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इतिहास में आज:पत्नी के गहने गिरवी रखकर भारत को अपनी पहली फिल्म दिखाने वाले दादा साहेब का जन्मदिन

3 महीने पहले

मई 1910। बॉम्बे के अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में फिल्म दिखाई जा रही थी। फिल्म का नाम था ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’। जैसे ही फिल्म खत्म हुई दर्शकों में बैठा एक व्यक्ति जोर-जोर से तालियां बजाने लगा। उस व्यक्ति ने वहीं ये फैसला किया कि वो भी ईसा मसीह की तरह भारतीय पौराणिक किरदारों पर फिल्म बनाएगा। उस व्यक्ति के इस प्रण ने भारतीय सिनेमा की पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र को जन्म दिया। बनाने वाले का नाम था - धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें हम आज दादा साहेब फाल्के के नाम से जानते हैं और आज उनका 151वां जन्मदिन है।

कैसे बनी पहली फिल्म
दादा साहेब एक हरफनमौला व्यक्तित्व थे। फिल्में बनाने से पहले उन्होंने पेंटिंग, प्रिंटिंग जैसे कई काम किए। जब ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ देखी तो उन्होंने सब छोड़ फिल्में बनाने का फैसला लिया। उस जमाने में फिल्में बनाना आसान नहीं था। पैसा, कलाकार, इक्विपमेंट तमाम परेशानियां थीं, लेकिन प्रण लेने वाला व्यक्ति भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। दादा साहेब ने तमाम परेशानियों के बावजूद ये कारनामा कर दिखाया।

राजा हरिश्चंद्र की शुरुआत
फिल्म बनाने के लिए सबसे पहले पैसों की जरूरत थी। कला नई थी, कलाकार भी नया था, इसलिए कोई भी फिल्मों में पैसा नहीं लगाना चाहता था। लोगों को यकीन नहीं था कि दादा साहेब फिल्म बना भी पाएंगे! लेकिन दादा साहेब ने प्रोड्यूसर को यकीन दिलाने के लिए पौधों के विकास पर छोटी फिल्म बनाई। तब जाकर दो लोग उन्हें पैसा देने के लिए राजी हुए। पर ये काफी नहीं था। दादा साहेब ने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखे। संपत्ति भी गिरवी रखी। कर्ज भी लिया। दादा साहेब ने पैसों के लिए जो हो सकता था, वह सब किया। 1912 में फिल्म की तकनीक सीखने लंदन गए। वहां से एक कैमरा और फिल्म के लिए कुछ जरूरी सामान लेकर आए। फिल्म को बंबई में शूट करने का निर्णय लिया गया।

फिल्म में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी तारामती के रोल के लिए महिला अभिनेत्री की जरूरत थी। उस समय फिल्मों में काम करना एक सभ्य पेशा नहीं माना जाता था। कोई भी महिला रोल के लिए राजी नहीं हुई। थक-हारकर फाल्के रेड लाइट एरिया में गए। पर वहां कुछ नहीं हुआ। तब उन्होंने एक बावर्ची अन्ना सालुंके को तारामती के रोल के लिए चुना। उस समय मराठी थिएटर में महिलाओं की भूमिका भी पुरुष ही निभाते थे। इस फिल्म में भी ऐसा ही हुआ। फिल्म में राजा हरिश्चंद्र का किरदार दत्तात्रय दामोदर, उनके बेटे रोहित का किरदार दादा साहेब फाल्के के बेटे भालचंद्र फाल्के ने निभाया।

कहते हैं न कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है। दादा साहेब फाल्के की सफलता में भी उनकी पत्नी सरस्वती का साथ था। फिल्म में वो पर्दे पर भले ही नजर न आई हों, लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने मुख्य किरदार निभाया। फिल्म के निर्माण में लगभग 500 लोग लगे हुए थे। सरस्वती सभी के लिए खाना बनाने, कपड़े धोने, क्रू के सोने और रहने के साथ-साथ फिल्म प्रोडक्शन का भी सारा काम संभालती थीं। फिल्म निर्माण में सरस्वती के अलावा एक भी महिला सेट पर नहीं होती थी।

तमाम कठिनाइयों के बाद आखिरकार करीब 7 महीने बाद फिल्म बनकर तैयार हुई। 3 मई 1913 वो दिन था जब भारतीय सिनेमा इतिहास की पहली फीचर फिल्म को आम दर्शकों के लिए रिलीज किया गया। फिल्म हिट रही। अगले साल ये फिल्म लंदन में भी रिलीज की गई। राजा हरिश्चंद्र पहली फीचर फिल्म होने के साथ-साथ पूरी तरह भारतीय फिल्म थी। फिल्म से जुडे़ सभी काम भारतीय कलाकारों ने ही किए थे।

इसके साथ ही भारतीय सिनेमा में फिल्मों का कारवां शुरू हो गया। इन दादा साहेब यानी धुंडीराज गोविंद फाल्के का जन्म आज से करीब 151 साल पहले 30 अप्रैल 1870 को हुआ। उनके पिता गोविंद सदाशिव फाल्के संस्कृत के विद्धान थे। मंदिर में पुजारी थे। उन्होंने नासिक से पढ़ाई की। सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई में नाटक और फोटोग्राफी की ट्रेनिंग ली। उन्होंने जर्मनी से मशीन लाकर प्रिंटिंग प्रेस भी खोली और एक मैगजीन का प्रकाशन भी किया।

आज भले ही भारतीय फिल्में लोकप्रियता और बजट के मामले में किसी से कम नहीं हों, शुरुआत में परिस्थितियां ऐसी नहीं थी। शुरुआती फिल्में मूक होती थीं यानी उनमें डायलॉग और संगीत नहीं होता था। इस कमी को दूर करने के लिए लाइव संगीत दिया जाता था। कलाकारों का एक दल पर्दे के नीचे बैठकर सीन के मुताबिक संगीत दिया करता था। लड़ाई और हिंसा के दृश्यों के लिए कई बार शोर मचाकर माहौल बनाते थे।

फिल्म को लेकर विवाद
देश की पहली फीचर फिल्म किसे माना जाए इस बात को लेकर विवाद है। साल 1912 में राम गोपाल तोरने की फिल्म ‘श्री पुंडलीक’ रिलीज हुई थी। तोरने के परिवार वालों का दावा है कि ‘श्री पुंडलिक’ पहले रिलीज हुई थी इसलिए भारत की पहली फीचर फिल्म का दर्जा इसे मिलना चाहिए। अप्रैल 2013 में तोरने के परिवार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक मुकदमा भी दाखिल किया। जानकारों का कहना है कि ‘श्री पुंडलीक’ को भारत की पहली फीचर फिल्म का दर्जा इसलिए नहीं दिया गया, क्योंकि यह फिक्स कैमरा पर शूट हुई थी और इसका प्रोडक्शन का काम भी लंदन में हुआ था। फिल्म के कैमरामैन भी ब्रिटिश थे, जबकि राजा हरिश्चंद्र पूर्ण रूप से भारत में ही बनी थी। यही वजह है कि राजा हरिश्चंद्र को ही भारत की पहली फीचर फिल्म माना जाता है। मराठी में हरिश्चंद्राची फैक्टरी नाम से फिल्म बनी है, जिसमें दादा साहेब के पहली फिल्म बनाने के संघर्ष को दिखाया गया है।

1969 से दादा साहेब फाल्के अवार्ड
भारतीय सिनेमा में दादा साहब के ऐतिहासिक योगदान के चलते 1969 से भारत सरकार ने उनके सम्मान में 'दादा साहब फाल्के' अवार्ड की शुरुआत की। इस पुरस्कार को भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च और प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है। सबसे पहले देविका रानी चौधरी को यह पुरस्कार मिला था। हाल ही में तमिल स्टार रजनीकांत को 51वें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।

देश-दुनिया में 30 अप्रैल को इन घटनाओं के लिए भी याद किया जाता है-

  • 2020: अभिनता ऋषि कपूर का निधन।
  • 2008: चालक रहित विमान “लक्ष्य” का ओडिशा के बालासोर जिले के चांदीपुर समुद्र तट से सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।
  • 1975: वियतनाम युद्ध का अंत हुआ।
  • 1956: अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति एल्बेन बार्कली की वर्जीनिया में एक भाषण के दौरान मौत।
  • 1945: जर्मन तानाशाह हिटलर एवं उसकी पत्नी इवा ब्राउन ने आत्महत्या की।
  • 1908: खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड के मजिस्ट्रेट की हत्या करने के लिए बम फेंका।
  • 1789: जॉर्ज वाशिंगटन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति चुने गए।
  • 1030: गजनवी वंश के पहले स्वतंत्र शासक सुल्तान महमूद का निधन।