भास्कर 360 डिग्री / सुबह 7 बजे खुद ही दफ्तर खोेला, बिजली के लिए घूस नहीं दी और सस्ती फ्लाइट में सफर

अजीम प्रेमजी ने हाल ही में 52,750 करोड़ रुपए दान करने की घोषणा की है, पढ़िए कितनी सादगी में गुजरा है उनका जीवन

अजीम प्रेमजी अजीम प्रेमजी
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अजीम प्रेमजीअजीम प्रेमजी

  • प्रेमजी परिवार की बर्मा के राइस किंग से वनस्पति के व्यापारी और फिर भारत की सबसे बड़ी आईटी कंपनी बनाने की कहानी

Dainik Bhaskar

Mar 17, 2019, 09:34 AM IST

बर्मा के प्रेमजी परिवार का वहां चावल का कारोबार था। वे बर्मा के राइस किंग कहलाते थे। फिर किन्हीं कारणों से परिवार भारत में गुजरात के कच्छ आ  गया। यहां भी चावल का कारोबार शुरू किया। कारोबार चल पड़ा। 1945 तक अजीम प्रेमजी के पिता एम.एच. प्रेमजी भारत के महत्वपूर्ण चावल कारोबारी बन चुके थे। लेकिन फिर अंग्रेजों ने कुछ नई नीतियां लागू कर दीं और एमएच हाशमी व्यापार बदलने को मजबूर हो गए। उन्होंने वनस्पति घी बनाने का फैसला किया। इस तरह 29 दिसंबर 1945 को वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड कंपनी अस्तित्व में आई, जो बाद में विप्रो के नाम से जानी गई। 


1946 में मुंबई से 400 किमी दूर अमलनेर गांव में वनस्पति घी का कारखाना शुरू किया गया। दो ही साल में कंपनी पब्लिक लिमिटेड बन गई। उन्होंने अपने कारखाने में स्थानीय किसानों को उपज के अच्छे दाम दिए। कई छोटे व्यापारियों को भी उनकी कंपनी से फायदा हुआ। प्रेमजी की सद्भावना को देखते हुए गांव वाले उन्हें सम्मान से ‘मोहम्मद सेठ’ कहने लगे।


एम.एच. प्रेमजी देश के सबसे बड़े व्यापारियों में शुमार हो चुके थे। 1947 में जब भारत-पाकिस्तान बंटवारे का दौर आया तब मोहम्मद अली जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान में रहने का निवेदन किया। वे उन्हें पाकिस्तान का वित्त मंत्री बनाना चाहते थे। लेकिन प्रेमजी ने यह प्रास्ताव ठुकराकर भारत में ही रहने का फैसला लिया। बाद में उन्होंने अपने बेटे अजीम को स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी पढ़ने भेज दिया। 


फिर आया 11 अगस्त 1966 का दिन। स्टैनफोर्ड में पढ़ रहे युवा अजीम प्रेमजी को नहीं पता था कि आज के बाद उसका जीवन पूरी तरह बदलने वाला है। एक टेलीफोन कॉल भारत से आई। उस जमाने में अधिकांश ट्रंक कॉल्स दहलाने वाली खबरें लेकर आती थीं। ऐसा ही हुआ। फोन पर दूसरी तरफ उनकी मां गुलबानू थीं, जिन्होंने उन्हें पिता की मौत की खबर दी। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जब कुछ संभला तो प्रेमजी को बताया गया कि अब कंपनी की कमान उन्हें ही संभालनी है। यही पिता की आखिरी इच्छा है और समय का तकाजा भी। 


हालांकि इस समय तक प्रेमजी को काम का अनुभव तो छोड़िए जीवन का भी कोई अनुभव नहीं था। लेकिन प्रेमजी ने वक्त के साथ हमेशा खुद को साबित किया और महाराष्ट्र के एक गांव अमलनेर से शुरू इस कंपनी को विदेश तक पहुंचाया। 1965 में ही कंपनी तात्कालिक वास्तविक कीमत लगभग 7 करोड़ रुपए थी। कंपनी उस समय के हिसाब से बड़ी थी लेकिन प्रेमजी ने यहां लगातार नीतियों, तकनीक और उत्पाद के आधार पर तमाम प्रयोग किए और इसे मल्टीनेशनल कंपनी बनाया। अजीम 21 साल की उम्र में कंपनी के चेयरमैन बने। भारत से आईबीएम के बाहर जाने के बाद विप्रो ने 1980 में आईटी बिजनेस में कदम रखा। उनकी बीवी का नाम यास्मीन है। उनके दो बेटे हैं जो बिजनेस में उनका साथ देते हैं।

 

21 साल की उम्र में कंपनी संभाली, मां से सीखा सेवाभाव, पढ़िए प्रेमजी के जीवन के रोचक किस्से

 

साधारण व्यक्तित्व -  ऑटो से एयरपोर्ट चले जाते हैं, कर्मचारियों जैसी सुविधाएं लेते हैं : एक बार विप्रो के एक कर्मचारी ने कार वहां पार्क कर दी जहां अजीम अपनी कार खड़ी करते थे। अधिकारियों को यह पता चला तो सुर्कुलर जारी किया गया कि कोई भी भविष्य में उस विशेष जगह पर गाड़ी खड़ी न करे। प्रेमजी ने जब यह देखा तो उन्होंने सर्कुलर का जवाब भेजा। उन्होंने लिखा ‘कोई भी खाली जगह पर वाहन खड़े कर सकता है। यदि मुझे वही जगह चाहिए तो मुझे दूसरों से पहले ऑफिस आना होगा।’

 

  • अजीम कंपनी के काम से बाहर जाते हैं तो हमेशा ऑफिस गेस्ट हाउस में ही रुकते हैं। यही नहीं प्रेमजी इकोनॉमी क्लास में सफर करते हैं। घर से ऑफिस या एयरपोर्ट से घर जाते समय अगर टैक्सी न मिले तो ऑटो रिक्शा से जाने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। 

बेहद ईमानदार - करीब 1.5 करोड़ का नुकसान सहा लेकिन रिश्वत नहीं दी : 1987 में विप्रो ने अपने तुमकूर (कर्नाटक) कारखाने के लिए बिजली के कनेक्शन का आवेदन किया। कर्मचारी ने इसके लिए एक लाख रुपए रिश्वत मांगी। जब प्रेमजी को यह पता चला तो उन्होंने रिश्वत देकर काम करवाने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, नियम से सप्लाई नहीं मिलेगी तो हम अपनी बिजली बना लेंगे। विप्रो ने जेनरेटर से काम चलाया। हालांकि करीब 1.5 करोड़ रुपए खर्च हुए।

 

  • प्रेमजी जब विप्रो के चेयरमैन बने तो 21 साल के थे। उनकी कंपनी के एक शेयरधारक करन वाडिया ने शेयरधारकों की मीटिंग में उनकी कम उम्र को मुद्दा न बनाने के एवज में अप्रत्यक्ष रूप से रिश्वत मांगी। लेकिन प्रेमजी कभी उसके सामने नहीं झुके।
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स्पेसिफिक बात - आंकड़ों में बात करते हैं, बोलते कम हैं : प्रेमजी विप्रो के चेयरमैन बने तो उन्होंने तय कि वे अपने कर्मचारियों का आंकलन संख्या के आधार पर करेंगे। उन्होंने तय किया कि जब वे यह पूछें कि वनस्पति की बिक्री कैसी चल रही है, तो इसका जवाब ‘ठीक’ या ‘बहुत अच्छी’ नहीं होना चाहिए। अधिकारी को तेल के टिनों की संख्या या पिछले महीने की तुलना में अंतर कर प्रतिशत बताना होगा। 

 

  • प्रेमजी बेहद कम बोलते हैं। वे गिनेचुने लेकिन प्रभावशाली शब्द बोलते हैं। वे अत्यंत महत्वपूर्ण बैठकों में भी एक किनारे चुपचाप बैठे रहते हैं और बाद में निर्णयक बातें ही बोलते हैं। वे अपनी कहने में हमेशा संख्याओं की मदद लेते हैं। उदाहरण के लिए- ‘मेरी टीम में प्रत्येक व्यक्ति अपने वेतन से असंतुष्ट है’ के स्थान पर वे यह स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं कि ‘वे अपने वेतन में 12 फीसदी की वृद्धि मांग कर रहे हैं। बाजार की स्थिति से तुलना करने पर यह उचित मांग है।’  (फोटो साभार factordaily.com)
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जमीन से जुड़े - इंटरव्यू लेने के लिए खुद सुबह 7 बजे पहुंचकर ऑफिस खोला : विप्रो की डब्ल्यूईपी सॉल्यूशन्स के एमडी राम नारायण अग्रवाल 1977 में विप्रो से जुड़े। तब वे सुबह सात बजे इंटरव्यू के लिए पहुंचे थे। तो एक युवक आया और ऑफिस खोलने लगा। उन्हें लगा कि ये ऑफिस  एडमिनिस्ट्रेशन का व्यक्ति है। युवक उन्हें रिसेप्शन पर बैठाकर अंदर चला गया। थोड़ी देर बाद इंटरव्यू के लिए बुलाते हुए उसी युवक ने अपना परिचय दिया, ‘मैं प्रेमजी हूं।’ इंटरव्यू 12 घंटे चला।

 

  • प्रेमजी के शुरुआती दिनों में उन्हें पता चला कि गर्मियों में कंपनी का उत्पादन गिर जाता है क्योंकि अमलनेर की गर्मी में दिनभर खड़े रहना मुश्किल है। प्रेमजी ने अमलनेर में न्यूनतम सुविधाओं व झुलसती गर्मी में वे तीन महीने रहकर समस्या समझी और उसका समाधान किया।
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दानी स्वभाव - मां से मिली चैरिटी की प्रेरणा,  फ्री में बांटे थे गांव वालों को शेयर : विप्रो कंपनी शुरू होने के दूसरे ही वर्ष में पब्लिक लिमिटेड बन गई थी। उस समय अजीम प्रेमजी के पिता ने ग्रामीणों को उपहारस्वरूप शेयर बांटे थे। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अजीम प्रेमजी ने 70 के दशक में गांव वालों को विप्रो के शेयर दिए थे।

 

  • एक बार उनकी मां के हॉस्पिटल के कर्मचारी वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर एंट्रेंस गेट पर ही धरने पर बैठ गए। उनकी मां ढेर सारे सफेद कागज लेकर आईं और उस जगह को पूरी तरह ढंक दिया। ताकि अस्पताल में काम चलता रहे। प्रेमजी कहते हैं कि यह घटना उन्हें हमेशा याद रही और मां से ही उन्हें सेवा और चैरिटी की प्रेरणा मिली।
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दुनिया के सबसे बड़े दानदाताओं में शुमार अजीम प्रेमजी बिना किसी सिक्युरिटी के चलते हैं 

 

कंपनी का नाम लेने में आसानी हो इसलिए प्रेमजी ने विप्रो को चुना : वर्ष 1945 में जब कंपनी की स्थापना हुई तो इसका नाम वेस्टर्न इंडिया वेजिटेबल प्रोडक्ट्स लिमिटेड था। बाद में जब कंपनी दूसरे उत्पाद भी बनाने लगी तो इससे वेजिटेबल शब्द को हटा दिया गया। बाद में जब प्रेमजी ने कंपनी संभाली तो उन्हें छोटा नाम चाहिए था इसलिए उन्होंने वेस्टर्न से डब्ल्यू, इंडिया से आई और उत्पाद से प्रो शब्दों का चयन किया और इसका नया नाम विप्रो रखा।


2017-18 में विप्रो ग्रुप के पूरे बिजनेस का 96.7% आईटी सेगमेंट से आया था। 2000 में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में इसकी लिस्टिंग हुई। फरवरी 2002 में आईएसओ 14001 सर्टिफिकेशन वाली भारत की पहली सॉफ्टवेयर कंपनी बनी। ग्रुप आईटी के अलावा पर्सनल केयर, हेल्थकेयर, लाइटिंग, फार्मा बिजनेस में है।

 

विप्रो के दो लोगो की कहानी : 1996 में बने विप्रो के लोगो में सूरजमुखी फूल दिखा जो उसके खाद्य व्यापार को दर्शाता था। 2017 में आए लोगो को आईटी क्षेत्र में पहुंच को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया।

 

  • 110 देशों में विप्रो के आईटी बिजनेस फैले हुए हैं। 
  • 1.63 लाख कर्मचारी दुनियाभर में कंपनी में काम करते हैं। 
  • 35% कर्मचारी विप्रो में महिलाएं हैं। 
  • 74% हिस्सेदारी विप्रो में प्रेमजी समेत प्रमोटर ग्रुप की है।
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