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महाराष्ट्र संकट में अब आगे क्या:सुप्रीम कोर्ट से शिंदे गुट को 12 जुलाई तक मोहलत; सरकार रहेगी या जाएगी, 4 सवालों में समझें

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: विराग गुप्ता

महाराष्ट्र के सियासी संकट पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में करीब 2 घंटे सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस, केंद्र सरकार, शिवसेना और डिप्टी स्पीकर को नोटिस जारी किया। सुनवाई में कोर्ट ने शिंदे गुट को कुछ राहत दी है, जबकि फ्लोर टेस्ट की मांग पर कोर्ट ने कुछ भी कहने से इनकार किया।

अंतरिम आदेश से बागी पक्ष को पांच बड़ी राहत मिली है। पहला- विधायकों और उनकी फैमिली को सुरक्षा। दूसरा- अयोग्यता मामले पर जवाब देने के लिए 14 दिन का समय। तीसरा- डिप्टी स्पीकर की भूमिका सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद सवालों के घेरे में।

चौथा- उद्धव ठाकरे द्वारा नियुक्त विधायक दल के नेता अजय चौधरी के खिलाफ नोटिस। पांचवां- सबसे महत्वपूर्ण कि सत्ता की लड़ाई का केंद्र मुंबई की बजाय देश की राजधानी दिल्ली ट्रांसफर हो गया। बागी गुट की मान्यता और सरकार के बहुमत का फैसला स्पीकर और विधानसभा से होगा।

ऐसे में सवाल उठता है कि महाराष्ट्र के सियासी संकट में अब आगे क्या होगा? 4 सवाल और उनके जवाब से इसे समझते हैं…

1. डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल का क्या होगा?
महाराष्ट्र विधानसभा में स्पीकर का पद रिक्त है। ऐसे में डिप्टी स्पीकर नरहरि जिरवाल पर सबकी नजर है। पिछले दिनों बागी विधायकों ने जिरवाल के खिलाफ नो कॉन्फिडेंस मोशन का नोटिस दिया था, जिसे जिरवाल ने सही तरीके से नहीं दिए जाने की वजह बताकर खारिज कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की है कि जिरवाल के पास जब खुद विश्वासमत नहीं है, तो वो कैसे सदस्यता रद्द का फैसला करेंगे। कोर्ट ने उन्हें हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया है। संविधान के अनुच्छेद 179 सी के तहत स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया है, लेकिन उसके लिए 14 दिन की नोटिस देना जरूरी है।

महाराष्ट्र असेंबली में स्पीकर का पद पिछले साल से ही रिक्त है, जिस वजह से डिप्टी स्पीकर ही सारा काम देख रहे हैं।
महाराष्ट्र असेंबली में स्पीकर का पद पिछले साल से ही रिक्त है, जिस वजह से डिप्टी स्पीकर ही सारा काम देख रहे हैं।

अनुच्छेद 181 के तहत उस दौरान वे फैसलों में शामिल नहीं रह सकते। अगर कोर्ट अगली सुनवाई में विश्वासमत हासिल करने का निर्देश देता है तो फिर गाड़ी अटक सकती है। इन परिस्थितियों में दो विकल्प हैं।

पहला, अनुच्छेद 178 के तहत विधानसभा में नए स्पीकर का चुनाव हो। दूसरा अनुच्छेद 180 के तहत राज्यपाल प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति कर सकते हैं, लेकिन विधायकों की अयोग्यता के बारे में निर्धारण करने के लिए प्रोटेम स्पीकर के पास संवैधानिक शक्ति नहीं होगी।

इसलिए नए स्पीकर की नियुक्ति या फिर डिप्टी स्पीकर के अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होना जरूरी है। ऐसी स्थिति में अगर फ्लोर टेस्ट की नौबत आई, तो राज्यपाल प्रोटेम स्पीकर का चुनाव कर सकते हैं।

2. विधायकों की सदस्यता रद्द वाले नोटिस का क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों की नोटिस पर 12 जुलाई तक यथस्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है। कोर्ट में अगली सुनवाई 11 जुलाई को है। अगर कोर्ट में डिप्टी स्पीकर को राहत मिलती है, तो इन विधायकों पर खतरा बढ़ेगा। वहीं डिप्टी स्पीकर को राहत नहीं मिलने की स्थिति में पूरा मामला फ्लोर टेस्ट में जाएगा।

एकनाथ शिंदे गुट के 16 विधायकों को अयोग्यता का नोटिस जारी किया गया था, जिस पर कोर्ट से राहत मिली है।
एकनाथ शिंदे गुट के 16 विधायकों को अयोग्यता का नोटिस जारी किया गया था, जिस पर कोर्ट से राहत मिली है।

3. असेंबली में शिंदे गुट को मिलेगी अलग मान्यता?
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को निर्देश दिया है कि बागी 39 विधायकों और उनके परिवार वालों को सुरक्षा दी जाए। अब तक शिंदे गुट सिर्फ दावा कर रहा था कि उसके पास दो तिहाई बहुमत है, मगर अब कोर्ट में 39 विधायकों की लिस्ट दी गई है, जिसे सुरक्षा देने के लिए कहा है। इसके बाद अलग गुट की मान्यता की दावेदारी बढ़ सकती है।

संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल बदल कानून के तहत दो तिहाई विधायकों के गुट को मान्यता मिलने के साथ उन्हें दूसरे दल में विलय करने की भी शर्त है, लेकिन शिंदे गुट खुद को दो तिहाई विधायकों के समर्थन के नाम पर असली शिवसेना होने का दावा कर रहा है। मान्यता देने में भी दो बातें हैं। एक विधानसभा में अलग गुट और दूसरा पार्टी में अलग गुट। पार्टी में दो धड़ों का मामला चुनाव आयोग के पास जाएगा, जबकि विधानसभा में अलग गुट को मान्यता स्पीकर/डिप्टी स्पीकर देते हैं।

शिंदे और उद्धव की लड़ाई सड़कों पर आ गई है। शिवसेना के कार्यकर्ता जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं।
शिंदे और उद्धव की लड़ाई सड़कों पर आ गई है। शिवसेना के कार्यकर्ता जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे हैं।

4. उद्धव सरकार पर क्या असर होगा?
11 जुलाई तक उद्धव सरकार के ऊपर से फिलहाल खतरा टल गया है। सुनवाई तक सरकार की कोशिश होगी कि बागी विधायकों को मनाया जाए। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सोमवार को 9 मंत्रियों के विभाग छीने गए हैं। इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि उद्धव सरकार बागी मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त नहीं कर रही।

दूसरी तरफ मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ बगावत करने वाले विधायक गुवाहाटी में रहते हुए, मंत्रिमंडल से त्यागपत्र नहीं दे रहे। बागी धड़े की मान्यता और नई सरकार के गठन के बारे में अनेक संवैधानिक अड़चने हैं, लेकिन इस घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि उद्धव सरकार ने बहुमत खो दिया है।

अगर बागी धड़े को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला तो संवैधानिक संकट के नाम पर आगे चलकर राज्य में अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन भी लागू हो सकता है।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं।)