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दादा ने तीन घायल मोरों की सेवा की तो वे लौटे ही नहीं, अब कुनबे में 117; नौकरी ठुकरा कर पोता संभाल रहा पीकॉक वैली

एक वर्ष पहले
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मोरों के बीच पीकॉक मैन कान्हू।
  • ओडिशा के कटक में है देश की इकलौती पीकॉक वैली
  • 19 साल पहले भटककर फायरिंग रेंज में पहुंचे थे मोर 
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रायपुर (कटक से लौटकर राकेश पाण्डेय /भूपेश केशरवानी). ओडिशा के कटक के करीब पहाड़ की तलहटी पर बना सिद्धेश्वर फायरिंग रेंज पीकॉक वैली के नाम से मशहूर है। 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद घायल अवस्था में पहुंचे एक मोर और दो मोरनी की पन्नू बेहरा ने ऐसी सेवा की कि वे यहीं के होकर रह गए। धीरे-धीरे मोरों की संख्या 60 से ऊपर हो गई। आज इस वैली में 117 मोर हैं। पन्नू को गुजरे छह साल हो गए। अब इस विरासत को उनका पोता कान्हू बेहरा संभाल रहे हैं। मोरों की देखभाल के इस जुनून में उन्होंने एक कंपनी की नौकरी ठुकरा दी। लेकिन मोर-प्रेम देखकर सरकार ने ही उन्हें नौकरी पर रख लिया। कान्हू की एक आवाज पर मोर यहां इकट्ठे हो जाते हैं। 

 

महानदी के किनारे तड़गड और नाराज गांव के बीच बने इस फायरिंग रेंज में पन्नू बेहरा होमगार्ड थे। वे यहां पेड़-पौधे लगाने के साथ-साथ इनकी देखभाल भी करते थे। 1999 के चक्रवात के बाद चण्डका जंगल से तीन मोर भटककर रेंज में आए। पन्नू ने इनमें से एक मोर को राजा नाम दिया। पन्नू ने इनमें से एक घायल मोर की मरहम-पट्‌टी की, फिर तीनों को जंगल में छोड़ दिया। दूसरे दिन मोर फिर वापस आ गए। पन्नू ने उन्हें दाना-पानी दिया। फिर मोर लौटे ही नहीं और यहीं उनका कुनबा बढ़ने लगा।

 

पन्नू की मौत के बाद 10 दिन नहीं आए मोर

 

  • 2013 सितंबर में पन्नू रिटायर हो गए, लेकिन राष्ट्रीय पक्षी के प्रति उनके प्रेम और समर्पण को देखते हुए उनकी सेवा अवधि बढ़ा दी गई। इस बीच, अस्थमा से पीड़ित पन्नू बीमार रहने लगे। उन्हें चिंता मोरों की देखभाल की थी। इसलिए उन्होंने अपने पोते कान्हू को यह जिम्मेदारी सौंपी। शुरू में पन्नू, कान्हू के साथ आते थे, ताकि पक्षियों के बीच एक रिश्ता बन जाए। कान्हू ने बताया कि दादा की मौत के 10 दिन तक मोर वहां नहीं आए। इसके बावजूद वे हर रोज दाना-पानी रखते थे और राजा आ...आ.. की आवाज लगाते थे। 10 दिन बाद वहां 25 मोर आए। इसके बाद से इन्हें दाना-पानी देना दिनचर्या में शामिल हो गया। 
  • मोरों के दाना-पानी पर हर रोज करीब 500 रुपए खर्च होते हैं। कान्हू दिन में दो बार सुबह 6 से 8 और दोपहर 3 से 5 बजे तक मोरों को दाना देते हैं। नौकरी मिलने से पहले सरकार से उन्हें 2500 रुपए महीने मिलते थे। हालांकि, यह काफी नहीं था, फिर भी वे मोरों की सेवा में लगे रहे। पिछले छह साल से यह सिलसिला चल रहा है। लोग कहते हैं कि पन्नू के बाद पीकॉक वैली को फिर से नया पीकॉक मैन मिल गया है। 

 

यूं मिला वैली को नाम 
साइकलिस्ट की एक टीम फायरिंग रेंज से गुजर रही थी। पन्नू को मोरों के बीच देखकर वे रुक गए। पहाड़ी की तलहटी में बसे इस स्थान को उन्होंने पहली बार पीकॉक वैली नाम दिया और पन्नू को पीकॉक मैन। बस, तब से यही नाम चल पड़ा। 

कान्हू को सरकार ने इसी साल मार्च में होमगार्ड बनाया है। पोस्टिंग वैली में की गई, ताकि उनकी मुहिम जारी रहे। बीकॉम पास कान्हू को एक कंपनी ने 18 हजार की नौकरी ऑफर की थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और मोरों की देखभाल को ही अपना मिशन बना लिया।

 

 

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