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तस्वीरों में 104 साल पहले आई महामारी:1918 में स्पेनिश फ्लू से 5 करोड़ लोग मारे गए थे, दुनिया का हर तीसरा इंसान संक्रमित था

3 महीने पहले
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दुनिया आज कोरोना वायरस से लड़ रही है। भारत जैसा विशाल देश भी लड़खड़ाते हुए इससे जूझ रहा है। मगर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। करीब 104 साल पहले भी स्पेनिश फ्लू नाम की महामारी ने दुनिया में इतने लोगों की जान ले ली कि आज तक उनकी सही गिनती नहीं हो सकी है।

तब दुनिया की आबादी करीब 180 करोड़ थी। दो साल के भीतर इनमें से करीब 60 करोड़ लोग वायरस की चपेट में आ गए। यानी दुनिया का हर तीसरा शख्स स्पेनिश फ्लू से बीमार हुआ था। अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक 1.74 करोड़ से 5 करोड़ लोगों को जान गंवानी पड़ी। दुनिया में आज की आबादी से तुलना करें यह करीब 20 करोड़ लोगों की मौत के बराबर है।

भारत में स्पेनिश फ्लू को बॉम्बे फ्लू या बॉम्बे फीवर के नाम से जाना गया। इससे 1 करोड़ से लेकर 2 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। यह किसी एक देश में स्पेनिश फ्लू से मरने वालों की सबसे ज्यादा संख्या थी।

तो आइए स्पेनिश फ्लू को तस्वीरों और ग्राफिक्स से समझते हैं। सबसे पहले फ्लू के इस H1N1 स्ट्रेन से बचने के लिए उस दौर के अनोखे तरीके...

1919 की इस तस्वीर में एक महिला अजीब सी दिखने वाली मशीन का नोजल मास्क पहने नजर आ रही है। यह मशीन कैसे काम करती थी इस बारे में कोई साफ जानकारी नहीं है।
1919 की इस तस्वीर में एक महिला अजीब सी दिखने वाली मशीन का नोजल मास्क पहने नजर आ रही है। यह मशीन कैसे काम करती थी इस बारे में कोई साफ जानकारी नहीं है।
फ्रांस में यूनिवर्सिटी ऑफ लियॉन के प्रोफेसर बॉरडियर ने दावा किया था कि उनकी यह मशीन मिनटों में ही फ्लू का इलाज कर सकती है। तस्वीर में मशीन का प्रदर्शन करते प्रोफेसर।
फ्रांस में यूनिवर्सिटी ऑफ लियॉन के प्रोफेसर बॉरडियर ने दावा किया था कि उनकी यह मशीन मिनटों में ही फ्लू का इलाज कर सकती है। तस्वीर में मशीन का प्रदर्शन करते प्रोफेसर।
लंदन में फ्लू से बचने के लिए केवल मुंह को ढकने वाले मास्क पहने लोग। इसी तरीके का सुधरा हुआ रूप हैं मौजूदा मास्क जिनसे नाक भी ढंकी जाती है।
लंदन में फ्लू से बचने के लिए केवल मुंह को ढकने वाले मास्क पहने लोग। इसी तरीके का सुधरा हुआ रूप हैं मौजूदा मास्क जिनसे नाक भी ढंकी जाती है।
लोगों ने अपने छोटे बच्चों को फ्लू से बचाने के लिए उनके कपड़ों पर डिजाइनर नोटिस लगाना शुरू कर दिया था। इन पर बच्चों को न छूने और न चूमने की चेतावनी लिखी होती थी।
लोगों ने अपने छोटे बच्चों को फ्लू से बचाने के लिए उनके कपड़ों पर डिजाइनर नोटिस लगाना शुरू कर दिया था। इन पर बच्चों को न छूने और न चूमने की चेतावनी लिखी होती थी।
लंदन की सड़कों पर मास्क पहनकर हैंड पंप से एंटी फ्लू स्प्रे करता एक कर्मचारी। तब के हेल्थ अफसरों का मानना था कि फ्लू हवा से भी फैलता है।
लंदन की सड़कों पर मास्क पहनकर हैंड पंप से एंटी फ्लू स्प्रे करता एक कर्मचारी। तब के हेल्थ अफसरों का मानना था कि फ्लू हवा से भी फैलता है।
तस्वीर में न्यू जर्सी के कैंप डिक्स के वार गार्डन में पहले विश्व युद्ध में शामिल हुए सैनिक नमक के पानी गरारे करते नजर आ रहे हैं। तब माना जाता था इससे फ्लू खत्म हो जाएगा।
तस्वीर में न्यू जर्सी के कैंप डिक्स के वार गार्डन में पहले विश्व युद्ध में शामिल हुए सैनिक नमक के पानी गरारे करते नजर आ रहे हैं। तब माना जाता था इससे फ्लू खत्म हो जाएगा।
फ्लू से बचने के लिए गले में कपूर की छोटी गठरी लटकाए हुए अमेरिकी बच्चे। इसे वहां 'ओल्ड वाइफ्स मेथठ' कहा जाता था।
फ्लू से बचने के लिए गले में कपूर की छोटी गठरी लटकाए हुए अमेरिकी बच्चे। इसे वहां 'ओल्ड वाइफ्स मेथठ' कहा जाता था।

जानलेवा दूसरी लहर, तीन महीनों में 80% संक्रमण और मौत
यूं तो स्पेनिश फ्लू का प्रकोप करीब दो साल तक चलता रहा, लेकिन 1918 के आखिरी तीन महीने सबसे ज्यादा जानलेवा थे। माना जाता है कि पहले विश्वयुद्ध के दौरान सैनिकों की आवाजाही की वजह से फ्लू के वायरस में हुए म्यूटेशन के चलते ऐसा हुआ। स्पेनिश फ्लू से संक्रमित होने और जान गंवाने के 80% मामले इन्हीं तीन महीनों के दौरान हुए।

  1. 104 साल पहले फैले स्पेनिश फ्लू यानी H1N1 इंफ्लूएंजा वायरस से फैली महामारी की पुष्टि के लिए तब RT-PCR या रैपिड एंटीजेन टेस्ट जैसी कोई जांच उपलब्ध नहीं थी।
  2. तब न ही रेमडेसिविर जैसी कोई एंटी वायरल दवा थी।
  3. क्रिटिकल केयर के लिए मैकनिकल वैंटिलेटर भी नहीं थे।
  4. वायरल इंफेक्शन के बाद होने वाले सेकंडरी बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज के लिए तब कोई एंटीबायोटिक दवा भी नहीं थी। पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलीन की खोज 10 साल बाद हुई थी।
  5. स्पेनिश फ्लू से बचने के लिए तब कोई वैक्सीन भी नहीं थी। अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के रिसर्चर थॉमस फ्रांसिस और जोनल साल्क ने सेना की मदद से 1940 में फ्लू की पहली वैक्सीन बनाई थी।
  6. तब डॉक्टरों को यह भी नहीं था कि यह बीमारी वायरस से फैलती है बैक्टेरिया से नहीं। विल्सन स्मिथ, क्रिस्टोफर एंट्रीयूज और पैट्रिक लेडलॉ ने 1933 में पहली बार इन्फ्यूएंजा वायरस को आइसोलेट किया।
  7. एंटीवायरल और एंटीबायोटिक दवाएं न होने के कारण तब एस्पिरिन, कुनाइन, अमोनिया, टरपेंटाइन, नमकीन पानी, बाम आदि से किया जाता था।

युद्ध में घिरी थी दुनिया, सिर्फ स्पेन से ही खबरें आती थीं इसलिए नाम पड़ा स्पेनिश फ्लू
20वीं सदी की सबसे बड़ी महामारी का नाम भले ही स्पेनिश फ्लू था, मगर स्पेन से शुरू नहीं थी।
दरअसल, तब पूरा यूरोप पहले विश्वयुद्ध में उलझा था। स्पेन अकेला ऐसा प्रमुख यूरोपीय देश था जो इस दौरान तटस्थ था।
युद्ध कर रहे दोनों खेमे, अलाइड और सेंट्रल पावर के देशों में फ्लू की खबरों को सेंसर कर दिया गया ताकि सैनिकों का जोश बना रहे।
वहीं, स्पेन का मीडिया स्वतंत्र था। मई 1918 में महामारी की खबर मेड्रिड में सुर्खी बनी।
ब्लैक आउट से गुजर रहे देशों में स्पेन के अखबारों में छप रही खबरों से ही महामारी का पता चल रहा था, इसलिए ही इसे स्पेनिश फ्लू कहा जाने लगा। उधर. स्पेन के लोगों का मानना था कि वायरस फ्रांस से फैला है, इसलिए वे इसे फ्रेंच फ्लू कहते थे।

कहां से शुरू हुआ पता नहीं, पहला मामला अमेरिका में मिला
स्पेनिश फ्लू कहां से शुरू हुआ? अब तक इसका कोई मजबूत जवाब नहीं मिला है। अलग-अलग दावों के मुताबिक फ्रांस, चीन और ब्रिटेन के अलावा अमेरिका को भी इसका जन्मस्थान माना जाता है। हां, यह ऐतिहासिक तथ्य कि स्पेनिश फ्लू का पहला मामला अमेरिका के कैनसास प्रांत के फोर्ट राइली की सैन्य छावनी में 04 मार्च, 1918 को मिला था।

अमेरिका में कैनसास राज्य के फोर्ट रिले सैन्य छावनी के विशेष फ्लू वार्ड में भर्ती स्पैनिश फ्लू से बीमार सैनिक। यह सभी सैनिक पहले विश्वयुद्ध में भाग लेकर लौटे थे।
अमेरिका में कैनसास राज्य के फोर्ट रिले सैन्य छावनी के विशेष फ्लू वार्ड में भर्ती स्पैनिश फ्लू से बीमार सैनिक। यह सभी सैनिक पहले विश्वयुद्ध में भाग लेकर लौटे थे।
अमेरिका के मैरीलैंड में वाल्टर रीड सैन्य अस्पताल के फ्लू वार्ड में मरीज की जांच करती कपड़े का मास्क पहने एक नर्स।
अमेरिका के मैरीलैंड में वाल्टर रीड सैन्य अस्पताल के फ्लू वार्ड में मरीज की जांच करती कपड़े का मास्क पहने एक नर्स।
अमेरिका के एक शहर में मास्क पहनकर अपना काम करती एक टेलीफोन ऑपरेटर। उस समय तक ज्यादा सरकारी कर्मचारियों को मास्क पहनना जरूरी कर दिया गया था।
अमेरिका के एक शहर में मास्क पहनकर अपना काम करती एक टेलीफोन ऑपरेटर। उस समय तक ज्यादा सरकारी कर्मचारियों को मास्क पहनना जरूरी कर दिया गया था।
स्पेनिश फ्लू का समाज की हर गतिविधि पर असर पड़ा। अमेरिका के इलिनोइस में मास्क पहनकर ग्राहक की शेव करता एक हेयरड्रेसर।
स्पेनिश फ्लू का समाज की हर गतिविधि पर असर पड़ा। अमेरिका के इलिनोइस में मास्क पहनकर ग्राहक की शेव करता एक हेयरड्रेसर।
स्पेनिश फ्लू के चलते अमेरिकी शहरों में बिना मास्क स्ट्रीट कार में बैठने पर पाबंदी लगा दी गई थी। रेड क्रास सोसाइटी के सिएटल चैप्टर ने तीन दिन में 2.5 लाख मास्क बनाए थे।
स्पेनिश फ्लू के चलते अमेरिकी शहरों में बिना मास्क स्ट्रीट कार में बैठने पर पाबंदी लगा दी गई थी। रेड क्रास सोसाइटी के सिएटल चैप्टर ने तीन दिन में 2.5 लाख मास्क बनाए थे।
फ्रांस जाने के लिए सिएटल शहर से मार्च करती अमेरिकी सेना की 39वीं रेजिमेंट। रेजिमेंट के सभी जवानों को रेडक्रास सोसाइटी के बनाए मास्क उपलब्ध कराए गए थे।
फ्रांस जाने के लिए सिएटल शहर से मार्च करती अमेरिकी सेना की 39वीं रेजिमेंट। रेजिमेंट के सभी जवानों को रेडक्रास सोसाइटी के बनाए मास्क उपलब्ध कराए गए थे।
स्पेनिश फ्लू से खेलों की दुनिया भी अछूती नहीं रही। अमेरिका में मास्क पहनकर बेसबाल खेलते खिलाड़ी। बेसबाल के दीवाने अमेरिकियों ने अपना खेल नहीं छोड़ा।
स्पेनिश फ्लू से खेलों की दुनिया भी अछूती नहीं रही। अमेरिका में मास्क पहनकर बेसबाल खेलते खिलाड़ी। बेसबाल के दीवाने अमेरिकियों ने अपना खेल नहीं छोड़ा।

स्पेनिश फ्लू को लेकर लापरवाही और सावधानी के दो किस्से

फिलाडेल्फिया की लिबर्टी लोन परेड में दो लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया और इसके बाद शहर पर स्पेनिश फ्लू का कहर टूट पड़ा।
फिलाडेल्फिया की लिबर्टी लोन परेड में दो लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया और इसके बाद शहर पर स्पेनिश फ्लू का कहर टूट पड़ा।

1. स्पेनिश फ्लू के बीच ही फिलाडेल्फिया में लिबर्टी लोन परेड हुई। इस परेड ने पूरे शहर में ऐसे फ्लू का प्राकोप फैलाया कि संभलना मुश्किल हो गया। फिलाडेल्फिया के पब्लिक हेल्थ डायरेक्टर बिल्मर क्रूसन ने लोगों को भरोसा दिया कि सैनिकों को सामान्य मौसमी फ्लू है और इसे आम लोगों तक पहुंचने से पहले ही कंट्रोल कर लिया जाएगा। 28 सितंबर 1918 को देशभक्ति से ओतप्रोत सैनिकों, बॉय स्काउट्स, बैंड और स्थानीय कलाकारों की 2 मील लंबी परेड निकली। पूरा रास्ता देखने वाले लोगों से भरा था।

इस परेड के 72 घंटे बाद ही फिलाडेल्फिया के सभी 31 अस्पताल मरीजों से भर गए और एक सप्ताह के भीतर 26,00 लोगों की मौत हो गई। ग्लोबल फ्लू एंड यूः ए हिस्ट्री ऑफ इंफ्लूएंजा नाम की किताब लिखने वाले जार्ड डेनर का कहना था-फिलाडेल्फिया लोन परेड ने आग में पेट्रोल डाल दिया।

अमेरिका के शहर सेंट लूइस शहर में महामारी के दस्तक देने से पहले ही हेल्थ वर्कर्स ने तैयारी कर ली थी। मरीजों को लाने के लिए तैनात शहर की रेड क्रास मोटर कोर।
अमेरिका के शहर सेंट लूइस शहर में महामारी के दस्तक देने से पहले ही हेल्थ वर्कर्स ने तैयारी कर ली थी। मरीजों को लाने के लिए तैनात शहर की रेड क्रास मोटर कोर।

2. अमेरिकी शहर सेंट लूइस में पब्लिक हेल्थ सर्विसेस ने जबरदस्त काम किया। किसी केस मिलने से पहले ही शहर के हेल्थ कमिश्नर डॉ. मैक्स स्टार्कलॉफ ने स्थानीय डॉक्टरों को हाई अलर्ट कर दिया। उन्होंने सेंट लुईस पोस्ट डिस्पैच में भीड़ से बचने का महत्व बताने के लिए लेख भी लिखे।
जैसे ही सेंट लुईस के करीब सेना के एक बैरक में स्पेनिश फ्लू फैला, डॉ. स्टार्कलॉफ ने बिना समय गंवाए स्कूल, सिनेमा घर, थियेटर, पूल हॉल बंद करा दिए। लोगों के जमा होने पर पाबंदी लगा दी। कारोबारियों ने उन पर बहुत दबाव बनाया मगर वे माने नहीं। संक्रमण जब फैलने लगा तो वॉलेंटियर नर्सों मे लोगों का घर पर ही इलाज शुरू कर दिया। आखिर केसों बढ़ने का कर्व फ्लैट हो गया।

तब N-95 मास्क की जगह गॉज से बनते थे मास्क

1918 में स्पेनिश फ्लू से फैली महामारी के दौरान गौज से मास्क बनातीं रेड क्रास की महिला कर्मचारी।
1918 में स्पेनिश फ्लू से फैली महामारी के दौरान गौज से मास्क बनातीं रेड क्रास की महिला कर्मचारी।

1918 में आज के N95 जैसे मास्क नहीं थे। तब सर्जिकल मास्क गॉज से बनते थे और लोग इन्हें ही स्पेनिश फ्लू से बचने में इस्तेमाल कर रहे थे। मगर बीमारी से बचने के लिए तमाम प्रयोग भी किए जा रहे थे।

मास्क के खिलाफ तर्क

  • मास्क से लोगों में डर फैलता और प्रशासन लोगों चुप करना चाहता है।
  • कारोबारियों को लगता था कि मास्क पहने लोग बाहर जाने पर खरीददारी नहीं करते।
  • मास्क को नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  • मास्क लोगों को सुरक्षित रहने का झूठा आश्वासन देते हैं, क्योंकि यह बीमारी से बचने की गारंटी नहीं।

भारत में स्पेनिश फ्लू : भारतीय अफसरों वाले शहरों में 15% कम मौत
भारत में स्पेनिश फ्लू ब्रिटिश सेना में तैनात भारतीय सैनिकों के साथ मुंबई पहुंचा। तब 1918 की मई थी। फ्लू फैल रहा था, मगर ब्रिटिश अधिकारी चुप थे। धीरे-धीरे भारतीय अखबारों में खबरें छपना शुरू हुईं कि शहरों की श्मशान भूमि में रोज 150-200 शव पहुंच रहे थे। दो साल के भीतर एक से दो करोड़ भारतीयों की जान जा चुकी थी। यह पूरी आबादी का 6% था।

मौजूदा कोरोना की तरह स्पेनिश फ्लू की पहली लहर कमजोर थी, मगर सितंबर 1918 में आई दूसरी लहर उत्तर भारत से श्रीलंका तक जा पहुंची। 1200 शहर और नगरों के डाटा बताता कि जिन शहरों या नगरों में भारतीय डिस्ट्रिक्ट अफसर तैनात थे वहां की मृत्युदर ब्रिटिश डिस्ट्रिक्ट अफसरों के मुकाबले 15% कम थी।

पहले विश्व युद्ध (1914-18) में तैनात ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय जवान। युद्ध के मोर्चे से लौटे जवानों से ही भारत में स्पेनिश फ्लू फैला।
पहले विश्व युद्ध (1914-18) में तैनात ब्रिटिश सेना में शामिल भारतीय जवान। युद्ध के मोर्चे से लौटे जवानों से ही भारत में स्पेनिश फ्लू फैला।
कोरोना की तरह स्पेनिश फ्लू की भी सबसे ज्यादा मार मुंबई यानी बॉम्बे पर पड़ा। इसी वजह से इसे भारत में बॉम्बे फ्लू या बॉम्बे फीवर के नाम से जाना गया। सूना पड़ा मुंबई समुद्र तट।
कोरोना की तरह स्पेनिश फ्लू की भी सबसे ज्यादा मार मुंबई यानी बॉम्बे पर पड़ा। इसी वजह से इसे भारत में बॉम्बे फ्लू या बॉम्बे फीवर के नाम से जाना गया। सूना पड़ा मुंबई समुद्र तट।
तब भी मुंबई की घनी आबादी की वजह से वहां स्पेनिश फ्लू का सबसे ज्यादा असर हुआ था। बंदरगाह के चलते पहले विश्वयुद्ध से लौटे जवान अपने साथ इस फ्लू का वायरस बॉम्बे ले आए।
तब भी मुंबई की घनी आबादी की वजह से वहां स्पेनिश फ्लू का सबसे ज्यादा असर हुआ था। बंदरगाह के चलते पहले विश्वयुद्ध से लौटे जवान अपने साथ इस फ्लू का वायरस बॉम्बे ले आए।
स्पेनिश फ्लू से करोड़ों भारतीय बीमार थे। लाखों की मौत हो चुकी थी, मगर दिल्ली में ब्रिटिश राज के अफसर की शान शौकत में कोई कमी नहीं थी।
स्पेनिश फ्लू से करोड़ों भारतीय बीमार थे। लाखों की मौत हो चुकी थी, मगर दिल्ली में ब्रिटिश राज के अफसर की शान शौकत में कोई कमी नहीं थी।

आखिर खत्म कैसे हुआ स्पेनिश फ्लू?
विशेषज्ञों का कहना है कि स्पेनिश फ्लू कभी खत्म नहीं हुआ। दुनिया के हर तीसरे शख्स को बीमार करने के बाद स्पेनिश फ्लू का H1N1 स्ट्रेन ही बर्ड फ्लू या स्वाइन फ्लू के साथ मिलकर महामारी के नए स्ट्रेन बनाता रहता है। 1957, 1968 और 2009 में यही हुआ।

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