जांच के लिए एक अफसर नियुक्त किया गया। एफआईआर पुलिस अफसरों द्वारा एसएचओ को दी गई जानकारियों के आधार पर दर्ज की गईं। इनमें पीड़ितों ने किसी शख्स को दंगाई के रूप में पहचाना था और पीड़ितों के नाम और पते भी दिए थे।’’

4) समिति के बाद समिति बनी, केस रजिस्टर होने में सालों लग गए
एसआईटी ने कहा- ये सभी मामले बंद कर दिए गए, क्योंकि पीड़ित दी गई जानकारी की पुष्टि नहीं कर रहे थे। यह स्पष्ट था कि पुलिस ने कुछ तयशुदा लोगों को क्लीनचिट देने के लिए ही यह मामले दर्ज किए थे। जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग को हत्या, लूट और आगजनी के सैकड़ों हलफनामे दिए गए थे, इनमें आरोपियों के नाम भी दिए गए थे। इन हलफनामों के आधार पर तुरंत एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश देने की बजाय समितियों के बाद समितियों को गठन किया गया। इसकी वजह से सालों तक केस रजिस्टर होने में देरी होती रही।

5. 56 हत्याओं का चालान पेश हुआ, 5 हत्याओं में दोष तय किए गए
कल्याणपुरी पुलिस स्टेशन पर दर्ज की गई एफआईआर के बारे में एसआईटी रिपोर्ट में कहा गया कि पुलिस ने 56 लोगों की हत्या के मामले में एक चलान पेश किया, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने केवल 5 लोगों की हत्या के मामले में दोष तय किए। यह नहीं पता चला कि केवल 5 हत्याओं में दोष क्यों तय किए गए, 56 में क्यों नहीं। ट्रायल कोर्ट ने हर वारदात के लिए अलग से ट्रायल के आदेश क्यों नहीं दिए, यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया।

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