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इतिहास में आज:आज ही हुई थी भारत के अंतरिक्ष सफर की शुरुआत, अपने पहले उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ को भेजा था अंतरिक्ष में

8 महीने पहले
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आज दुनियाभर में कहीं भी अंतरिक्ष की बात हो तो भारत का जिक्र जरूर किया जाता है। पिछले कुछ सालों में भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष मामलों में भारत को दुनिया के अग्रणी देशों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। दुनिया के कई देश अपने उपग्रह अंतरिक्ष में लॉन्च करने के लिए भारत की मदद लेते हैं। हाल ही में ISRO ने एक साथ 104 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में लॉन्च करने का कारनामा भी किया है। भारत के अंतरिक्ष सफर की शुरुआत आज ही के दिन 1975 में हुई थी, जब भारत ने अपना पहला उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ अंतरिक्ष में लॉन्च किया था।

रूस के साथ मिलाया था हाथ

आर्यभट्ट का निर्माण पूरी तरह भारत में ही किया गया था, लेकिन तब भारत के पास उपग्रह लॉन्च करने के लिए जरूरी संसाधन नहीं थे। इसके लिए भारत ने सोवियत संघ से समझौता किया। डील ये हुई कि सोवियत संघ भारत के सैटेलाइट को अपने रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष में लॉन्च करेगा, बदले में भारत सोवियत संघ को अपने बंदरगाहों का इस्तेमाल जहाजों को ट्रैक करने के लिए करने देगा।

लॉन्चिंग के 5वें दिन ही टूटा संपर्क

भारत ने आर्यभट्ट को सफलतापूर्वक लॉन्च तो कर दिया, लेकिन 4 दिन बाद ही कुछ गड़बड़ियां सामने आने लगीं। 5वें दिन सैटेलाइट से संपर्क टूट गया। 17 साल बाद 10 फरवरी 1992 को उपग्रह पृथ्वी के वातावरण में वापस लौट आया।

आर्यभट्ट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना भारत और सोवियत संघ दोनों के लिए बड़ी उपलब्धि थी। रिजर्व बैंक ने इस ऐतिहासिक दिन को सेलिब्रेट करने के लिए 1976 और 1997 के 2 रुपए के नोट पर सैटेलाइट की तस्वीर भी लगाई। देश के पहले सैटेलाइट आर्यभट्ट को महान खगोलविद और गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था।

1775 में हुई अमेरिकी क्रान्ति के दौरान अमेरिकी सेना का नेतृत्व जनरल जॉर्ज वाशिंगटन ने किया। 1789 में वो अमेरिका के पहले राष्ट्रपति चुने गए।
1775 में हुई अमेरिकी क्रान्ति के दौरान अमेरिकी सेना का नेतृत्व जनरल जॉर्ज वाशिंगटन ने किया। 1789 में वो अमेरिका के पहले राष्ट्रपति चुने गए।

1775: अमेरिकी क्रांति की शुरुआत

अमेरिका के स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत 19 अप्रैल 1775 को हुई थी। उस समय अमेरिकी महाद्वीप पर इंग्लैंड का कब्जा था। अंग्रेजों ने इस महाद्वीप पर 13 उपनिवेश स्थापित किए थे। इंग्लैंड द्वारा इन 13 उपनिवेशों का शोषण किया जाता था। सभी नीतियां इंग्लैंड द्वारा बनाई जाती थीं। 1775 से 1783 तक चले इस संघर्ष में इन 13 कॉलोनियों ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। अंतत: इन्हें स्वतंत्रता मिली और संयुक्त राज्य अमेरिका का गठन हुआ। इस संग्राम को 'क्रांतिकारी युद्ध' या 'अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम' भी कहते हैं।

इस पूरी क्रान्ति के दौरान अमेरिकी सेना का नेतृत्व जनरल जॉर्ज वाशिंगटन द्वारा किया गया। बाद में उन्हें 1789 में अमेरिका का पहला राष्ट्रपति चुना गया। 14 दिसम्बर 1799 को वाशिंगटन की मृत्यु हो गई। उन्हें वर्तमान अमेरिका का राष्ट्र-निर्माता कहा जाता है। अमेरिका के वाशिंगटन शहर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।

थ्योरी ऑफ एवोल्यूशन देने वाले चार्ल्स डार्विन का निधन आज ही के दिन 1882 में हुआ था।
थ्योरी ऑफ एवोल्यूशन देने वाले चार्ल्स डार्विन का निधन आज ही के दिन 1882 में हुआ था।

1882: चार्ल्स डार्विन का निधन

साल 1859 में 'ओरिजिन ऑफ स्पीशीज' नामक एक किताब छपी जिसने दुनिया के बारे में सोच बदल दी। इस किताब पर उस वक्त बेहद हंगामा हुआ। किताब ने धार्मिक मान्यताओं को बुरी तरह खारिज किया था। किताब ने दावा किया था कि विज्ञान के तथ्यों के मुताबिक दुनिया किसी चमत्कार से नहीं बनी।

इस किताब के लेखक थे चार्ल्स डार्विन। उनका जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शोर्पशायर में हुआ था। उनके पिता रॉबर्ट डार्विन डॉक्टर थे। बचपन से ही चार्ल्स डार्विन प्रकृति और पशु-पक्षियों को निहारने और फूल-पत्तियों के नमूने इकट्ठा करने में अपना समय गुजारा करते थे। उनके पिता चाहते थे कि बेटे को भी अपनी ही तरह डॉक्टर बनाऊं। इसके लिए उन्होंने चार्ल्स का दाखिला मेडिकल कॉलेज में कराया, लेकिन वहां चार्ल्स का मन नहीं लगा और उन्होंने बीच में ही मेडिकल की पढ़ाई छोड़ दी। वनस्पति शास्त्र में उनकी रुचि को देखते हुए बाद में उनका दाखिला कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में कराया गया, जहां से 1831 में चार्ल्स डार्विन ने डिग्री प्राप्त की।

जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण थ्योरीज देने वाले डार्विन को 'जीवन की उत्पत्ति' के बारे में मूलभूत सिद्धांतों के लिए जाना जाता है। पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत और विकास के बारे में डार्विन ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तथ्यों के आधार पर जिन थ्योरीज को दिया, उन्होंने कई मान्यताओं को हिला दिया था। आज ही के दिन 1882 में इस महान वैज्ञानिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

2011 में आज ही के दिन क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा की केन्द्रीय समिति में 45 वर्षों तक बने रहने के बाद इस्तीफा दिया था।
2011 में आज ही के दिन क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ क्यूबा की केन्द्रीय समिति में 45 वर्षों तक बने रहने के बाद इस्तीफा दिया था।

19 अप्रैल के दिन इतिहास में और क्या-क्या हुआ था

2008: पाकिस्तान ने परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम 2000 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्र शाहीन-2 का सफल परीक्षण किया।

2007: द विजार्ड ऑफ आईडी सीरीज के कार्टूनिस्ट ब्रैंड पार्कर का निधन।

2005: जर्मनी के कार्डिनल योसिफ रान्सिंगर रोमन कैथोलिक चर्च के नए पोप चुने गए।

1977: भारत की प्रसिद्ध एथलेटिक्स खिलाड़ी अंजू बॉबी जॉर्ज का जन्म।

1972: बांग्लादेश राष्ट्रमंडल का सदस्य बना।

1971: भारत ने वेस्टइंडीज को हराकर टेस्ट क्रिकेट सीरीज जीती।

1936: फिलस्तीन में यहूदी विरोधी दंगे शुरू हुए।

1933: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सैयद हसन इमाम का निधन।

1919: अमेरिका के लेस्ली इरविन ने पैराशूट से पहली बार छलांग लगाई।

1864: पंजाब के प्रसिद्ध आर्य समाजी नेता, समाज सुधारक और शिक्षाविद महात्मा हंसराज का जन्म।

1451: बहलोल लोदी ने दिल्ली पर कब्जा किया।