अयोध्या / हाईकोर्ट में मुस्लिमों की दलील थी- 1934 तक नमाज पढ़ी गई, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अंग्रेजों के जमाने से पहले हिंदुओं की पूजा के साक्ष्य



Supreme court verdict on Sunni Central Waqf Board argument on ayodhya case
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Supreme court verdict on Sunni Central Waqf Board argument on ayodhya case

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को विवादित जमीन का तीसरा हिस्सा सौंपा था, यह बाहरी हिस्सा था
  • सुप्रीम कोर्ट में 6 अगस्त 2019 से शुरू हुई सुनवाई में मुस्लिम पक्ष ने हिंदू पक्ष के दावों को आस्था पर आधारित बताकर नकारा
  • मुस्लिम पक्ष ने विवादित जमीन के मस्जिद होने, वहां पर नमाज पढ़े जाने और वहां मंदिर न होने की दलीलें पेश कीं 

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 09:05 PM IST

नई दिल्ली. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को अपने फैसले में अयोध्या की 2.77 एकड़ विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटा था। तीन गुंबद वाले ढांचे के केंद्रीय गुंबद वाला हिस्सा हिंदुओं को दिया गया, यहां रामलला विराजमान हैं। निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरा और सीता रसोई वाला हिस्सा दिया गया और मुस्लिम पक्ष को बाहरी हिस्सा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पूरी 2.77 एकड़ जमीन रामलला को सौंप दी।


विवादित स्थान राम जन्मभूमि या मस्जिद?

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला : तीन सदस्यीय बेंच के इस पर अलग-अलग मत थे। जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने केंद्रीय गुंबद के नीचे वाले क्षेत्र को भगवान राम का जन्मस्थान माना था। यह भी माना था कि विवादास्पद स्थान हमेशा मस्जिद की तरह माना गया। जस्टिस एसयू खान के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण बाबर के आदेश पर हुआ। 1934 तक यहां रोजाना नमाज पढ़ी जाती थी। प्राचीन समय में मंदिर भी था। वहीं जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने पूरे विवादित स्थल को भगवान राम का जन्मस्थान माना था। कहा था- विवादित इमारत का ढांचा इस्लामी कानून के खिलाफ था और इस्लामी मूल्यों के अनुरूप नहीं था।


सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें : बाबरनामा के अनुसार मस्जिद को बाबर के आदेश पर उसके कमांडर मीर बकी ने बनवाया था। तीन शिलालेखों में भी इसका जिक्र है। इन शिलालेखों पर हिंदुओं ने आपत्तियां जरूर उठाई हैं। लेकिन, यह सही नहीं, क्योंकि इनका जिक्र विदेशी यात्रियों के वर्णन और गजेटियरों में है। इतिहासकार विलियम फॉस्टर ने विवादित जगह पर मस्जिद की बात कही है। विवादित स्थल पर मंदिर का कोई सबूत नहीं है।

 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला : विवादित जमीन भगवान राम का जन्मस्थान। कोर्ट ने कहा- ढहाया गया ढांचा भगवान राम का जन्मस्थान है, हिंदुओं की यह आस्था निर्विवादित है। विवादित ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इसके पुरातत्व प्रमाण मिले हैं।


मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई?

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला : जस्टिस सुधीर अग्रवाल और धर्मवीर शर्मा ने माना था कि विवादित ढांचा पुराने ढांचे को तोड़कर बनाया गया था। जस्टिस एसयू खान ने कहा था- मस्जिद के निर्माण के लिए कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया। जब बाबर के काल में मस्जिद बनाई गई, तब इसके राम जन्मभूमि होने का भी कोई दावा नहीं किया गया था।     

 

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें : मंदिर का कोई प्रमाण ही नहीं तो तोड़ने का सवाल भी नहीं उठता। अगर वहां मंदिर था तो वह किस तरह का मंदिर था। गवाहों द्वारा मंदिर को लेकर दिए गए बयान अविश्वसनीय हैं। 

 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला : विवादित ढांचे के नीचे एक मंदिर था, इसके पुरातत्व प्रमाण मिले हैं। यह सबूत नहीं है कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई, लेकिन इसके निर्माण में जो शिलालेख उपयोग किए गए, वह प्राचीन मंदिरों के शिलालेखों से मिलते हैं। 


विवादित जगह पर नमाज और पूजा कब से?

इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला : जस्टिस एसयू खान ने अपने फैसले में कहा, 1934 तक यहां रोजाना नमाज पढ़ी जाती थी। जस्टिस अग्रवाल ने भी नमाज पढ़े जाने की बात कही। जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने विवादित स्थल को मस्जिद मानने से ही इनकार किया। तीनों ही जजों ने मंदिर के बाहरी प्रांगण में हिंदुओं द्वारा पूजा की बात भी मानी।


सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें : मस्जिद का निर्माण ही नमाज के लिए हुआ था। हमेशा से यहां नमाज अता की जाती रही। 1934 की हिंसा के बाद नमाज पढ़ने से रोका जाने लगा। हिंदू पक्षकारों की पूजा पर दलील दी कि गर्भगृह में 1949 में मूर्ति रखी गई, इससे पहले वहां पूजा का कोई सबूत नहीं। परिक्रमा भी बाद में शुरू हुई और यह भी साबित नहीं करता कि यह स्थान राम जन्मभूमि ही है।

 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला : यह सबूत मिले हैं कि राम चबूतरा और सीता रसोई पर हिंदू अंग्रेजों के जमाने से पहले भी पूजा करते थे। 1856-57 तक विवादित स्थल पर नमाज पढ़ने के सबूत नहीं है।  

 

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