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समाज सुधारकों, पत्रकारों, वकीलों ने जागृत किया; स्वराज के लिए सर्वस्व कुर्बान

एक वर्ष पहले
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  • ऐसे तैयार हुई आजादी की लड़ाई की आर्थिक, सामाजिक और कानूनी जमीन

आजादी की लड़ाई का आंदोलन का रूप ले लेना एक सतत प्रकिया का हिस्सा था। बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों, पत्रकारों और वकीलों ने इसकी जमीन तैयार की। लेकिन स्वतंत्रता की तड़प और इसके लिए कुछ भी कुर्बान कर देने के जज्बे से आगे हर बाधा पार हो गई। पढ़िए यह कैसे हुआ... 19वीं शताब्दी के आरंभ से मध्य तक राजा राममोहन राय, अक्षय कुमार दत्त, ईश्वर चंद्र विद्या सागर, बंकिमचंद्र चटर्जी और यहां तक कि विवेकानंद, सबने मिलकर देश की सांस्कृतिक संस्थाओं की कमियों को सुधारने तथा इन्हें मजबूत करने पर जोर दिया। कोशिश यह थी कि मॉडर्न साइंस, टेक्नोलॉजी एवं पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था के जरिए भारत भी अग्रणी राष्ट्र बने। दूसरी तरफ, अंग्रेजी हुकूमत की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना कर लोगों को जागृत करने की काेशिशें भी हुई।   1870 से 1905 के बीच तीन बुद्धिजीवी ऐसे थे, जिन्होंने ब्रिटिश आर्थिक व्यवस्था की गहराई से आलोचना की। इनमें प्रमुख थे  दादाभाई नौरोजी। वे सफल व्यापारी थे, साथ ही उन्होंने अपनी संपत्ति का उपयोग स्वतंत्रता संग्राम को खड़ा करने में किया। दूसरे बुद्धिजीवी थे- जस्टिस महादेव गोविंद रानाडे, जिन्होंने भारतीय उद्यमियों को यह समझाने में जीवन बिता दिया कि आधुनिक औद्योगिक विकास अनिवार्य और आवश्यक है।   तीसरे बुद्धिजीवी रिटायर्ड सिविल सर्वेंट रोमेश चंद्र दत्त थे, जिन्होंने ‘भारत का आर्थिक इतिहास’ नाम से किताब लिखी, जिसमें 1757 से शुरू होकर तब तक की अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों का भारत की सामाजिक जीवनशैली पर कितना प्रतिकूल असर पड़ा, इसका गहराई से विवरण प्रस्तुत किया। इनके परिश्रम का नतीजा था कि पत्रकार, राजनैतिज्ञों और कई वकीलों ने आर्थिक व्यवस्था के प्रभाव को समझने और समझाने में जीवन लगा दिया। यह लोग थे-जीवी जोशी, जी सुब्रमण्यम अय्यर, गोपाल कृष्ण गोखले इत्यादि।  

बुद्धिजीवियों ने समझाया: अपने व्यापार में खुद की पूंजी का निवेश जरूरी, तभी मिलेगी आजादी
बुद्धिजीवियों ने भारत में व्याप्त गरीबी को गहराई से समझने की चेष्टा की। इसके पीछे लक्ष्य यह था कि भारत वर्ष में किसी भी जाति, धर्म, भाषा इत्यादि के माध्यम से गरीबों को बांटा नहीं जा सकता था। इन नेताओं ने देश से आह्वान किया कि जब तक भारत अपनी आवश्यकता के अनुसार अपने उद्योग और व्यापार में अपनी पूंजी का निवेश नहीं करेगा, तब तक वो बर्तानिया हुकूमत के चंगुल से बाहर नहीं निकल पाएगा। सही मायने में यह भविष्य के लिए अभी से की गई तैयारी थी लेकिन उस वक्त ज्यादातर ने इसे नजरअंदाज ही किया। हालांकि भारतीय पूंजीपतियों ने अपने निवेश से उद्योग लगाने शुरू कर दिए थे।
 

समाचार पत्रों ने जगाया : आम लोगों को एकजुट और प्रशिक्षित किया
सन 1870 से 1918 का जो समय था, उस वक्त की आवश्यकता थी जनता का एकजुट होना। नौरोजी, रानडे और दत्त के आर्थिक विश्लेषणों को पत्रकारिता में रुचि रखने वाले बुद्धिजीवियों ने उठा लिया और आम लोगों को एकजुट करने, ट्रेंड करने में इस्तेमाल किया। यही दौर था जब कई अखबारों की स्थापना हुई। जैसे-जी सुब्रमण्यम अय्यर ने हिंदू और स्वदेश मित्रन, बाल गंगाधर तिलक ने केसरी एवं महरत्ता और  सुरेंद्र नाथ बैनर्जिया ने बंगाली की शुरुआत की। शिशिर कुमार घोष और  मोतीलाल घोष ने अमृत बाजार पत्रिका शुरू की तो गोपाल कृष्ण गोखले ने सुधारक की नींव रखी।
 
एनएन सेन ने इंडियन मिरर शुरू किया, जीपी वर्मा ने हिंदुस्तानी और एडवोकेट,  दो अखबार निकाले। वहीं दादाभाई नौरोजी वॉइस ऑफ इंडिया पहले से ही चला रहे थे। यही समय था जब पंजाब में ट्रिब्यून और अखबारे-आम बंटना शुरू हुआ था। इसका असर ही था कि जब सन 1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई तो उसके प्रारंभिक सदस्यों में एक तिहाई पत्रकार थे। इन अखबारों ने 1824 में राजा राममोहन राय की कही बात को माना। सुप्रीम कोर्ट में राय ने कहा था- शासक की पहचान करनी हो तो ये देखा जाए कि जनता उसकी गतिविधियों को प्रेस के माध्यम से पढ़, जान और समझ पा रही है।
 

वकीलों ने झुकाया : नए कानून और संशोधनों के लिए मुकदमे लड़े
सन 1857 में हुई आजादी की पहली लड़ाई के बाद गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के माध्यम से ब्रिटेन के पार्लियामेंट ने भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से हटाकर अपने अधीन कर लिया था। राजनैतिक कार्यकर्ताओं एवं वकीलों को समझ आ गया था कि ब्रिटेन के खिलाफ आजादी की लड़ाई कानूनी एवं संवैधानिक होगी। इसीलिए आजादी के प्रमुख नेताओं को देखें, तो करीब-करीब वे सब उच्च दर्जे के वकील थे। जैसे-सुरेंद्रनाथ बैनर्जी, फिरोजशाह मेहता, मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ बीआर अंबेडकर, डॉ राजेंद्र प्रसाद इत्यादि।
 
बर्तानिया सरकार ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1909 और फिर गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1919 बनाया। तिलक और बाकी नेताओं ने 1909 में पारित हुए कानून का विरोध किया। 1919 के कानून के बाद नेताओं का आक्रोश और बढ़ा, जिसके बाद 1925 में कौंसिल बैठक में मोतीलाल नेहरू ने एक नया संविधान बनाने की पेशकश की। जवाब में बर्तानिया सरकार को 1927 में साइमन कमीशन का गठन करना पड़ा, जिसकी रिपोर्ट पर इंग्लैंड में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस हुई। इसी का नतीजा गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 था, जो आगे इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1947 के रूप में फलीभूत हुआ।
 

लेकिन... दूसरी तरफ सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार के दीमक ने भी पैर पसारे
सन 1892 के बाद कांग्रेस की बढ़ती साख तथा बंगाल में उग्र होते आंदोलनों की धार को कम करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने 1905 में बंगाल का बंटवारा कर दिया और यह बंटवारा हिंदू-मुसलमान के आधार पर किया गया था। इससे पहले 1885 और उसके बाद सर सैय्यद अहमद खान ने कांग्रेस को हिंदू पार्टी की संज्ञा दी थी तथा हिंदुओं से आह्वान किया था कि अगर वह मुसलमान का विरोध नहीं करना चाहते हैं तो उन्हें कांग्रेस ज्वाइन नहीं करना चाहिए। हिंदू-मुसलमान के बीच में खाई यहीं से बननी शुरू हुई।
 
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद पाकिस्तान की मांग के तौर पर सामने आई। मोहम्मद अली जिन्ना, जो इंग्लैंड में पढ़े-लिखे तथा अंग्रेजी खानपान के शौकीन थे, भी धर्मनिरपेक्ष न रह पाए और वे मुस्लिम लीग के सर्वेसर्वा बन गए। बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच मुसलमान पनप नहीं पाएंगे, इस डर का नतीजा ही था- टू नेशन थ्योरी। इसी प्रकार 1937 में राज्यों के चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की। पर 1939 आते-आते कांग्रेस के मंत्रियों तथा कांग्रेस के तंत्र में द्वंद्व दिखने लगा था।
 
अवसरवादी, स्वार्थी तथा राजनैतिक ताकत को करिअर बनाने की इच्छा रखने वाले लोग कांग्रेस संगठन के अलग-अलग अंगों से जुड़ने लगे। 1939 में गांधीजी ने यहां तक कहा कि अगर उनका बस चले तो वह कांग्रेस के भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करने की बजाय पूरी पार्टी को ही दफना देना चाहेंगे। दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत होते ही पूरी कांग्रेस ने अक्टूबर 1939 में त्यागपत्र दे दिया। गांधीजी प्रसन्न थे कि अब कांग्रेस को मौका मिलेगा अपने अंदर के भ्रष्टाचार से मुक्ति पाने का।

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