आर्म्ड फोर्सेज में अफसरों के व्यभिचार पर सुनवाई:SC ने कहा- ऐसे अफसरों के खिलाफ एक्शन के लिए मैकेनिज्म बने, इससे डिसिप्लिन पर असर

नई दिल्ली2 महीने पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि व्यभिचार के लिए आर्मी अफसरों के खिलाफ डिसिप्लिनरी एक्शन के लिए आर्म्ड फोर्सेज के पास किसी प्रकार का मैकेनिज्म होना चाहिए। अदालत ने कहा कि यह एक ऐसा आचरण है जो अधिकारियों के जीवन बर्बाद कर सकता है। इससे आर्म्ड फोर्सेज के डिसिप्लिन पर भी असर पड़ता है।

अदालत ने कहा कि व्यभिचार एक परिवार को अलग कर देता है। इस तरह के मामलों को हल्के में नहीं लेना चाहिए। आर्म्ड फोर्सेज में अनुशासन सबसे अहम है। हर कोई समाज की एक इकाई के तौर पर परिवार पर निर्भर है। समाज की अखंडता एक पति या पत्नी की दूसरे के प्रति वफादारी पर आधारित है।

केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई
बेंच ने ये बातें केंद्र सरकार की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कही। याचिका में 2018 के फैसले में IPC के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखते हुए स्पष्टीकरण मांगा गया था। इसमें कहा गया था कि यह आर्म्ड फोर्सेज पर लागू नहीं होना चाहिए। इसमें अपने साथी कर्मी की पत्नी के साथ व्यभिचार का मामला शामिल है।

केंद्र ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 33 के मुताबिक आर्म्ड फोर्सेज के सदस्यों के मौलिक अधिकारों का आवेदन प्रतिबंधित है। इस याचिका में कहा कि कि शीर्ष अदालत ने 2018 में एक फैसला दिया था, जिसमें व्यभिचार पर डिसिप्लिनरी एक्शन असंवैधानिक घोषित किया था। इस फैसले को दोषियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही रोकने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।

व्यभिचार के कारण परिवार टूटते जाते हैं
जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली एक संविधान पीठ ने मौखिक तौर पर कहा- आप सभी वकील उस गहरे दर्द से परिचित हैं जो व्यभिचार एक परिवार में पैदा करता है। हमने देखा है कि व्यभिचार के कारण परिवार कैसे टूटते हैं। हम आपको सिर्फ इतना बता रहे हैं कि इसे हल्के-फुल्के अंदाज में न लें। हमने हाई कोर्ट्स में जज के तौर पर कई सेशन बुलाए हैं।

जस्टिस जोसेफ ने बताया कि एक मां ने व्यभिचार के बाद अपने बच्चों की कस्टडी की मांग करते हुए एक याचिका दायर की। बच्चों ने मां से बात करने से इनकार कर दिया। यदि आपके पास अनुभव है तो आप जानते होंगे कि व्यभिचार होने पर परिवार में क्या होता है। इस बेंच में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस ऋषिकेश रॉय, और जस्टिस सी.टी. रविकुमार शामिल थे।

अदालत से 2018 के फैसले का स्पष्टीकरण मांगा गया था
शीर्ष अदालत ने 2018 में NRI जोसेफ शाइन की ओर से दाखिल याचिका पर IPC की धारा 497 को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया था। धारा 497 व्यभिचार से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए बनाई गई थी। केंद्र की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल माधवी दीवान ने 2018 के फैसले के स्पष्टीकरण की मांग करने वाली याचिका दायर की थी।

रक्षा मंत्रालय (MoD) ने यह कहते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था कि व्यभिचार को अपराध के तौर शामिल करने का 27 सितंबर, 2018 का फैसला आर्म्ड फोर्स के अफसरों को व्यभिचारी गतिविधियों के लिए दोषी ठहराए जाने के रास्ते में आ सकता है। दीवान ने पीठ को बताया कि व्यभिचार के लिए कुछ सैन्य कर्मियों के खिलाफ डिसिप्लिनरी एक्शन लिए गए थे। हालांकि, आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) ने जोसेफ शाइन के फैसले का हवाला देते हुए कई मामलों में ऐसी कार्यवाही को रद्द कर दिया था।

6 दिसंबर को होगी मामले की सुनवाई
दीवान ने कहा- धारा 497 को खत्म करने से आर्म्ड फोर्स के अधिकारियों के खिलाफ अनुचित आचरण के लिए कार्रवाई करने में बाधा नहीं आएगी। आर्मी में लिए गए डिसिप्लिनरी एक्शन जेंडर न्यूट्रल है। अगर कोई महिला अफसर व्यभिचारी गतिविधियों में लिप्त पाई जाती है, तो उसे कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

इस पर अदालत ने कहा कि 2018 के फैसले में ऐसा कुछ भी नहीं है जो आर्म्ड फोर्सेस को रोकता है। यह AFT के व्यक्तिगत आदेशों को चुनौती दे सकता है। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने अदालत से 2018 के फैसले को विस्तार से देखने के लिए समय मांगा। इसके बाद SC ने मामले की सुनवाई के लिए 6 दिसंबर की तारीख तय की है।