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सुप्रीम कोर्ट की पुलिस को फटकार; हाईकोर्ट ने कहा- 1984 जैसे हालात नहीं बनने देंगे, जेड सिक्योरिटी वाले नेता लोगों के बीच जाकर उन्हें समझाएं

एक वर्ष पहले
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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अगर दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले में वक्त रहते कार्रवाई की होती तो ये हालात नहीं होते
  • दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस मुरलीधर ने घायलों के इलाज और उनकी सुरक्षा के लिए आधी रात को सुनवाई की थी

नई दिल्ली. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनों में हिंसा, भड़काऊ बयानों और इस पर पुलिस कार्रवाई को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट में अलग-अलग सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के मौजूदा हालात पर सख्त टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि दिल्ली की हिंसा में लोगों की मौत से हैरान हैं। पुलिस ने पेशेवर तरीके से कार्रवाई नहीं की, हमें ब्रिटिश पुलिस से सीख लेनी चाहिए। ब्रिटेन और अमेरिका की पुलिस को कार्रवाई के लिए इधर-उधर नहीं देखना पड़ता है, वहीं केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर का ट्रांसफर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में कर दिया है।


जस्टिस एस मुरलीधर ने सीएए के विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा में घायलों को सुरक्षा और बेहतर इलाज के लिए अपने घर पर आधी रात को सुनवाई की थी। इसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस को आदेश दिया था कि वह मुस्तफाबाद के एक अस्पताल से एंबुलेंस को सुरक्षित रास्ता दे और मरीजों को सरकारी अस्पताल में शिफ्ट कराए। वहीं, उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा और भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं पर कार्रवाई के लिए दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई। पूछा- क्या हिंसा भड़काने वालों पर तुरंत एफआईआर दर्ज करना जरूरी नहीं है? हिंसा रोकने के लिए तुरंत कड़े कदम उठाने की जरूरत है। दिल्ली में एक और 1984 नहीं होना चाहिए। जिन्हें Z सिक्युरिटी मिली है, वे भरोसा जगाने के लिए लोगों तक पहुंचें।

शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट... मध्यस्थता से कोई रास्ता नहीं निकला
शाहीन बाग से प्रदर्शनकारियों को दूसरी जगह शिफ्ट कर रास्ता खुलवाने के मामले में कोर्ट ने आज कोई अहम आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थों की रिपोर्ट देखकर लगता है कि प्रदर्शनकारियों से बातचीत में कोई हल नहीं निकला। ऐसे माहौल में सुनवाई करना ठीक नहीं है। इस मामले में अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त मध्यस्थ वकील साधना रामचंद्रन और संजय हेगड़े ने चार दिन तक शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों से चर्चा कर सोमवार को सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी थी।

दिल्ली की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट... पुलिस ने वक्त रहते एक्शन नहीं लिया 
जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा- "पुलिस की निष्क्रियता के बारे में कुछ कहना चाहता हूं। अगर मैं यह नहीं कहूंगा तो अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं कर पाऊंगा। इस देश के प्रति, संस्थान के प्रति मेरी निष्ठा है। पुलिस की तरफ से इस मामले में स्वतंत्रता और प्रोफेशनलिज्म की कमी रही। 13 लोगों की मौत ने मुझे परेशान कर दिया।'' तभी एक वकील ने उन्हें बताया कि हिंसा में अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद जस्टिस जोसेफ ने कहा- "पूरे मामले में दिल्ली पुलिस ने समय रहते कार्रवाई नहीं की। अगर पहले ही कार्रवाई की होती, तो ऐसे हालात पैदा नहीं होते। आप देखिए ब्रिटेन की पुलिस कैसे कार्रवाई करती है। अगर कोई लोगों को भड़काने की कोशिश करता है, तो ब्रिटेन पुलिस तुरंत कार्रवाई करती है। वह आदेश का इंतजार नहीं करती। ऐसे हालातों में पुलिस को आदेश के लिए इधर-उधर नहीं देखना चाहिए।''

पुलिस का पक्ष: इस टिप्पणी पर पुलिस की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता कहा कि पुलिस पर सवाल उठाने का यह सही समय नहीं है। इससे पुलिसकर्मियों में हताशा बढ़ेगी। उन्होंने कहा- "डीसीपी को भीड़ ने मारा। वे अभी वेंटिलेटर पर हैं। हम जमीनी हालातों से वाकिफ नहीं हैं। पुलिस किन हालातों में काम करती है।'' उन्होंने बेंच से उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसक घटनाओं की मीडिया रिपोर्टिंग रोकने की मांग की। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट आदेश दे कि जजों की टिप्पणी को मीडिया में हेडलाइन न बनाया जाए।

दिल्ली की हिंसा पर हाईकोर्ट... क्या हिंसा भड़काने वालों पर एफआईआर जरूरी नहीं?
हाईकोर्ट के एस जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई और कोर्ट रूम में भाजपा नेता कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण का वीडियो चलवाया। पुलिस से पूछा- "क्या यह जरूरी नहीं है कि हिंसा भड़काने वालों पर तुरंत एफआईआर दर्ज हो? अब हालात नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं। भड़काऊ भाषणों के वीडियो वायरल हैं। सैकड़ों लोगों ने इन्हें देखा। तब भी आप सोचते हैं कि यह एफआईआर दर्ज करना जरूरी नहीं है? पुलिस कमिश्नर सभी वीडियो क्लिप देखकर एफआईआर दर्ज कराएं और गुरुवार तक कोर्ट को बताएं। लोगों को भरोसा होना चाहिए कि वे सुरक्षित हैं। नौकरशाही की बजाय लोगों की मदद होनी चाहिए। घायलों को बचाने के मामले में पुलिस ने तुरंत एक्शन लेकर अच्छा काम किया। जो जेड सिक्युरिटी के साथ चलते हैं और जो ऊंचे ओहदों पर बैठे हैं, उन्हें लोगों तक पहुंचना चाहिए ताकि कानून अपना काम कर रहा है, इसका भरोसा पैदा हो। अधिकारियों और अमन कमेटी को लोगों से बातचीत कर हालात सामान्य करने की कोशिश करना चाहिए। दिल्ली सरकार हिंसा के पीड़ितों को मुआवजा सुनिश्चित करे।''

पुलिस का पक्ष: इस पर पुलिस की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वे कल इस बारे में बताएंगे। मैंने अभी तक वीडियो नहीं देखे हैं। इस पर कोर्ट ने वहां मौजूद डीसीपी (क्राइम ब्रांच) राजेश देव से पूछा कि क्या आपने वीडियो देखे हैं? इस पर डीसीपी ने जवाब दिया कि उन्होंने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के दो वीडियो देखे हैं, लेकिन कपिल मिश्रा का वीडियो नहीं देखा। इस पर हाईकोर्ट ने कहा- यह बहुत चिंताजनक है। ऑफिस में कई सारे टीवी हैं। पुलिस अधिकारी कैसे कह सकते हैं कि उन्होंने वीडियो नहीं देखे। हम पुलिस की कार्रवाई से हैरान हैं। मेहता ने कहा- पुलिस पिकनिक पर नहीं गई है। वे एसिड अटैक झेल रहे हैं।

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