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सुप्रीम कोर्ट में इमरजेंसी का मामला:आपातकाल लगाए जाने पर 45 साल बाद सुनवाई करना व्यावहारिक है या नहीं, अदालत करेगी फैसला

नई दिल्लीएक महीने पहले
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इंदिरा गांधी सरकार में 45 साल पहले लगाए गए आपातकाल के मुद्दे पर सुनवाई की जाए या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगी। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
इंदिरा गांधी सरकार में 45 साल पहले लगाए गए आपातकाल के मुद्दे पर सुनवाई की जाए या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट फैसला करेगी। (फाइल फोटो)

94 वर्षीय वीना सरीन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर 1975 में लगाए गए आपातकाल को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है। इंदिरा गांधी सरकार में 45 साल पहले लगाए गए आपातकाल के मुद्दे पर सुनवाई करना व्यावहारिक है या नहीं, इस पर अदालत फैसला करेगी। कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी कर उससे इस मामले में जवाब मांगा है।

बेंच ने याचिका पर सुनवाई के दौरान सवाल पूछा कि यह याचिका अतीत के गलियारे से उभरी है। याचिकाकर्ता के वकील मिस्टर हरीश साल्वे ने कहा है कि इतिहास की गलतियों को हर हाल में सुधारा जाना चाहिए। हम मिस्टर साल्वे से पूछते हैं कि क्या याचिकाकर्ता कोई और भी राहत चाहती हैं। साल्वे ने यह गलत कहा कि याचिकाकर्ता मुख्य मुद्दा नहीं हैं। पहलू पर तो हम इसे दोबारा सुनने को तैयार नहीं होंगे। 45 साल बाद ये उचित नहीं है कि इसे दोबारा खोला जाए। हालांकि, हम यह देखेंगे कि इतने लंबे बाद इस तरह के ऐलान पर सुनवाई करना ठीक है या नहीं।

याचिकाकर्ता ने कहा- जीवन गरीबी और प्रताड़नाओं के दुख में गुजारा
वीरा सरीन ने कहा- मैंने ये याचिका इसलिए दाखिल की है, क्योंकि मैंने, मेरे दिवंगत पति और परिवार ने अपना जीवन भर गरीबी और प्रताड़नाओं के दुख में गुजारा है। मुझे और मेरे पति को जेल में डाल दिए जाने के डर से देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। आपातकाल में मेरे पति पर झूठे आरोप लगाकर हिरासत में लेने के आरोप लगाए गए थे। इमरजेंसी से पहले दिल्ली के करोलबाग में मेरे पति का कीमती स्टोंस का बिजनेस था।

इतिहास को सुधारा न जाए तो ये खुद को दोहराता है- हरीश साल्वे
जस्टिस कौल ने कहा कि इतिहास में कुछ हुआ था और 45 साल बाद हम इस मुद्दे को देखें। इस पर साल्वे ने एडवोकेट दलील दी, "शायद यही सही वक्त है। 45 साल पहले आपने एक फैसला भी बदला था। इतिहास में शक्तियों के गलत इस्तेमाल में सुधार होना जरूरी है। आप क्या राहत देते हैं, ये एक अलग मुद्दा है। एक बार देश को जरूर पता लगना चाहिए कि मौलिक अधिकारों को ताक पर रख दिया गया था।''

उन्होंने कहा, ''इतिहास में कुछ चीजें होती हैं, जिन्हें हम दोबारा देखते हैं और सोचते हैं कि सही चीजें होनी चाहिए थीं। ये ऐसा ही मसला है। युद्ध के दौरान अपराधों पर अभी भी सुनवाई होती है। जेंडर से जुड़े संवेदनशील मसलों पर होती है। नए लोकतंत्र के अधिकारों का 19 महीने तक अपमान हुआ। इतिहास को सुधारा न जाए तो ये खुद को दोहराता है।''

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