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आज का इतिहास:वो तानाशाह जिसने 148 शियाओं का कत्ल करवाया था, अपने खून से लिखवाई थी कुरान; मिली थी फांसी

6 महीने पहले
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इराक पर दो दशक तक शासन करने वाले तानाशाह सद्दाम हुसैन को आज ही के दिन 2006 में फांसी दे दी गई थी। सद्दाम की छवि एक ऐसे व्यक्ति की थी वह कुछ लोगों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं था, जबकि अपने ही देश के एक तबके और दुनिया के कई देशों के लिए लिए खूंखार तानाशाह था।

सद्दाम हुसैन का जन्म 28 अप्रैल 1937 को बगदाद के तिकरित स्थित एक गांव में हुआ था। सद्दाम ने बगदाद में कानून की पढ़ाई की। 1957 में सद्दाम ने महज 20 साल की उम्र में बाथ पार्टी की सदस्यता ली थी। ये पार्टी अरब राष्ट्रवाद का अभियान चला रही थी, जो आगे चलकर 1962 में इराक में हुए सैन्य विद्रोह की वजह बना, सद्दाम भी इस विद्रोह का हिस्सा था।

148 शियाओं के नरसंहार के दोषी सद्दाम हुसैन को 30 दिसंबर 2006 को दी गई थी फांसी
148 शियाओं के नरसंहार के दोषी सद्दाम हुसैन को 30 दिसंबर 2006 को दी गई थी फांसी

इराक की सत्ता पर दो दशक तक रहा सद्दाम का राज

1968 में इराक में हुए एक और सैन्य विद्रोह में सद्दाम ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, जिससे उसकी पार्टी सत्ता में आ गई। इस विद्रोह से महज 31 साल की उम्र में सद्दाम ने जनरल अहमद हसन अल-बक्र के साथ मिलकर सत्ता पर कब्जा जमा लिया। इसके बाद सद्दाम तेजी से आगे बढ़ा और 1979 में वह इराक का पांचवां राष्ट्रपति बन गया और जुलाई 1979 से अप्रैल 2003 तक इराक की सत्ता पर काबिज रहा।

148 शियाओं की करवाई थी हत्या

सद्दाम ने सत्ता पर कब्जा जमाने के बाद सबसे पहले शियाओं व कुर्दों के खिलाफ अभियान चलाया। वह अमेरिका का भी विरोध करता था। माना जाता है कि सद्दाम की सिक्योरिटी फोर्सेज ने इराक में करीब ढाई लाख लोगों को मौत के घाट उतारा था। इतना ही नहीं सद्दाम द्वारा ईरान और कुवैत पर हमलों की वजह से भी हजारों लोग मारे गए।

1982 में सद्दाम पर जानलेवा हमले की कोशिश हुई। इस हमले के बाद सद्दाम ने दुजैल में 148 शियाओं का कत्ल करवा दिया था। एक इराकी अदालत ने इसी नरसंहार के लिए 05 नवंबर 2006 को सद्दाम को दोषी ठहराया था और इसके बाद 30 दिसंबर 2006 में सद्दाम को फांसी पर चढ़ा दिया गया।

सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने पर उनकी सुरक्षा में तैनात अमेरिकी सैनिक भी रो पड़े थे
सद्दाम हुसैन को फांसी दिए जाने पर उनकी सुरक्षा में तैनात अमेरिकी सैनिक भी रो पड़े थे

सद्दाम ने अपने 27 लीटर खून से लिखवाई थी कुरान
सद्दाम हुसैन ने 1990 के दशक में अपने खून से कुरान लिखवाई थी। द गार्डियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सद्दाम ने अल्लाह के लिए प्रति कृतज्ञता जताने के लिए दो सालों के दौरान अपना 27 लीटर खून देकर उसे स्याही के रूप में प्रयोग करवा कर कुरान के सभी 114 अध्यायों को 605 पन्नों में लिखवाया था। इन सभी 605 पन्नों को लोग देख सकें, इसके लिए इन्हें शीशे के केस में सजा कर रखा गया था।

बगदाद की उम्म अल-मारीक (Umm al-Ma'arik) मस्जिद में रखी गई थी सद्दाम के खून से लिखी कुरान (साभार: द गार्डियन)
बगदाद की उम्म अल-मारीक (Umm al-Ma'arik) मस्जिद में रखी गई थी सद्दाम के खून से लिखी कुरान (साभार: द गार्डियन)

सद्दाम हुसैन की जीवनी लिखने वाले कॉन कफलिन ने भी ब्लड कुरान के बारे में लिखा है। 'ब्लड कुरान' के नाम से चर्चित इस कुरान को बगदाद की एक मस्जिद में रखा गया था। 2006 में सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद से इस कुरान के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लग गई थी।

सद्दाम हुसैन ने इराक पर दो दशक से ज्यादा समय तक शासन किया था।
सद्दाम हुसैन ने इराक पर दो दशक से ज्यादा समय तक शासन किया था।

सद्दाम को हुई फांसी तो अमेरिकी सैनिकों की आंखों में थे आंसू

अमेरिका और ब्रिटेन ने इराक पर सामूहिक विनाश का हथियार रखने का आरोप लगाया था लेकिन इराक ने इससे इंकार किया था। इसके बाद 2003 में अमेरिका और ब्रिटेन की संयुक्त सेना ने इराक पर हमला कर सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया था और इसी के साथ इराक में सद्दाम के शासन का अंत हो गया। सद्दाम को 13 दिसंबर 2003 को तिकरित के नजदीक अदटॉर से पकड़ा गया था।

जब सद्दाम हुसैन के केस की अदालती कार्रवाई चल रही थी, तो उसकी सुरक्षा में बारह अमेरिकी सैनिक तैनात रहते थे, जिन्हें 'सुपर ट्वेल्व' कहा जाता था। इन 'सुपर ट्वेल्व' सैनिकों के सद्दाम के साथ अच्छे संबंध बन गए थे। इनमें से एक सैनिक ने बाद में सद्दाम पर एक किताब लिखी और बताया कि जब उन 12 सैनिकों ने सद्दाम को फांसी देने वालों के हवाले किया तो उन सभी अमेरिकी सैनिकों की आंखों में आंसू थे।

ISRO की स्थापना करने वाले वैज्ञानिक विक्रम साराभाई का निधन

महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई को इंडियन स्पेस प्रोग्राम का जनक कहा जाता है। 1962 में साराभाई ने इंडियन नेशनल कमिटी फॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की, जो आगे चलकर इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) बना। साराभाई को देश के स्पेस साइंस प्रोग्राम को शुरू करने और नई ऊंचाइयों पर ले जाने का श्रेय जाता है।

साराभाई ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने तिरुवनंतपुरम स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर की स्थापना की थी।

विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में हुआ था। उन्होंने ब्रिटेन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी। 1942 में दूसरे विश्व युद्ध की वजह से साराभाई भारत लौट आए और यहां आकर उन्होंने कई रिसर्च पर काम किए।

विक्रम साराभाई को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है।
विक्रम साराभाई को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है।

30 दिसंबर 1971 को विक्रम साराभाई का निधन हुआ था। विज्ञान में उनके अमूल्य योगदान के लिए साराभाई को 1966 में पद्म भूषण और 1972 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

भारत और दुनिया में 30 दिसंबर की महत्वपूर्ण घटनाएं :

2007: बेनजीर भुट्टो की हत्या के तीन दिन बाद उनके बेटे बिलावल को पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का चेयरमैन चुना गया। बिलावल उस वक्त महज 19 साल के थे।

1996: ग्वाटेमाला में 36 साल से चल रहा गृहयुद्ध 29-30 दिसंबर 1996 को खत्म हुआ।

1975: हिन्दी के कवि और गजलकार दुष्यंत कुमार का निधन।

1975: मशहूर गोल्फर अमेरिका के टाइगर वुड्स का जन्म हुआ। वुड्स पहले गोल्फर हैं, जिन्होंने लगातार चार मेजर टूर्नामेंट जीते।

1949: भारत ने चीन को मान्यता दी। एक अक्टूबर 1949 को नए चीन के गठन के बाद उसे मान्यता देने वाले दूसरा गैर-कम्युनिस्ट राष्ट्र बना।

1943: स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने पोर्ट ब्लेयर में भारत की आजादी का झंडा लहराया।

1922: लेनिन ने आसपास के 14 राज्यों को रूस में मिलाया और आधिकारिक रूप से सोवियत संघ (USSR) की स्थापना हुई। मॉस्को इसकी राजधानी बनी। व्लादिमिर लेनिन इसके प्रमुख थे।

1906: अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में हुई।

1865: मशहूर ब्रिटिश राइटर रूडयार्ड किपलिंग का जन्म हुआ।

1803: अंग्रेज मराठा युद्ध के बाद मराठा प्रमुख दौलत राव सिंधिया और अंग्रेजों ने संधि की। इस संधि को सुर्जी-अर्जुनगांव की संधि के नाम से जाना जाता है।

1703: जापान की राजधानी टोक्यो में भूकंप से 37 हजार लोगों की मौत।