सुप्रीम कोर्ट / मौत की सजा के मामलों में सुनवाई की गाइडलाइन तय, निर्भया के दोषियों की फांसी में देरी को देखते हुए फैसला

SC issues guidelines on listing of criminal appeals involving death penalty
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SC issues guidelines on listing of criminal appeals involving death penalty

  • केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि मृत्युदंड के मामले में क्यूरेटिव पिटीशन, दया याचिका दायर करने की समय सीमा तय हो
  • सुप्रीम कोर्ट ने सर्कुलर जारी कर कहा कि हाईकोर्ट में मौत की सजा पर मुहर लगने के 6 महीने के अंदर 3 जजों की बेंच मामले को देखेगी

दैनिक भास्कर

Feb 15, 2020, 12:28 PM IST

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा से जुड़े आपराधिक मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए नई गाइडलाइन तय की हैं। शुक्रवार को कोर्ट ने ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए 6 महीने की समय सीमा निर्धारित की है। यानी जिस दिन हाईकोर्ट मौत की सजा के मामले में फैसला सुनाएगा, उस दिन से अगले 6 महीने के अंदर सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच उस मामले की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्भया मामले में दोषियों की फांसी में हो रही देरी को देखते हुए यह गाइडलाइन तय की हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इस मामले में सर्कुलर जारी किया। इसमें कहा गया- हाईकोर्ट ने जिस भी दिन आपराधिक मामले में दोषियों को मौत की सजा सुनाई और उनके लिए दूसरी कोर्ट में अपील दायर करने का रास्ता खोला, उस दिन से लेकर अगले 6 महीने में ही सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई कर लेगी, फिर चाहे उस मामले में दोषियों ने अपील दायर की हो या नहीं।

सभी दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट को सौंपने होंगे

सर्कुलर में आगे कहा गया, “जैसे ही सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दाखिल की जाएगी, वैसे ही रजिस्ट्री मौत की सजा सुनाने वाली कोर्ट को 60 दिन (या जो भी समय अदालत तय करे) के अंदर सभी दस्तावेज भेजने का आदेश दे देगी। इससे जुड़े कोई अतिरिक्त दस्तावेज या जरूरत होने पर स्थानीय भाषाओं के दस्तावजों का ट्रांसलेशन भी रजिस्ट्री को देना होगा। अगर रजिस्ट्री को अन्य दस्तावेजों की जरूरत हुई, तो वह पक्षकारों को 30 दिन का अतिरिक्त समय देगी। अगर इसके बावजूद कुछ दस्तावेज नहीं मिलते हैं, तो मामले को जज के चैंबर में सूचीबद्ध किया जाएगा।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गाइडलाइन तय करने की अपील की

निर्भया केस में दोषियों की फांसी में देरी से देश में उपजी नाराजगी के बीच 22 जनवरी को केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। गृह मंत्रालय ने शीर्ष अदालत में दायर याचिका में कहा- मौत की सजा पर क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करने के लिए समय सीमा तय की जाए। डेथ वॉरंट मिलने के बाद 7 दिन में ही दया याचिका लगाने का नियम रहे। दया याचिका खारिज होने के बाद 7 दिन में डेथ वॉरंट और अगले 7 दिन में फांसी हो, भले ही बाकी दोषियों की कोई भी याचिका लंबित हो। मौजूदा गाइडलाइंस के मुताबिक, किसी भी दोषी की कोई भी याचिका लंबित होने पर उस केस से जुड़े बाकी दोषियों को भी फांसी नहीं दी जा सकती।

पीड़ित को ध्यान में रखकर प्रक्रिया में बदलाव करने की मांग की

गृह मंत्रालय ने अपनी याचिका में मौत की सजा के मामलों में कानूनी प्रावधानों को 'दोषी केंद्रित' के बजाए 'पीड़ित केंद्रित' करने की अपील की थी। इसका मतलब यह है कि मौत की सजा के मामलों में तय गाइडलाइंस को दोषी की जगह पीड़ित को ध्यान में रखते हुए बदला जाए। याचिका में कहा गया- वर्तमान कानून के गाइडलाइंस दोषी को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। इसके चलते वे सजा टालने के लिए कानूनी प्रावधानों से खिलवाड़ करते हैं। याचिका में मौत की सजा पाने वाले दोषी को मिले अधिकारों पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बदलाव की मांग की गई। जनवरी, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था- मौत की सजा पाए दोषी के भी कुछ अधिकार होते हैं और उसकी दया याचिका खारिज होने के 14 दिन बाद ही उसे फांसी दी जाए।

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