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अनोखे संघर्ष / कहीं गुलाम, तो कहीं गिरमिटिया परदेस में भी देश के लिए लड़े हम



मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था। मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था।
फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया। फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया।
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मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था।मॉरीशस में भारतीयों को पहुंचाने का दौर1728 में ही शुरू हो गया था।
फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया।फिजी में मजदूरों को गन्ने की खेती और निर्माण कार्यों के लिए ले जाया गया।

  • मजदूर बनाकर जिन देशों में ले गए अंग्रेज..वहां भी भारतीयों ने लड़ी आजादी की लड़ाई

Dainik Bhaskar

Aug 24, 2019, 04:35 PM IST

आजादी की लड़ाई भारतीयों ने सिर्फ भारत में नहीं उन देशों में भी लड़ी जहां-जहां उन्हें मजदूर बनाकर ले जाया गया था। इन्हें ऐसे कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर गुलाम बनाया गया था, जिन्हें यह लोग न पढ़ सकते थे और न ही समझ सकते थे। बाद में कहीं इन्हें कुली कहा गया तो कहीं गिरमिटिया। गिरमिटिया असल में अंग्रेजी शब्द अग्रीमेंट का अपभ्रंश है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, कैरिबियन द्वीपों, पूर्वी और दक्षिण अफ्रीका के देशों में इन्होंने अत्याचार सहे और फिर आजादी और अधिकारों की आवाज बुलंद की। पढ़िए इन देशों में इनके पहुंचने और संघर्ष की कहानी- 

 

मॉरिशस: दांडी मार्च की तारीख को चुना अपनी आजादी का दिन

मॉरीशस में भारतीयों का प्रभाव इतनी अधिक रहा कि महात्मा गांधी के दांडी मार्च की तारीख 12 मार्च 1968 को  इस देश ने अपनी आजादी की तारीख के रूप में चुना। मॉरिशस पहले फ्रेंच कॉलिनी थी और उस समय से ही यहां भारतीय मजदूर लाए जाने लगे थे। सबसे पहले 1728 में इस द्वीप के गवर्नर पांडिचेरी से करीब 180 गुलाम और 95 मजदूर लेकर यहां आए। फिर जब ब्रिटेन ने इस द्वीप पर कब्जे की कोशिश की तो अंग्रेजों से लड़ने के लिए भी भारतीय मजदूरों का इस्तेमाल किया गया।

 

1815 में ब्रिटेन ने इस पर कब्जा कर लिया। ब्रिटिश सरकार ने भी भारतीयों को यहां लाना जारी रखा।  1855 तक करीब डेढ़ लाख भारतीय मॉरिशस पहुंचा दिए गए थे। लेकिन मजदूर संगठित होने लगे, और पंचायत बना ली, जिसे ‘बैठका’ कहा जाने लगा। 1910 में जब गिरमिटिया युग का अंत हुआ तब तक मॉरिशस में साढ़े चार लाख से ज्यादा भारतीय आ चुके थे।

 

भारत की आजादी के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव में ब्रिटिश शासन ने 1948 के संवैधानिक सुधार के प्रावधानों के तहत मॉरिशस में नागरिकों को मताधिकार दिया, लेकिन यह उन्हीं लोगों तक ही सीमित था जो अंग्रेजी, हिंदी , फ्रेंच, तमिल, तेलुगु, उर्दू या चीनी भाषा में साधारण वाक्य लिख-बोल सकते थे। इन प्रावधानों के लागू होने के बाद पढ़े-लिखे भारतीयों ने मजदूरों को साक्षर बनाना शुरू किया। यह मुहिम रंग लाई और चुनावों के बाद बनी सरकार में बिहारी प्रतिनिधियों की संख्या लगातार बढ़ने लगी। अंग्रेजों ने 1967 के चुनाव में जीतने वाली पार्टी की को मॉरीशस को स्वतंत्र करने या ब्रिटेन के साथ रहने का विकल्प दिया। 

 

फिजी: भारतीय लोगों ने खोले  हिन्दी, तमिल और उर्दू स्कूल
यह 300 द्वीपों और 500 से अधिक छोटे भूखंडों का समूह है। 110 द्वीपों में यहां लोग रहते हैं। अंग्रेज यहां चंदन की लकड़ी की खोज में पहुंचे और पहुंचते ही उनकी स्थानीय आदिवासियों से भिड़त हुई। आगे चलकर अंग्रेजों ने यहां भी गन्ने की खेती की कोशिश की। लेकिन वहां के आदिवासी काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। इसके बाद सबसे पहले 1879 में यहां कलकत्ता से 463 मजदूर लाए गए। इसके बाद यह सिलसिला 40 वर्षों तक चलता रहा।

 

लगभग 60 हजार मजदूर यहां लाए गए। गोपालकृष्ण गोखेले को 1910 से ही फिजी में भारतीय गुलामों पर हो रहे अत्याचारों की खबरें मिल रही थीं। इसी बीच गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में गिरमिटियों के लिए सत्याग्रह किया था। इसकी खबर फिजी पहुंच चुकी थी। गांधीजी ने ही यहां 1912 में इनके लिए मणिलाल मगन लाल नाम के एक बैरिस्टर को यहां भेजा। उनकी वजह से यहां गिरमिटियाें को लेजिस्लेटिव काउंसिल में जगह मिली।

 

1915 में गांधीजी ने अपने  मित्र चार्ल्स एंड्रूज को फिजी भेजा। वे लंबे समय तक यहां संघर्ष करते रहे और 1920 में भारतीय गुलाम आजाद हो गए। इसके बाद फिजी के स्थानीय लोगों और भारतीय मजदूर अंग्रेजों के खिलाफ आंदाेलन चलाने लगे। अंग्रेजों ने वहां दोनों को आपस में लड़ाने की चाल चली और अपनी फौज में इंडियन प्लाटून बना दी। इस तरह उन्होंने भारतीयों को साथ मिलाने की कोशिश की। खास बात यह रही कि भारतीयों ने वहां अपने स्कूल बनाए। 1938 तक हिन्दी, तमिल और उर्दू स्कूलों में करीब आठ हजार बच्चे पढ़ने लगे। 10 अक्टूबर 1970 को फिजी आजाद हुआ। 


द. अफ्रीका: मजदूर बनकर गए, व्यापारी बनकर छा गए
भारतीय बंधुआ मजदूरों को दक्षिण अफ्रीका लाने का सिलसिना 1860 से शुरू हो गया था। पहला जहाज मद्रास से 342 लोगों को लेकर चला था। 1861 से 1867 तक छह हजार से ज्यादा लोग यहां लाए गए। दस साल बाद ही इन्हें यहां वापस लौटने की आजादी थी, लेकिन भारतीय मजदूर इसके बाद भी वहीं रुक गए और फल-सब्जी विक्रेता बन गए। फिर इन्होंने मसालों की दुकानें लगाई और दूसरे धंधे भी चालू कर दिए। प्रभाव इतना बढ़ा कि अंग्रेजों का इन भारतीय व्यापारियों से मुकाबला करना मुश्किल हो गया। 1894 में नटाल में भारतीयों की संख्या 46 हजार हो गई तो अंग्रेज तब वहां 45 हजार थे।

 

इसी बीच विवाद शुरू हुए और मोहनदास करमचंद गांधी एक मुकदमा लड़ने अफ्रीका पहुंचे। यहां ‘गांधीजी ने सत्याग्रह की अवधारणा सीखी। 1893 से लेकर 1914 तक महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में  रहे और नागरिक अधिकारों के लिए सत्याग्रह करते रहे। 1915 में वे भारत लौटे। इसके पहले 6 नवंबर, 1913 को महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के कुछ अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ मार्च किया था, जिसे ग्रेट मार्च के नाम से जाना जाता है। मार्च सफल रहा और दमनकारी सरकार गांधीजी के प्रस्तावों को मानने को तैयार हुई। गांधीजी के ही विचाराें और तरीकों पर चलकर दक्षिण अफ्रीका 27 अप्रैल 1994 को द रंगभेद नीति से आज़ाद हुआ वहां प्रथम लोकतांत्रिक चुनाव हुए। 

 

गुयाना: वेतन और काम के घंटे बढा़ने के लिए गोलियां खाई
गुयाना दक्षिण अमेरिका के उत्तरी छोर पर एक खूबसूरत देश है। सबसे पहले 1838 में यहां भारतीय मजदूर पहुंचाए गए थे। इसके बाद लगातार भारत से मजदूर लाने का दौर यहां जारी रहा। 1893 में यहां 1 लाख 10 हजार से ज्यादा भारतीय हो गए थे। हालांकि गिरमिटियों ने यहां 1860 के बाद ही नियम तोड़ने शुरू कर दिए थे। 1869 में बड़ा विरोध वे कर चुके थे और फिर 1872 में वेतन और काम के घंटाें को लेकर अपनी शर्तें भी वे मनवा चुके थे। 1903 में इन्होंने बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया, जवाब में पुलिस ने गोली चलाई और जिसमें छह लोग मारे गए। 1913 में फिर एक बड़ा विद्रोह हुआ जिसमें 15 लोग मारे गए। 


स्रोत: प्रवीण कुमार झा की किताब कुली लाइन्स।

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