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गंगा में बह रही लाशों की बेकदरी पर पुरोहित बोले:सरकार की जिम्मेदारी है कि मरे हुए व्यक्ति का मर्यादा के साथ अंतिम संस्कार हो, नहीं तो ग्रहदोष सब पर लगेगा

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे मिली लाशों से पूरा देश हैरान है। ऐसे समय में अंतिम क्रिया में मदद करने वाले पुरोहित भी मृत शरीर के इस अपमान से झल्लाए हैं। उनका कहना है कि शवों के इस तरह हो रहे अपमान के लिए जिम्मेदार लोगों पर ग्रहों का भारी दोष लगेगा।’ कानपुर के आचार्य हिमांशु 'उपमन्यु' कहते हैं, 'व्यक्ति के 16 संस्कार होते हैं। मरने के बाद 16वां संस्कार ही अंतिम क्रिया है। शास्त्रों में दी गई विधि के मुताबिक अंतिम संस्कार न करने पर परिवार के ऊपर भारी दोष लगता है। यह दोष एक ही पीढ़ी तक सीमित नहीं रहता बल्कि सात पीढ़ी तक लगता है।

इसके साथ ही ठीक से अंतिम संस्कार न कराने वाले उस पंडित पर भी दोष लगता है जिसने इसके लिए दान-दक्षिणा ली हो। हम जीवित रहते सरकार को कई तरह का टैक्स देते हैं। इलाज के लिए अस्पताल को भारी-भरकम फीस भरते हैं। लिहाजा अगर मौत अस्पताल में हो गई हो और उसके परिजन उसे लेने न आएं और उस शव का सम्मान के साथ संस्कार न हो तो दोष परिवार के साथ उस अस्पताल मालिक पर भी लगता है। पंडित से लेकर अस्पताल तक की यह ड्यूटी है कि मृत शरीर का अंतिम संस्कार हो, सरकार की जिम्मेदारी है कि टैक्स चुकाने वाले उस व्यक्ति के मृत शरीर की मर्यादा के साथ अंतिम विदाई हो।

अंतिम संस्कार और श्राद्ध नहीं हो तो परिवार को पितृ दोष लगता है
हालांकि वे आचार्य यह भी कहते हैं, 'गंगा में 5 साल से कम उम्र के बच्चे या फिर ऐसे लोगों के शव बहाने का हिंदू धर्म में प्रावधान है जिनका यज्ञोपवीत न हुआ हो। सन्यासी भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस प्रक्रिया को 'जल दाग' कहते हैं, लेकिन जल दाग के पहले भी कुछ संस्कार होते हैं जिन्हें करना जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता तो उत्तराधिकारी और जिम्मेदार संस्था पर दोष लगेगा।’ पंडित हिमांशु कहते हैं, 'यह दोष और गहरा तब हो जाता है जब अकाल मृत्यु होती है। मतलब ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक निर्धारित आयु के विपरीत किसी दुर्घटना या बीमारी से असमय मौत।

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाराष्ट्र के नासिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर में 'पितृ दोष' यानी मृत आत्माओं का शांति पूजन कराने वाले पंडित रतीश देशपुत्रे कहते हैं, ' कोरोना में ज्यादातर लोग अकाल मृत्यु मर रहे हैं। जिन शवों का ठीक से अंतिम संस्कार और श्राद्ध नहीं होता उनके परिवार को पितृ दोष लगता है।’

वे कहते हैं, 'जो भी व्यक्ति मृत व्यक्ति का उत्तराधिकारी है या सगा संबंधी है, अगर उसने जानबूझकर शव का दाह संस्कार ठीक से नहीं किया है तो उसे दोष लगता है, इतना ही नहीं अनजाने में भी किसी परिवार के व्यक्ति की अकाल मृत्यु होने पर उसका संस्कार अगर नहीं हो पाता तो उस पर भी उत्तराधिकारी को ग्रह दोष लगता है।' शव का सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार न हो तो भारी ग्रह हानि का उल्लेख 'गरुड़ पुराण' में है।’

अंतिम संस्कार का क्या महत्व है?
आचार्य हिमांशु उपमन्यु गरुड़ पुराण के सातवें अध्याय के 41वें श्लोक से समझाते हैं,-'यस्य न स्यान्महाराज श्राद्धं मासिकषोडश। प्रेतत्वं सुस्थिरंम तस्य।' यानी जिस मृत शरीर के अंतिम संस्कार के बाद भी 16 श्राद्ध नहीं होते उसकी आत्मा प्रेत बनकर घूमती रहती है। हिंदू धर्म में, तेरहवीं होने तक दो संस्कार और फिर साल भर में बचे हुए 14 श्राद्ध करने का प्रावधान है। फिर यहां तो मृतात्मा को चिता तक नसीब नहीं हो रही। पुरोहित समाज उमीद करते है कि जो कर्मकांड मानते हैं, उस परिवार के लोग गंगा में इस तरह शव नहीं बहाएंगे।

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