बंगाल से ग्राउंड रिपोर्ट / वोटों का बंटवारा बन सकता है दीदी का स्पीड ब्रेकर

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 08:08 AM IST

मुर्शिदाबाद, बहरामपुर, जंगीपुर, बालुरघाट, मालदा उत्तर, मालदा दक्षिण, जलपाईगुड़ी, दार्जिंलिंग और रायगंज से ग्राउंड रिपोर्ट।

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  • कांग्रेस-भाजपा का डर: प्रत्याशियों और मतदाताओं में तृणमूल का खौफ
  • तृणमूल की रणनीति: दूसरे दलों से नेता तोड़ उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया

अबू ताहेर खान कुछ महीने पहले तक कांग्रेस के विधायक थे। अब वे मुर्शिदाबाद से तृणमूल के उम्मीदवार हैं। कांग्रेस विधायक अपूर्व सरकार ने दो साल पहले विधानसभा चुनाव में तृणमूल को चीख-चीखकर कोसा था, अब वे बहरामपुर से तृणमूल प्रत्याशी हैं। इन दो तथ्यों से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रणनीति को समझा जा सकता है। भाजपा व अन्य दलों को रोकने के लिए ममता कुछ भी करने को तैयार हैं। भाजपा भी उन्हें उन्हीं की शैली में जवाब देने की कोशिश में है। 

 

बंगाल में सर्वाधिक 72% मुस्लिम वोटर वाले मुर्शिदाबाद में भाजपा ने जिन हुमायूं कबीर को उतारा है, वे कांग्रेस विधायक व तृणमूल में रह चुके हैं। जंगीपुर से भाजपा उम्मीदवार माफूजा खातून सीपीएम से दो बार विधायक रहीं, लेकिन ममता और उनकी ब्रिगेड से मुकाबला इतना आसान नहीं है। कांग्रेस, भाजपा व सीपीएम की पहली चिंता तो यह है कि उनके वोटरों को वोट देने का मौका मिल जाए और वोटर की चिंता है कि बस चुनाव बिना झगड़ा-फसाद निपट जाए। इसकी वजह है राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों से आ रही चुनावी हिंसा की खबरें। 

 

बहरामपुर से कांग्रेस के अधीर रंजन व जंगीपुर से पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत सांसद हैं, जबकि मुर्शिदाबाद सीपीएम के पास है। चौधरी को कोई दिक्कत नहीं लगती लेकिन जंगीपुर और मुर्शिदाबाद में मुस्लिम वोटों का विभाजन फैक्टर रहेगा। रायगंज, मालदा उत्तर व मालदा दक्षिण में भी ऐसी ही स्थिति है। यहां मोदी, राहुल से ज्यादा चर्चा ‘दीदी’ की है और डर भी। मुर्शिदाबाद में भाजपा चुनाव कार्यालय में बैठे मंडल अध्यक्ष सोमेंद्र मंडल कहते हैं ‘आतंक तो इतना था कि पंचायत चुनाव में हमारे लोग नामांकन भी जमा नहीं कर पाए, चुनाव लड़ना तो दूर की बात’। 

 

जंगीपुर में प्रणब मुखर्जी के पुत्र अभिजीत ने 2012 के उपचुनाव में जीत दर्ज कर उनकीराजनीतिक विरासत को संभाला। इस बार सीपीएम के साथ ही कांग्रेस व भाजपा की घेराबंदी से भी जूझना पड़ रहा है। यहां भाजपा ने बड़ा दांव खेला है। सीपीएम की पूर्व विधायक माफूजा खातून के बारे में दावा है कि वे भाजपा की देश में एकमात्र मुस्लिम महिला प्रत्याशी हैं। बहरामपुर में 20 साल से कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी सांसद हैं। इस बार उन्हें तृणमूल कांग्रेस ने विधायक अपूर्व सरकार के मार्फत टक्कर देने की कोशिश की है। लेफ्ट ने कांग्रेस को समर्थन दिया है, इसलिए चौधरी के लिए किसी तरह की दिक्कत नहीं है।

 

मालदा उत्तर में 2014 में कांग्रेस से जीती मौजूदा सांसद मौसम नूर अब तृणमूल उम्मीदवार हैं। टक्कर भाजपा प्रत्याशी व सीपीएम के विधायक खगेन मुर्मु तथा कांग्रेस के इशा खान चौधरी से है। चौधरी भी विधायक हैं। मौसम नूर के पाला बदलने पर लोगों की प्रतिक्रिया उनके खिलाफ आई थी। यहां माहौल इतना तनावपूर्ण है कि तृणमूल कार्यकर्ताओं व सरकार पर खौफ पैदा करने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस प्रत्याशी ने प्रचार नहीं करने का ऐलान कर दिया। यह ‘खौफ’ अब यहां मुद्दा है। मुस्लिम वोट (करीब 49 फीसदी) का विभाजन कांग्रेस व तृणमूल का गणित बिगाड़ सकता है।

 

मालदा दक्षिण में मुकाबला मौजूदा सांसद कांग्रेस के अबू हसन खान चौधरी, तृणमूल के मोअज्जम हुसैन और भाजपा की श्रीरूपा मित्रा के बीच है। करीब 65% मुस्लिम मतदाताओं वाली इस सीट पर 2014 में भाजपा के विष्णु राय दूसरे नंबर पर रहे थे। लेकिन बाहरी के ठप्पे के कारण श्रीरूपा को नुकसान हो सकता है।

 

रायगंज में सीपीएम के मौजूदा सांसद मोहम्मद सलीम को तृणमूल से चुनौती मिल रही है। कांग्रेस के दिवंगत नेता प्रियरंजन दासमुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी, भाजपा की प्रदेश महासचिव देवश्री चौधरी तथा तृणमूल के विधायक कन्हैयालाल अग्रवाल मैदान में हैं। 2014 में सलीम महज 1634 वोट से जीत पाए थे। दीपा के देवर पवित्र रंजन तृणमूल से प्रत्याशी थे। देवर-भाभी के झगड़े में सीपीएम को फायदा हो गया था। भाजपा यहां तीसरे नंबर पर थीं। यहां 53% मुस्लिम वोटर हैं। यहां वोटों का ध्रुवीकरण महत्वपूर्ण फैक्टर रहेगा, जो भाजपा के पक्ष में जा सकता है।

 

बालुरघाट के तीन तरफ बांग्लादेश सीमा है। सांसद व तृणमूल प्रत्याशी थिएटर आर्टिस्ट अर्पिता घोष के सामने भाजपा के डॉ. सुकांता मजूमदार हैं। उन पर बाहरी का मुद्दा भारी पड़ रहा है। दार्जिलिंग में भाजपा ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से ही पिछले दो चुनाव जीते थे। इस बार स्थिति अलग है। जीजेएम के एक धड़े को तृणमूल ने अपने साथ कर जीजेएम के दार्जिलिंग से विधायक अमर सिंह राई पर दांव खेला। उनके साथ जीजेएम का विनय तामंग गुट है। भाजपा ने यहां रिस्क नहीं ली और मौजूदा सांसद व केंद्रीय मंत्री एसएस अहलूवालिया को दुर्गापुर शिफ्ट कर राजू सिंह बिष्ट को उतारा। जीजेएम का विमल गुरूंग गुट और गोरखा लिबरेशन फ्रंट उनके समर्थन में है।

 

जलपाईगुड़ी में भी मुद्दा विकास ही है। यहां शुरू हुई कलकत्ता हाईकोर्ट की सर्किट बेंच का श्रेय तृणमूल और भाजपा लेने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन लोग मानते हैं कि ममता बनर्जी इसके लिए संघर्ष कर रही थीं। सांसद व तृणमूल प्रत्याशी विजय चंद्र बर्मन का मुकाबला भाजपा के डॉ जयंत राय से है। पार्टी के नेटवर्क के कारण बर्मन मजबूत स्थिति में हैं। बर्मन के मार्फत ही तृणमूल ने 2014 में यहां जीत हासिल की थी।

 

यहां मोदी और दीदी फैक्टर हावी
चुनाव ‘मोदी की सरकार’ और ‘दीदी की सरकार’ ही केंद्रित। इसमें भी दीदी यानी ममता बनर्जी ही ज्यादा चर्चा में है। भाजपा जहां मोदी के नाम पर तो वोट मांग रही है, वहीं ममता को विकास की राह में स्पीड ब्रेकर बता रही है। इधर ममता भाजपा को राज्य के लिए ‘खतरनाक’ बता रही। कांग्रेस और लेफ्ट की पहली लड़ाई ममता से है, क्योंकि भाजपा से सीधी लड़ाई के लिए चुनाव से पहले ममता ने कांग्रेस और लेफ्ट के तृणमूल में ‘विलय’ की मुहिम छेड़ दी थी। जिन निकायों में कांग्रेस और लेफ्ट बहुमत में थे, वे बिना चुनाव के तृणमूल के हो गए। मुर्शिदाबाद और जंगीपुर की म्युनिसिपालिटी में ऐसा ही हुआ।

 

2014 की स्थिति

सीट विजेता
मुर्शिदाबाद सीपीआई(एम)
बहरामपुर कांग्रेस
जंगीपुर कांग्रेस
बालुरघाट तृणमूल
मालदा उत्तर कांग्रेस
मालदा दक्षिण कांग्रेस
जलपाईगुड़ी तृणमूल
दार्जिंलिंग भाजपा
रायगंज सीपीआई(एम)

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