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आज का इतिहास:गोरखा रेजिमेंट का गठन; अगर कोई कहे कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह झूठ बोल रहा है या गोरखा है

5 महीने पहले
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भारतीय सेना के फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ कहते थे कि “अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तो वह झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा है।” अपनी बहादुरी के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध गोरखा आज ही के दिन 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़े थे। ब्रिटिश सरकार ने आगे चलकर गोरखा योद्धाओं की अलग रेजिमेंट बनाई और आजादी के बाद गोरखा भारतीय सेना का हिस्सा बनें।

बात 1814 की है। भारत अंग्रेजों के कब्जे में था। अंग्रेज चाहते थे कि नेपाल पर भी उनका कब्जा हो जाए इसलिए अंग्रेजों ने नेपाल पर हमला कर दिया। करीब डेढ़-दो साल युद्ध चलता रहा। आखिरकार सुगौली की संधि हुई और युद्ध थमा। पूरे युद्ध में ब्रिटिश जनरल डेविड ओक्टलोनी गोरखा सैनिकों की बहादुरी से खासे प्रभावित हुए। उन्होंने सोचा कि इतने बहादुर सैनिकों को क्यों न ब्रिटिश सेना में भर्ती किया जाए? नेपाल से समझौते के बाद 24 अप्रैल 1815 को नई रेजिमेंट बनाई गई जिसमें गोरखाओं को भर्ती किया गया। इसके बाद से गोरखा ब्रिटिश सेना में भर्ती होते रहे।

साल 1947 में भारत ब्रिटिश हुकूमत से आजाद हुआ। आजादी के वक्त तक ब्रिटिश सेना में 10 गोरखा रेजिमेंट थी। अंग्रेजों ने फैसला किया कि 10 में 6 रेजिमेंट भारत को दे दी जाएगी और बाकी 4 अंग्रेज अपने साथ ले जाएंगे। उन 4 रेजिमेंट के गोरखाओं ने अंग्रेजों के साथ जाने से इनकार कर दिया। भारत ने 11वीं रेजिमेंट बनाई। 1950 में भारत गणराज्य बन गया, तब इसका नाम गोरखा राइफल्स रखा गया। भारत, नेपाल और अंग्रेजों के बीच एक समझौता हुआ जिसके मुताबिक भारत की सेना में गोरखाओं की भर्ती होती रहेगी।

भारत के लिए गोरखा जवानों ने पाकिस्तान और चीन के खिलाफ हुई सभी जंग में शत्रु को अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया। गोरखा रेजिमेंट को इन युद्धों में कई परम वीर चक्र तथा महावीर चक्र मिले। गोरखा सैनिकों ने भारतीय शांति सेना के रूप में भी विभिन्न देशों में अपनी बहादुरी का परिचय दिया। इस रेजिमेंट का आदर्श वाक्य है “कायर हुनु भन्दा मर्नु राम्रो” यानी "कायर होने से मरना बेहतर है"।

हर साल 1200 से 1300 नए गोरखा सैनिक हमारी सेना में शामिल किए जाते हैं। भारतीय सेना में फिलहाल 7 गोरखा रेजिमेंट है। हालांकि, नेपाल से आने वाले सभी नेपाली बोलने वाले जवानों को गोरखा नहीं माना जाता। गोरखा वे ही हैं जो लिम्बू, थापा, मगर्स आदि जातियों से संबंध रखते हैं। इन सभी गोरखा जातियों की अपनी बोलियां हैं।

क्रिकेट के भगवान का जन्मदिन
साल 1973। आज ही का दिन। मुबंई के मराठी परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया सचिन, क्योंकि बच्चे के पिता को संगीतकार सचिन देव बर्मन बहुत पसंद थे। उस वक्त तक पिताजी भी नहीं जानते थे कि एक कलाकार के नाम पर जिस बच्चे का नाम रखा गया है, वो एक दिन अपनी कला से करिश्मा कर दिखाएगा।

सचिन बड़े हुए तो इनके पिता ने इनका दाखिला क्रिकेट के ‘द्रोणाचार्य’ कहे जाने वाले रमाकांत आचरेकर के यहां करा दिया जिन्होंने सचिन की क्रिकेट प्रतिभा को अच्छी तरह से निखारा। सचिन को गेंदबाजी का भी शौक था। बल्लेबाज बनने से पहले वे तेज गेंदबाज ही बनना चाहते थे। गेंदबाजी सीखने के लिए एक ट्रेनिंग कैंप में गए जहां उन्हें कोच डेनिस लिली ने कहा कि तुम अपना पूरा ध्यान बल्लेबाजी पर ही लगाओ। बस फिर क्या था। सचिन ने बल्लेबाजी पर ऐसा ध्यान लगाया कि आज पूरी दुनिया उन्हें अपनी कला का भगवान मानती है।

15 नवंबर 1989 को पहली बार सचिन भारत के लिए टेस्ट मैच खेलने मैदान पर उतरे थे। उस वक्त वह सिर्फ 16 वर्ष के थे। कराची के नेशनल स्टेडियम में खेले गए इस मैच में टीम इंडिया ने टॉस जीतकर पहले फील्डिंग करने का फैसला किया। पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए पहली पारी में 409 रन बनाए थे, जिसके जवाब में टीम इंडिया 262 रन ही बना पाई। सचिन महज 15 रन ही बना पाए और इनस्विंग गेंद पर क्लीन बोल्ड हो गए। सचिन को आउट करने वाला गेंदबाज भी अपना पहला मैच खेल रहा था। गेंदबाज का नाम था वकार यूनुस।

अब बात 2013 की। सचिन अपने टेस्ट क्रिकेट की आखिरी पारी खेल रहे थे। दिन था 15 नवंबर। वेस्टइंडीज के खिलाफ इस टेस्ट मैच में सचिन 74 रन बनाकर मैदान से लौटे। अगले ही दिन उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कह दिया। इसके साथ ही महान क्रिकेटर का 24 साल 1 दिन का टेस्ट क्रिकेट करियर खत्म हुआ।

रामधारी सिंह 'दिनकर' का निधन
हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक, कवि एवं निबंधकार रामधारी सिंह 'दिनकर' का आज ही के दिन 1974 में निधन हो गया था। 'राष्ट्रकवि दिनकर' को आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में जाना जाता हैं। उन्होंने राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत, क्रांति और संघर्ष की प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताओं को अपने साहित्य में स्थान दिया। इसकी एक मिसाल 70 के दशक में हुई क्रांति के दौरान देखने को मिली। जब दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने हजारों लोगों के समक्ष दिनकर की पंक्ति ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ पढ़ी और इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विद्रोह का शंखनाद किया।

दिनकर ने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का भी अध्ययन किया था। दिनकर का पहला काव्य संग्रह ‘विजय संदेश’ वर्ष 1928 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद उन्होंने कई रचनाएं की। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘हुंकार’ और ‘उर्वशी’ हैं। उन्हें वर्ष 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया।

देश-विदेश में घटी इन घटनाओं के लिए भी 24 अप्रैल को याद किया जाता है-

  • 2013ः ढाका में बिल्डिंग गिरी जिससे लगभग 1129 लोगों की मौत हो गई और 2500 से ज्यादा लोग घायल हो गए।
  • 2005: पोप बेनेडिक्ट XVI ने रोमन कैथोलिक चर्च के नए लीडर का कार्यभार औपचारिक तौर पर संभाला। उन्होंने पोप जॉन पॉल II से यह जिम्मेदारी ली।
  • 1998ः भारतीय क्रिकेट टीम ने शारजाह में ऑस्ट्रेलिया को छह विकेट से हराकर कोका कोला कप जीता।
  • 1990ः हबल स्पेस टेलीस्कोप को पृथ्वी की कक्षा में लॉन्च किया गया। पृथ्वी के वायुमंडल की अशुद्धियों से दूर 2.4 मीटर एपर्चर वाला यह टेलीस्कोप अब तक ब्रह्मांड के कई अनदेखे रहस्यों को सामने ला चुका है।
  • 1957ः स्वेज नहर को स्वेज संकट के बाद खोला गया। इजिप्ट के फ्रांस, यूके और इजरायल के साथ हुए विवाद के बाद इसे अक्टूबर 1956 में बंद कर दिया गया था। इजिप्ट ने इस नहर को नेशनलाइज्ड किया और यह बंद हो गई थी। हाल ही में एक बड़ा जहाज फंस जाने की वजह से भी स्वेज नहर बंद हुई थी।
  • 1926ः आज के ही दिन ट्रीटी ऑफ बर्लिन साइन की गई थी।